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*अंतर्राष्ट्रीय विकलांगता(दिव्यांगता)दिवस और हमारा दायित्व* // सुदर्शन सिंह

अंतर्राष्ट्रीय विकलांगता(दिव्यांगता)दिवस

जुनूँ है जहन में तो हौसले तलाश करो

मिसाले आबे रवां रास्ते तलाश करो

ये इज्तराब रगो में बहुत जरुरी है

उठो सफर के नये सिलसिले तलाश करो

नफ़स अम्बालवी की ये पंक्तियाँ अष्टावक्र, सूरदास, रामभद्राचार्य, स्टीफन्स हाकिन्स, रवींद्र जैन, सुधा चन्द्रन, अरुणिमा सिन्हा व् इरा सिंघल जैसे दिव्य विशेषता लिए हुए व्यक्तियों पर सटीक बैठती है जिन्होंने अपनी अक्षमता को दरकिनार कर, हार न मानते हुए विश्वपटल पर एक अमिट छाप छोड़ी है और जो लाखों-करोड़ों दिव्यांगों के लिए प्रेरणास्रोत है। अंतर्राष्ट्रीय विकलांगता दिवस 3 दिसम्बर का दिन ऐसी ही प्रतिभावों को याद करने व् विश्व में विकलांगों की सामाजिक स्थिति का यथार्थ ज्ञान करने , उन्हें जीवन पथ पर आगे बढ़ने हेतु अभिप्रेरित करने तथा समाज में उनकी भूमिका को बढ़ावा देने और गरीबी हटाने, बराबरी का अवसर प्रदान करने, उचित पुनर्सुधार के साथ उन्हें सहायता देने हेतु विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं पर मंथन के लिए जाना जाता है। यह दिन दिव्यांगों के सशक्तिकरण के लिए मनाया जाता है। जिसका मुख्य ध्येय इस भागम-भाग युक्त जीवन में दिव्यांगों के लिए समान अधिकार और बेहतरी की सम्भावनाओं को सुनिश्चित करना है।

इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय विकलांगता दिवस पर यू एन के तरफ से विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र ने दिव्यांगों के लिए 2030 तक का जो एजेंडा तैयार किया है उसका लक्ष्य है कि इस तीव्रता भरे जीवन में कोई व्यक्ति पीछे न रह जाये, चाहे वह व्यक्ति दिव्यांग ही क्यों न हो। अंतर्राष्ट्रीय विकलांगता दिवस सयुंक्त राष्ट्र संघ की एक मुहिम का बेहद उम्दा हिस्सा है जिसकी शुरुआत शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के साथ समाज में होने वाले भेदभाव को जड़ से मिटाने के उद्देश्य से हुई थी। वर्ष 1976 में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा के द्वारा वर्ष 1981 को अंतर्राष्ट्रीय विकलांगता वर्ष घोषित किया गया था जो आगे चलकर 1991-92 में 3 दिसम्बर को अंतर्राष्ट्रीय विकलांगता दिवस के तौर पर विश्व के साथ-साथ भारत जैसे कई देशों में मनाया जाने लगा।

भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 दिसम्बर 2015 को अपने रेडियो सम्बोधन"मन की बात" में कहा कि शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के पास एक दिव्य क्षमता है और उनके लिए विकलांग शब्द की जगह दिव्यांग शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए तब से भारत में दिव्यांग शब्द का प्रयोग किया जा रहा है परंतु दिव्यांग जैसे शब्दों के प्रयोग मात्र से दिव्यांगों के साथ हो रहे भेद-भाव को समाप्त नहीं किया सकता है हालांकि दिव्यांगों के सशक्तिकरण हेतु एक सफल प्रयास के रूप में विकलांग अधिनियम 1995 के स्थान पर दिव्यांग व्यक्तियों का अधिकार विधेयक 2016 को दोनों सदनों ने पारित कर दिया है, जिसका मसौदा वर्ष 2014 से राज्य सभा में लम्बित था। अधिनियम में निर्धारित विकलांगों की 7 शर्तों के स्थान पर यह विधेयक 21 शर्तों को कवर करता है इस विधेयक के तहत दिव्यांगता माने जाने वाली 21 शर्तें इस प्रकार है-मानसिक मन्दता, आटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, मानसिक रोगी, श्रवण बाधित, मूक निःशक्ता, दृष्टि बाधित, अल्प दृष्टि, चलन निःशक्ता, कुष्ठ रोग से मुक्त, बौनापन, तेजाब हमला पीड़ित, मांशपेशी दुर्विकास, स्पेसिफिक लर्निंग डिसेबिलिटी, बौद्धिक निःशक्ता, मुल्टीपल स्केलेरोसिस, पार्किसंस रोग, हिमोफिलिया, थैलेसीमिया, सिकिल सेल डिजिज व् बहु निःशक्ता।

वर्ष 2018 का अंतर्राष्ट्रीय विकलांगता दिवस का थीम"विकलांग व्यक्तियों को सशक्त बनाओ तथा उनके समावेश और समानता को सुनिश्चित करो"(इम्पावरिंग पर्सन विथ डिसएबिलिटीज एण्ड इंश्योरिंग इंक्लूजीवनेश एण्ड इक्वालिटी)है। देखा जाये तो विश्व की कुल आबादी के 15 प्रतिशत लोग दिव्यांग है जबकि भारत में जनगणना 2011 के अनुसार 2.21 प्रतिशत व्यक्ति दिव्यांग है जिनमें 75 प्रतिशत दिव्यांग व्यक्ति ग्रामीण इलाकों में निवास करते है तथा 49 प्रतिशत दिव्यांग साक्षर है और 34 प्रतिशत दिव्यांग व्यक्ति रोजगारपरक है। आंकड़ों के लिहाज से जो तस्वीर सामने है उससे साफ जाहिर है कि भारत में सरकारी व् गैर सरकारी संगठनों को इनके उत्थान के लिए बहुत अधिक कार्य करने की जरुरत है और जरूरत है इनको परिवार, विद्यालय व् समाज के द्वारा मानसिक सहयोग की जिसके अंतर्गत उन्हें उनकी क्षमतानुसार कौशल प्रशिक्षण दिया जाये, उन्हें शिक्षित करके सृजनात्मक कार्यों की ओर मोड़ा जाये जिससे दिव्यांगजन अपने तिरस्कार व् स्वकेंद्रित जीवनशैली से बाहर निकलकर स्वयं को सामर्थ्यवान बनाये, परिवार पर बोझ न बने तथा राष्ट्रीय सम्पत्ति की बृद्धि में अपना अमूल्य योगदान दे सकें।

सच्चे अर्थों में यदि हम दिव्यांगजनों को कुछ देना चाहते है तो हम उनके प्रति संवेदनशील रहें तथा उन्हें वह प्रोत्साहन व् उत्साह दें जिससे उनका आत्मविश्वास हमेशा ऊँचा रहे। वास्तव में दिव्यांगता शारीरिक और मानसिक होने से ज्यादा हमारे सोच-विचार में है जो हम दिव्यांगों को बेचारा, हीन, दयनीय और कमतर समझते है। जरूरत है तो ऐसी सोच बदलने की, हमें भूलना नहीं चाहिए की प्रत्येक मनुष्य अपने आप में विशेष होता है।

लेखक-

सुदर्शन सिंह

असिस्टेन्ट प्रोफेसर

शिक्षाशास्त्र विभाग

डी0एस0एन0कालेज, उन्नाव, उत्तर प्रदेश

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