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जितेन्द्र आनन्द की दो लघुकथाएँ

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मैंने कहा तो था

ये जीवन भी एक ऐसी अनसुलझी पहेली है, कोई लाख उत्तर तलाशता हुआ दूर निकल जाये तो कोई जरूरी तो नहीं कि सही उत्तर उसे मिल ही जाये। सत्य वो नहीं जो हम देखते हैं, जो दिखाया गया है वो भी सत्य है अगर जीवन भर आपको सच-झूठ का अन्तर पता न चले।

सरोज के चेहरे पर विशाल शांति बिखरी हुई थी । उसने आखिरकार तथ्यों को गढ़ ही लिया , वह जीत ही गयी । उसकी बेटी उसका यह रूप देखकर चकित रह गयी, धीरे-धीरे ममता ने अपना सामान बाँधना शुरू कर दिया, फिर न कभी आने के लिए। अपने छोटे से बेटे को देखती हुई रो पड़ी, माँ के डिब्बे में रखे हुए सिक्के चुरा लिए उसने । ममता अपने गरीब घर को छोडकर कुछ दिन बिताने अपनी माँ के महल जैसे घर क्यों आ गयी। अपने पति की बात न मानी, बहुत मना किया लेकिन वो भी सती बन गयी। सती, जो भोले बाबा के लाख मना करने के बाद भी अपने पिता के घर यज्ञ में शामिल होने आ गयी, पिता उसके राजा थे, राजा दक्ष सबसे ऊँचे पद पर आसीन। सती न अपमान न सहन कर पायीं, भस्म हो गयीं, लेकिन उसे मर जाना नहीं था, उसने अपने बेटे को फिर देखा। सहमा हुआ, किसी कोने में छुप जाने को बेताब।

“तुम मुझसे अपने मायके जाने की जिद्द मत किया करो, हर बार उदास होकर लौटती हो।“, ममता को लगा अभी सामने खड़े होकर उसे उलाहना दे रहे हैं।

वह समझ न पायी, उसकी माँ सिक्के का डिब्बा उसके बेटे के सामने क्यों ले आई, चुपके से अपनी बहू को इशारे से बोलती हुई, निकल गयी। उसके नादान बेटे को चाल समझ न आई, वो डिब्बे की तरफ लपका, और मचल गया, “नानी, मैं तो इतनी सारी टॉफी लाऊँगा ।“ बहू ने डिब्बा उठा कर मेज पर रख दिया, ठीक उसके बेटे के सामने। बेटा कुछ देर तक ललचाई नजरों से डिब्बा देखने लगा, फिर दूसरे कमरे में चला गया, अपनी माँ के पर्स में से कुछ पैसे निकाल लाया। ममता जब तक उसे देख कर कुछ कह पाती, बहू ने अपनी चाल चल दी, “देखो बेटा, नानी टॉफी दिलवा देगी, लेकिन पैसे चुराना गलत बात है। दीदी, अपने बेटे को संभाल लो, इतनी सी उम्र में चोरी सीख रहा है। अब ले ही लिए हैं तो रख लो, और लोगे बेटा, चोर का मन भर जाए। “

ममता देखती रह गयी, न समझ पायी कि बेटे के हाथ में पैसे उसके अपने हैं।

ममता ने दरवाजे से निकल कर पैदल ही रेलवे स्टेशन का रास्ता पकड़ लिया, इस बार कोई छोड़ने नहीं आया।

उसी दिन ममता अपने घर लौट आई, बात अपने पति को न बताई, न बेटे से कुछ कहा ।

बस उसका सहमा हुआ चेहरा, रोती हुई आवाज सुन कर सब समझ गए। क्या बात हुई, जानना जरूरी नहीं था, वो कोई भी घटना हो सकती थी, कहने से रुक न सके,” मैंने कहा तो था। “

विष-वृक्ष

मोहन कुमार आज दरवाजे पर जाकर ठिठक गए, हिम्मत न हो पायी कि एक बार बोल दें। वापिस मुड़ लिए, मन के आकाश में हजार किस्से लिए, सारा जीवन का सार। आखिरकार वह विष-वृक्ष ही साबित हो गए। समय न साथ दिया, सपने लेकर ही चले जाएँगे एक दिन, कुछ परिणाम हाथ न आया ।

उनकी देह पर फटे-पुराने कपड़े थे । थके हुए कदमों से अपने घर तरफ बढ़ चले। कृष-काया हो चली पत्नी ने दरवाजा खोला, “मिल आए? माँ क्या कह रहीं थी?” लगता था जैसे बहुत उम्मीद लगाकर बैठी थी। उनकी बेटी नेहा ने प्रश्न के निगाहें से देखते हुए, पानी का गिलास हाथ में दे दिया।

मोहन कुमार तुरंत कुछ कह न पाये, “ममता, मैं हिम्मत न कर पाया। दरवाजे पर जाकर ही लौट आया, क्या कहूँ? आज जरूरत पड़ी तो अपना मान-सम्मान खो कर हाथ फैला कर खड़ा हो गया। जब सारी उम्र निकाल दी, तो भिखारी बन कर आ गया । “

“मेरी माँ हैं, आप अपने ही बहुत कुछ सोच लेते हैं।“ ममता उनको देख कर उदास हो गयी। शिकायत की क्या जरूरत, चलो ठीक ही किया। जब माँ सारी जिन्दगी अहंकार में रही तो, आज दो पल के काम के लिए क्या मदद करती।

“खाना लगा दूँ? नेहा, जरा पापा को सलाद बना दे।“

“पापा, आप गए ही क्यों थे?”

“कोई बात नहीं, बेटी सोच तुम्हारा काम बन जाये। पर तुम्हें अब अपनी युद्ध स्वयं ही लड़ना पड़ेगा, अब मुझसे आगे कुछ न हो पाएगा।“ मोहन कुमार की आँखों में आँसू छलक उठे।

मोहन कुमार ने सारी जिन्दगी दूसरों की मदद करते हुए निकाल दी। लेकिन बिजनेस में एक बार नुकसान हुआ तो होता चला गया, बहुत कोशिश लेकिन उभर न पाये। कर्ज़ देते-देते कमर टूट गयी, घर-बार सब बिखर गया, कर्ज़ उनकी सारी जमा-पूँजी ले डूबा, आखिर नौकरी में आ गए, लेकिन कर्ज़ सालों तक चलता गया, जो कुछ बचाने के हिसाब लगाते और कुछ बचा पाते वह सब उधारी देने में निकल जाता। बेटी देखते-देखते ही तेईस साल में पहुँच गयी। न जाने कैसे उसे पढ़ा पाये।

ममता ने जैसे दुनिया से मुंह मोड़ लिया, न किसी से मिलना, न किसी से कोई बात। मोहन कुमार की शिक्षा कोई काम न आयी, जिस जतन से वह पढ़-लिख करे बढ़े हुए तो लगता था कि जीवन में एक मुकाम हासिल कर लेंगे, मेहनत तो उनकी रग-रग में भरी थी, लेकिन मेहनत ही तो काफी नहीं। लोग जिसे भाग्य कहते हैं, शायद उसका हिस्सा मोहन कुमार कि मेहनत से बहुत ज्यादा था।

अब न समय बच और न शरीर में ताकत। ढले हुए, कनपटी के सफ़ेद बालों में अपनी इज्जत को बचाते हुए, रोज सुबह घर से नौकरी के लिए निकल ही जाते । मन ने कुलांचे मारना कब का छोड़ दिया। घर आते तो थक कर सो जाते, सुबह फिर वही भागम-भाग।

नेहा कि शादी कि चिन्ता धीरे-धीरे घर में पसर गयी, एक तो पैसों कि तंगी, फिर कर्ज़ के बोझ, सालों निकल गए पर इतने भी पैसे न बचे कि रिश्ते देखने के लिए भी जो आने जाने का खर्चा लगता उसे उठा पाते। ममता बाबरों जैसे शक्ल ताकती।

न जाने वो कौन से लोग हैं जो हिम्मत करते हैं और सफल हो जाते हैं, लेकिन जो सफल नहीं होते उनकी दास्तान कोई नहीं जानता। किसी फलदार वृक्ष बनने कि इच्छा लिए, दर-दर भटकते हुए लोगों की कहानी ऐसे ही दफन हो जाती है कहीं बंद कमरों में ।

मोहन कुमार एक ऐसी ही दास्तान बन कर रह गए। किसी विष-वृक्ष की तरह।

ममता का मन हिचकोले मारने लगा, उसे लगता कि लोग उस पर निगाहों से व्यंग कस रहे हैं, अर्थ का अनर्थ हो गया। धीमे-धीमे खाना-पीना छूट गया, ममता खाना बनाती जरूर पर खा न पाती। नेहा और मोहन कुमार लाख हल्ला मचाते पर वो टस से मस नहीं ।

नेहा का मन बेहद उदास हो चला, अपनी शादी की बात तो कब से उसने अपने मन से निकाल दी थी। आर्थिक समस्याओं से जूझते उसके माँ-बाप अब लाचारी की अजीब कहानी बन के रह गए थे। इतने सालों मे न समय बदला न ही आँखों मे बसे सपने, हर गुजरते दिन के साथ लगता कि शायद अब ये दिन बादल जाएंगे; ये आशा न पीछा छोड़ती।

एक आशा ही तो अब रह गयी थी मोहन कुमार और ममता के पास। हरेक महीना इतना तेज गुजर जाता कि वेतन पता न चलता कब किस दिन खतम हो गया, एक-एक रुपये के लिए मोहताज बन के रह गए दोनों ।

न जाने क्यों ममता के मन अपनी माँ से कुछ मदद कि इच्छा जग उठी। माँ हमेशा से उसके साथ निष्ठुर रही, फिर भी न जाने क्यों उसने मोहन कुमार को एक बार नेहा के लिए बात करने के लिए माँ के पास भेज दिया और देखो तो, मोहन कुमार इतनी दूर सफर करके दरवाजे तक पहुँचे, पर दरवाजे कि घंटी बजाने की हिम्मत न उठा पाये। दामाद थे उस घर के, क्या हो जाता? अरे नेहा की बात न करते तो कम से कम हाल-चाल ही ले आते।

मामत की आँखें डबडबा आयीं, अपना भाग्य देखकर, कहाँ हरेक रिश्तेदार और दोस्तों के कामों में हाथ बढ़ाकर मदद करते मोहन कुमार, कहाँ आज याचक बन कर फिरते हुए दरवाजों पर।

रात भर नींद न आई दोनों को, नेहा भी बहुत देर से सो पायी। सुबह ही मोहन कुमार के ऑफिस से फोन आ गया, कुछ काम में गलती हो गयी थी, उसे सही करना था और एक काम हर हाल में आज रात तक पूरा कर के देना था।

“आप, कैसे काम कर पाओगे? पूरी रात एक पल नहीं सो पाये हो, आज छुट्टी कर लेते। आँखों के नीचे काले-काले निशान पड़ गए हैं। आज भी रात में देर से आओगे?” ममता परेशान हो उठी।

“कुछ नहीं ममता, इतने सालों से आदत से पड़ गयी है। बस मुझे टिफिन बना दो, और परेशान न होना, रात को पता नहीं कितने बजे आ पाऊँगा। ये महीना जल्दी से खतम हो जाये तो तनख्वाह मिले, इस बार एक और कर्ज़ खतम करना है। ये कर्ज़ मेरे दिलो दिमाग पर हावी हो चला है। “

“अरे हो जाएगा, जब इतना हो गया तो आगे भी हो जाएगा। ये दिन भी बदल जायेंगे।“ ममता रसोई की तरफ बढ़ चली ।

मोहन कुमार खामोश हो गए, हमेशा की तरह ।

विष-वृक्ष में अब कोई स्पंदन न बचा था, हवा भी पत्तियाँ न हिला पाती ।


जितेन्द्र आनन्द – एक परिचय

जन्म : 21 अगस्त 1970 को अलीगढ़ में ।

मालवीय क्षेत्रीय अभियांत्रिकी विद्यालय, जयपुर से स्नातक व रुड़की विश्वविद्यालय, रुड़की से स्नातकोत्तर डिग्री ।

समयानुसार दोनों के नाम बदल गए हैं। अपने पुराने नाम में भी अच्छे थे, और अब नए नाम के साथ भी।

किरदार बदलते रहते हैं, बस जरूरत बनी रहे।

किरदारों के मन को समझ पाना भी आसान नहीं, अपने आस-पास हर चेहरा गवाह है एक नयी कहानी का। अन्याय को अपने दिल छुपाये, कुछ किरदार मिल ही जाते हैं अक्सर चेहरे पर एक चेहरा लगाए। पैसों की इस अंधी दौड़ में कौन अपना अन्याय कर गया और इसकी सजा जीवन भर कौन भरे, पता नहीं।

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