साहित्यम् - फेस बुक पर ई-पत्रिका वर्ष-१ अंक -१ प्रवेशांक

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साहित्यम् - फेस बुक पर ई-पत्रिका   : एक अभिनव पहल   वर्ष-१ अंक -१ प्रवेशांक –नवम्बर २०१८ .निशुल्क सम्पादकीय फेस बुक पर पहली ई-पत्रिका में ...

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साहित्यम् -फेस बुक पर ई-पत्रिका   : एक अभिनव पहल 

वर्ष-१ अंक -१ प्रवेशांक –नवम्बर २०१८ .निशुल्क

सम्पादकीय

फेस बुक पर पहली ई-पत्रिका में पाठकों का स्वागत,अभिवादन,अभिनंदन  .यह बैठे ठाले का शगल है ,कुछ नहीं तो यहीं सही ,सूचना का प्रभाव इतना रहा की तुरंत रचना ,फोन ई मेल आये. प्रवेशांक आप को पसंद आएगा ,यात्रा जारी रहेगी. अकेले हैं तो क्या गम हैं .

वर्तनी की ओर ज्यादा ध्यान न दें .आगे कुछ और सुधार करेंगे.

इस हाहाकारी भयंकर समय में प्रेम की बात करना आसान नहीं है फिर भी प्रेम पर इस अंक में कहानी,कविता व् व्यंग्य पढ़ें। सुरेश कान्त  ,कैलाश मनहर, राजेन्द्र स्वर्णकार,अशोक गौतम का आभार .

धन तेरस , दिवाली की मंगल कामनाएं .

आगामी अंक का विषय –स्त्री –पुरुष सम्बन्ध –इस पर कविता, व्यंग्य , कहानी का सपारिश्रमिक स्वागत है.

यशवंत कोठारी

ykkothari3@gmail.com


कहानी-

अपरेसन

सुरेश कान्त

बहुमुखी प्रतिभा के धनी, वरिष्ठ लेखक – पेंगुइन रेंडम के सलाहकार संपादक

वह सोच रही थी, आज भी न गई तो चेहरा लटका लेंगे। वैसे भी अबकी बार चार महीने बाद लौटे हैं। लेकिन अम्मा तो अभी जाग रही हैं? रजाई में मुँह दिए भले पड़ी हों, कान बहुत चौकस हैं उनके। कहेंगी तो क्या, पर सुबह उनकी नजर में आते ही शर्म से दोहरा जाएगी वह। यह लिहाज अब तक नहीं छूटा — जैसे गौनिया हो!...एक देवरानी भी तो है — सरे-साँझ से बगल की कोठरी में दुबक रहती है देवर जी के साथ...होगी रे, नए जमाने की छोरी है वह। और फिर जब तक गोद खाली है, खेल-खा ले। फिर तो बचूड़ों का मुँह देखकर जीना पड़ता है।

उसने लेटे-लेटे निगाह दौड़ाई — जुड़वाँ खाट पर तीनों लड़कियाँ बेसुध सो रही थीं। मुन्ना उसकी काँख में फँसा है — मुँह में आँचर लिए। सारी रात उसी की ओर करवट लिए कट जाती है। जरा-सा आँचर मुँह से छूटा नहीं कि ठिनकने लगता है। रह-रहकर अजान बनता है — डोंडा। दो साल का होने को आया...उसने प्यार से गाल थपककर मन-ही-मन हिसाब जोड़ा — पूष-पूष दो, आज क्या है...छठ है, बस पौन महीना और, दो का ही समझो। उसने रजाई के भीतर ही हाथ के अटकर से उसे सिर से पैर तक नाप डाला। बिलकुल अपने बाप पर जाएगा बड़ा होकर...वैसा ही घूना, नखड़ीला और अक्कड़खाँ है अभी से।

हाथ फेरते-फेरते गद्गद-सी हो आई, तो उसने रजाई का पल्लू उघाड़ दिया। दीये का पीला उजास मुन्ने के गोलमटोल मुँह और बिखराए बालों को चमचमा उठा। उसका हिया हुलसकर पूर्णता से भर गया। सचमुच, जब से यह छोरा हुआ है, उसकी कोख भर-सी गई है। कहने को तो छोरी-ऊपर-छोरियों की कतार से तीन-तीन सोरी सहेजी हैं उसने, पर छोरियों से भी कभी किसी का घर भरा है? उनके जन्म पर तो इस घर में कुहराम मच गया था। अम्मा चौंसठ आँसू रोतीं। 'इन' का मुँह भी उतर जाता। खुद वह भी अपनी कोख कोसती अघाती नहीं थी। लेकिन अब मुन्ने के बाद पूरी तरह तृप्त हो गई है। उसे अपनी कोख पर नाज है। अम्मा की भी फूटी-सी आँख खुल गई है। लड़कियों का भी ढकौना हुआ एक तरह से, नहीं तो बरस-बरस के दिन किसकी कलाई तलाशतीं!

चलूँ...उठूँ! — वह आलस झटककर एक बार फिर कसमसाई — चार महीने बाद लौटे हैं। आज दूसरा दिन है...पौर में जरूर लेटे हैं, पर यहाँ की एक-एक आहट धड़कनों से गिन रहे होंगे, यों भी पानी-पेशाब के बहाने दो-तीन बार बखरी फाँदकर खाँस-खूँस गए हैं। अम्मा भी कम नहीं हैं। फौरन रजाई से उझककर सूखे-से मुँह से पूछ बैठीं, “को है? लला! का बात है...”

“कुछ नहीं, अम्मा,” वे सहमे-से बोले, “जगह बदल गई है ना! सो नींद नहीं आ रही...”

लेकिन वह समझती है, जगह बदलने का मतलब! वह समझती है सारी बहानेबाजियाँ...और नींद क्यों उड़ गई है, यह भी...

अब तो जाना ही होगा...अम्मा की नक्की ठर्रा उठी है। देवरानी और देवर जी की खुसर-पुसर चस्स-चुस्स में बदलकर संगम के सुख से ओतप्रोत हो रात की स्तब्धता में खो गई है। लड़कियाँ मीठे सपनों में मशगूल हैं...और मुन्ना के उत्पात भी गहरे अवचेतन में घुलकर कुछेक देर को निस्पंद हो गए हैं। तो भी एहतियातन उसने आँचर की जगह तकिया लगा दिया, ताकि वह अबोध गहरी नींद में भी उसकी उपस्थिति महसूसता रहे। उसने मुन्ने का मुँह अधखुला रखा है, क्योंकि वह अपनी ही साँस की घुटन से हाथ-पाँव फेंककर कुनमुनाया, तो आँचर ढूँढ़ेगा और आँचर की जगह तकिया पाएगा, तो अभी हईकम मचा देगा। फिर अम्मा यानी सास और देवरानी दोनों एक ही सवाल करेंगे — वह कहाँ थी...? क्यों गई थी?

पेवली पर रखे दीए के उजास में उसने एक बार फिर देखा — लड़कियाँ गहरी नींद सो रही हैं। मुन्ना तकिए को उसका आँचर समझे नींद में भी माँ के आँचल में सिमटा सारी दुनिया से सुरक्षित है। उसने बालों में फरी-फरी कंघी फेर, साड़ी की चुन्नटें फिर से सहेज, बिना आहट कोठरी की किवाड़ी उढ़काकर, दबे पाँव अम्मा की ठर्राती नक्की का बहुत करीब से जायजा लिया और देवरानी की खामोश कोठरी में से चेतन-अचेतन की कुछ आहटें बीनकर अपने मजबूत कदम पौर की तरफ बढ़ा दिए, जहाँ वे सोने का बहाना किए करवटें बदल रहे हैं।

वे यानी लाखाराम। उसका पति। अबकी पूरे चार महीने बाद घर लौटा है। सोसायटी में चपरासी है वह। पहले तो यहीं था, करीब के जिला-मुख्यालय में। सुबह साइकिल से जाता और शाम को किसी पलैतू कबूतर-सा गुटरगूँ करता लौट आता। लेकिन दो साल पहले एक इंस्पेक्टर से तू-तू, मैं-मैं हो गई, तो बेचारा जिला-बदर कर दिया गया। अब श्योपुर में है। काले कोस। पहली बार जब गया था, तो उसके पेट में पानी हो गया था। उसने सुन रखा था स्यानियों से कि श्योपुर में भट्ठियाँ हैं। मगर लाखाराम को रोक पाना तो नामुमकिन था। सवाल नौकरी का है। फिर चाहे भट्ठियों का शहर हो, चाहे दानों का। सवाल दाने का ही तो है। ये बैरी पेट न होता, तो फिर चकल्लस ही क्या थी? आने-जाने में पूरे हजार रुपये लगते हैं। हर महीने नहीं आ सकता।

वह पौर की खाट के पाँयते आ बैठी। खाट पर लाखा सो रहा था...किसे नींद आती है ऐसे खिंचाव में...वह तो सोने का बहाना किए था। उसने रजाई का एक पल्लू उघाड़कर उसकी पिंडली दबानी शुरू कर दी। लाखा सुगबुगाया। नींद टूटने का अभिनय किया। वह खूब जानती है — उसकी जनम की आदत! अँधेरे में भी मुसकराती रही, उसकी इस दिलफेंक हरकत पर...कुछ देर बाद लाखा फुसफुसाया, “लेट रह...”

“कुच्च!” उसने तालू से जीभ छुड़ाकर नकार दिया।

लाखा एकदम अधीर हो उठा, “लेट तो...”

होंठों पर मुसकान और नकार में फिर सिर हिला दिया उसने।

“कुछ दुःख-सुख की बात करेंगे। तेरी कसम! और कोई गड़बड़ी नहीं।“ कहते-कहते जैसे लाखा की फूँक ही सरक गई। पर उसे यकीन न हुआ। यकीन संभव पर होता है। आग-फूस मिलकर जलेंगे नहीं? कैसा मूरख है उसका घरवाला! या कि उसे फिर एक बार ठगना चाहता है...लेकिन अब वह छलावे में आने से रही। अभी तक तो एक मुन्ने की चाह थी। वैसे उसका जोबन तो पहली छोरी की क्वाँ-क्वाँ पर ही फुर्र से उड़ गया था।

“ आ तो...” लाखा हारे हुए स्वर में उसका पल्लू खींचकर बोला, “इस छन की खातिर तो सैकड़ों मील फाँदकर आता हूँ...”

“मेरे वास्ते?” उसने मीठा उलाहना दिया।

“तेरे न सही, बाल-बच्चों के...पर मूल बिरछ तो तू ही है।” अब लाखा फुसलाने पर उतर आया था। पर तभी उसने पूरी धृष्टता से बरज दिया, “डाट खाओ! तुम्हें तो हर बखत मचोचे सूझते हैं और यहाँ प्रानों पर बन आती है।”

पर उसने महसूसा कि अब लाखा का हाथ ढीला पड़ गया है और एकाएक उदास हो उठा है वह। ऐसी घड़ियों में बड़ी कुशलता से काम लेती है, इतनी तो चतुर है वह कुपढ़ा। विपत्ति की आगाह एक मीठी चिकौटी में, “आजकल खतरे की घंटी हूँ बालम जी। बजाओगे, तो एक और मुन्ना नींद से उठ बैठेगा।”

“तू आ तो,” लाखा रूठा-सा बोला, “मैंने अपरेसन करा लिया है। मैं क्या इतना मूरख, अज्ञानी हूँ कि लैन पर लैन लगाता जाऊँ? बस्स! अपनी दुनिया को इत्ती फुलवारी बहुतेरी।”

पर उसे विश्वास नहीं हुआ। अपरेसन कराने की एकाएक कैसे सूझी इसे! अरे, इस टैम बावला हो जाता है। कुछ भी झूठ-मूठ गढ़ सकता है। न, वह नहीं आने वाली अब किसी फंदे में।

लाखा निराश हो अँधेरे में ही छत की कड़ियाँ गिनने लगा। ऑपरेशन तो एक गरज थी। एक नियंत्रण भी। अरसे से सोचता आ रहा था, लेकिन एक लड़के के बिना कोई परिवार पूरा नहीं होता। कोई परिवार से उसका मतलब सारे समाज से था...और समाज दुनिया-जहान का न सही, उसके माने में तो उसका समाज उसकी जात-बिरादरी तक सीमित है। हद से हद, भिंड-मुरैना और ग्वालियर जिला। इसके आगे भी दुनिया है — उसी जैसे लोगों की, उसने सोचने की कोई जरूरत नहीं समझी। और उसके समाज में लड़कियाँ खुदमुख्तियार नहीं होतीं। वे दूल्हे के घर जाकर बसती हैं, न कि दूल्हे को अपने घर में बाँधके रख सकती हैं। उसकी समझ में यही होता आया है आदिकाल से और अनंत तक यही ढर्रा चलता जाएगा...

एक बार डायरेक्टर साहब का दौरा हुआ था। साथी चपरासियों की नेक सलाह पर उसने अपना भाग्य आजमा डाला। पी.डब्ल्यू.डी. के रेस्टहाउस में घुसकर संचालक जी के बूट भरत की तरह अपने सिर पर धर लिए। मगर अफसोस! वे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी की तरह भाव-विह्वल नहीं हुए। खूब जोरों से हँसे। रावण जैसी हँसी। एकदम अट्टहास वाली — भयाक्रांत कर देने वाली हँसी। वह सहमकर सूख गया। बुत-सा खड़ा रहा, स्थिर। समझदानी रीत गई कि अब क्या करे? क्या कहे?

“सोसायटी का चपरासी है लाखाराम,” इंस्पेक्टर ने उसके पिलपिलाए चेहरे की लाज रखते हुए कहा, “ट्रांसफर चाहता है, सर!”

“अच्छा, अच्छा...” डायरेक्टर ने अपनी हँसी को लगाम दी, तत्क्षण गंभीर हो आए। ऐसी शक्ल बनाई कि जैसे आज तक यह चेहरा कभी सपने में भी न हँसा होगा। लाखा आश्चर्य से ताकता रह गया।

“कहाँ का रहने वाला है?”

“उधर का ही साब।”

“इधर कैसे आ गया?”

“बस, आ गया साब...अप्सरान, हेल्परान की मरजी।” लाखा रोने को हो आया, “गरीब हूँ साब...बाल-बच्चा संपूरन गिरस्ती वहीं है। आने-जाने में आधी तनखा लग जाती है, साब। साल-खाँड में एक दफे...”

“कितने बच्चे हैं?”

“चार हैं साब।” लाखा ने उम्मीद से देखा। कच्ची गृहस्थी यानी चार बच्चों का खयाल कर साहब जरूर पिघल जाएँगे। मगर उधर तो डायरेक्टर महोदय की त्योरी आसमान छू गई। वे उसे आग्नेय नेत्रों से घूरते रहे, लगभग दो-तीन मिनट। लाखा भय से पीला पड़ गया। हे प्रभू! संकटमोचन वीर! जे का गजब भया...रच्छा करो नाथ! छमा करो दीनबंधु...त्राहि-त्राहि पाहिमाम...वह आँखें झुकाए मन ही मन गिड़गिड़ा रहा था।

“ये स्साला, लाखाराम,” डायरेक्टर अब बेसुध हँसे जा रहा था, “पूरा का पूरा लखनपुरा बसाए देता है...”

बड़ा मनोरंजक प्रसंग छिड़ गया था, इसलिए इंस्पेक्टर भी थोड़ा मुसकराया। काठ के उल्लू-सा खड़ा लाखा भी इस हास्य की बावड़ी में उतरने लगा। तभी डायरेक्टर की आँखें फिर कौड़ी-सी चमक उठीं। लाखा की हँसी करुणा में बदल गई। वैसे ही, जैसे बच्चे रोते-रोते हँसने और हँसते-हँसते रोने लगते हैं।

“बस! गरीबी, भुखमरी, बदहाली और पिछड़ेपन का असल कारण यही है,” वह किसी जुझारू अन्वेषक की तरह ठोस स्वर में बोल रहा था, “ये तबका फौज बढ़ा-बढ़ाकर हमारे लिए प्रॉब्लम खड़ी करता जा रहा है...”

“मैं पूछता हूँ...” अचानक उसकी आवाज बहुत तीखी होकर भर्त्सना-भरे लहजे में ऊँची तन गई, “तुमने और क्या प्रोडक्शन किया? उपज बढ़ाई हो तो...बीवी के वास्ते हथकरघा उद्योग डाला होता तो...या फिर ईंधन की बचत के लिए गोबरगैस-प्लांट! नहीं तो कम से कम सोलर कुकर ही खरीदा होता! एक पेड़ तो लगाया नहीं जाता, ऊपर से जंगलों का सफाया! अरे, दिनभर मटरगश्ती करती हैं तुम्हारी औरतें, वे बागीचे भी नहीं लगा सकतीं? बहुत मुलायम हैं क्या? और प्रोपेगंडा करते हो कि हम भूखे हैं, नंगे हैं, हमें काम नहीं मिलता...और उधर बच्चों का मैन्युफैक्चरिंग चालू! यही मॉरल है तुम्हारा? तुम साले इस कंट्री का कबाड़ा करके छोड़ोगे!”

“तूने ऑपरेशन कराया?” इंस्पेक्टर ने अपनी भूमिका निभाई।

लाखा ने अपराधी-भाव से न में गरदन हिला दी। डायरेक्टर अब खामोश था। शायद, अपने व्यक्तित्व का माहात्मय देखने के लिए! और इंस्पेक्टर एक तरह से बिचौलिया, उत्प्रेरक अथवा कार्य-कारण वाली जरूरी कड़ी। वह किसी विलायती कुत्ते-सा रोबदार स्वर में घुरघुराया, “तो...पहले जाके ऑपरेशन करा, फिर आना सर के पास...”

लाखा अब खूब खुश है। उसने लक्ष्य भी पा लिया है और नियंत्रण भी, पर ये साली...उसने पाँयते लुढ़की घरवाली को ठेला, “चल, उट्ठ!” वह उनींदी हो चुकी थी। आँखें मलती हुई बोली, “ऐं! मुन्ना रोया क्या?”

“मेरा भूत रोया होगा,” लाखा ने कहना चाहा। लेकिन तभी हकीकत में कोठरी की तरफ से चिल्ल-पुकार सुनाई दी, “हाय मम्मी! जे क्या...देखो मम्मी!...हाय दैया! मम्मी री...ओ...!”

यह लड़कियों का कोलाहल था। वह एकबारगी धक्क से रह गई। लटपटाते पैरों से भागी कि सयानी लडकियाँ सब जान जाएँगी...आज अच्छी पोल खुली! जाकर सबसे पहले दीया बुझा देगी...और रजाई के पल्लू में मुँह ढाँप लेगी। फिर सुबह देखा जाएगा। कोठरी में आकर देखा कि दीया तो कब का बुझा पड़ा है। रोशनी की जगह धुआँ ही धुआँ। कपड़ों और पुरानी रुई की जलाँध! हाय राम! ये क्या?...उसका दिमाग शून्यता से भर उठा। लुंज-पुंज जैसे छूछे हाथों उसने मुन्ने के ऊपर से धुँधकती रजाई उठाई। रीती बुझी हुई ढिबरी पटाख से देहरी पर गिर पड़ी। उसके शरीर की सारी शक्ति जैसे क्षणांश में ही निचुड़ गई। वह मुन्ने के धू-धू कर जलते स्वेटर पर अपनी कनपटियाँ रगड़कर किसी दुखियारी गाय-सी बेपनाह रँभा उठी।

सभी हतप्रभ थे। निरी देर तो कुछ सूझा ही नहीं, भौंचक्के-से एऽऽ की चीख छोड़ते खड़े रहे। जैसे अचानक धरती फट गई हो, या पहाड़ टूट गया हो। लड़कियों का कोहराम जारी था...फिर देवरानी ने रोते-कलपते, काँपते हाथों से मुन्ना को निर्वस्त्र कर दिया। सभी ने नाड़ी पकड़ी। बार-बार सीने से कान सटाकर धड़कन सुनी। पर, सब-कुछ नि:शेष हो चुका था — खोखले आसमान की तरह रिक्त।

—सुरेश कांत

7-एच, हिमालय लीजेंड

न्याय खंड-1, इंदिरापुरम

गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) – 201014

drsureshkant@gmail.com

०००


कविता    

-कैलाश मनहर

–वरिष्ठ कवि

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इतनी सारी दुविधायें हैं जीवन में कि

सुविधा के लिये स्थान ही नहीं है कहीं

मरते हुये बच्चे पर नज़र गड़ाये बैठे गिध्द हैं

और कहीं एक हरिणी है

अपने छौने को बचाने के लिये

सुपुर्द करती बाघ के जबड़ों में अपनी देह

आह!

अख़लाक की चीखें गूँज रही हैं कानों में

और उस स्त्री का चेहरा जो

कड़ा कर के अपना मन कूद रही है

अथाह गहरे कूँए में

बिलख रहा है पाट पर बैठा दुधमुँहा बच्चा

और सरकार के लिये जरूरी है

शहरों का नाम बदलना

बचाओ!बचाओ!की चीत्कारें गूँज रही हैं

हर दिशा में बदहवास

दौड़ते लोग दिखाई देते हैं

सुनो!

कुछ दिन के लिये स्थगित रखो प्रेम

अभी ज़हर बहुत है हवाओं में

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                                       --कैलाश मनहर

स्वामी मुहल्ला

मनोहरपुर (जयपुर -राज.)

पिनकोड-303104

मोबा. 9460757408

००००


प्रेम संभव

राजेन्द्र स्वर्णकार

-कवि ,चित्रकार, फिल्म मेकर

नाम हुआ है बहुत हमारा जिस दिन से बदनाम हुए !

पहले प्रेमी, पूजक, पागल, ...आख़िरकार ग़ुलाम हुए !

प्रीत-पथिक बन कर ख़ुद को खोया है ख़ुद को पाया है !

ख़ुद मीरा, ख़ुद राधा-गोपी, ख़ुद मोहन घनश्याम हुए !

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क्या जीवन का लक्ष्य, मर्म क्या, भेद गूढ़ अनजाना है !

वृहद-विराट अनंत ; सूक्ष्मतम लघुतम ताना-बाना है !

प्रश्न नहीं अनसुलझा, शेष रहस्य नहीं जग में कोई !

प्रेम किया जिसने उसने ही ईश्वर को पहचाना है !

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जिसके मन में प्रेम उसे अपना या कोई ग़ैर कहां ?

जग भर से उसकी यारी है, प्यार सभी से, ...बैर कहां ?

ज़र्रा-ज़र्रा जन्नत उसके लिए फ़रिश्ता हर इंसां !

मक्का मथुरा काबा काशी कहां हरम या दैर कहां ?

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बलिहारी उनकी जिनके मन पावन निर्मल सुंदर हैं !

गुरुद्वारे गिरजे मस्जिद मंदिर सब उनके अंदर हैं !

है उनमें भगवान बसा, ख़ुद उन्हें ख़ुदा सिजदे करता !

खो देते सर्वस्व प्रेम में... वे कुबेर वे इंदर हैं !

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अपने और पराये का जब है विभेद मन से मिटता !

तेरा-मेरा जाति-धर्म का धुआं-कुहासा सब छंटता !

कटता-घटता बंटता पटता नहीं कहीं वह ना डटता !

प्रीतम को दिन-रैन सुमिर कर नाम उसी का वह रटता !

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प्रेम किया है जिसने यारों ! उसकी बात निराली है !

हर दिन उत्सव जैसा, हर दिन होली है दीवाली है !

हर पर्वत वह लांघ चुका, हर सागर पार किया उसने

अतल-वितल की गहराई, नभ की ऊंचाई पा' ली है !

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हर अन्वेषण और परीक्षण यहीं पूर्णता पाता है !

और जानने को कुछ भी तो शेष नहीं रह जाता है !

प्रेम समस्याओं का हल है, उत्तर सारे प्रश्नों का !

प्रेम आदि है, प्रेम अंत है, प्रेम प्रणीत प्रदाता है !

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प्रेमी से सामीप्य अन्य का कब प्रेमी स्वीकार करे ?

कटु वाणी राधा के मुख की बन' मुरली पर वार करे !

प्रेम असंभव को भी संभव करे समर्पण अर्पण से !

युक्ति लगा' ...कान्हा पर बंशी तब ही तो अधिकार करे !

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प्रेम किया मीरा ने सारे सुख महलों के त्याग दिए !

भटकी वन-वन जोगन बन' मन प्रेम और अनुराग लिये !

साध, लक्ष्य - बस प्रिय को पाना, ...रैन-दिवस चलते रहना,

आग धधकती सांसों में ले'कर, ...ले'कर बैराग हिये !

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वादा वचन हिसाब न मांगे, प्रेम मात्र देना जाने !

मात्र समर्पण मात्र समर्पण मात्र समर्पण ही माने !

दीवानों-से काम करे... दीवाने पूरे दीवाने !

बही-पोथियां फाड़', तोड़ कर तकड़ी फैंके दीवाने !

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!

राजेन्द्र स्वर्णकार

पुत्र - स्व. श्री शंकरलाल जी स्वर्णकार

गिराणी सोनार मौहल्ला,

बीकानेर 334001 

राजस्थान

०००००००


व्यंग्य-कथा

यार बिना चैन कहां रे-

  अशोक गौतम

–प्रोफेसर-व्यंग्यकार

हमारे मोहल्ले में गधा गधी का एक जोड़ा मत पूछो कितने प्रेम से रहता था। उनके बीच के प्रेम को देख कई बार तो मुझे अपने वैवाहिक जीवन पर बहुत गुस्सा आता। काश! ऐसा आदमी होने से बेहतर तो मैं इस जैसा गधा होता। आदमी होकर भी कौन से तीर मार लिए मैंने ? सारा दिन रेता बजरी हसंते हुए ढो लेता। कम से कम गधी तो मुझे रिकोग्नाइज करती।

आह! क्या प्रेम था उन दोनों में! उनका प्रेम देख कई बार तो मेरा मन करता कि मैं भगवान से निवेदन कर डालूं कि हे भगवान ! मुझे अगले जन्म में ऐसा ही जीवन साथी देना, चाहे मुझे गधा बना देना।

मालिक के साथ दोनों बतियाते, ठहाके लगाते एक साथ काम पर जाते। लंच टाइम में एक साथ रेस्ट करते और लंच टाइम खत्म होते ही दोनों एक दूसरे को मुस्कुराते हुए देखते रहते और मालिक उनको रोते हुए लादता रहता।

कई बार मैंने अपनी बीवी को उनके इस स्वर्गिक रिश्ते के दर्शन करवाने की सोची भी , पर चुप रहा। एक तो पहले ही सिर पर चौबीसों घंटे आसमान उठाए रहती है , ऐसे में जो उसे इनके प्यार की बात दिखाई तो पता नहीं सिर पर और क्या क्या उठा ले?

पर पता नहीं गधा गधी के इस प्रेममयी जोड़े को किस दिलजले की बुरी नजर लगी कि एक दिन पता नहीं गधे को क्या हुआ कि अचानक उसके दिल में दर्द उठा और इससे पहले कि गधा मालिक से कुछ कह पाता गधी के प्राण पखेरू उड़ गए।

गधे के बिन गधी परेशान! दरिंदों से भरे समाज में अकेली क्या करे? उनसे कैसे अपनी आबरू बचाए? कदम कदम पर दरिंदे। अकेली गधी को लगा ज्यों गधे के जाने के बाद उसकी दुनिया ही उजड़ गई हो जैसे। उसने गधे के वियोग में आहत हो गधे के साथ सती होना भी चाहा पर उसके अभिभावक ने उसे ऐसा करने से यह कहते हुए रोक दिया कि अब सती प्रथा गैर कानूनी घोषित हो चुकी है। यह सुन बेचारी गधी सती होने से रूक गई।

गधी इत्ती उदास कि इत्ता तो कोई आदमी के जाने पर भी नहीं होता।

धीरे धीरे वह गधे के गम में इतना डूबी कि पूछो ही मत। न उसका मन खाने में लगता न कुछ पीने में। अकेले काम पर तो वह जाती ही नहीं थी। उसके अभिभावक ने उसे दुनियादारी की कई बातें सुनाई, पर गधी का वियोग कम न हुआ। गधी के अभिभावक को लगा कि कहीं गधी वैराग्य न धारण कर ले। कहीं उसका दुनियादारी से मोह भंग न हो जाए।

और उस दिन तो हद ही हो गई। गधी का अभिभावक जब सुबह सुबह गधी के बाड़े में उसे प्रेम प्यास के गीत सुनाने निकला तो उसने देखा कि गधी माथे पर बड़ा सा तिलक लगाए,  ध्यान की मुद्रा में दुनिया से बेखबर पता नहीं किस मुद्रा में बैठी वियोग के भजन गा रही थी ऐसे जैसे वह भगवान के चरणों में शेष जीवन व्यतीत करने की कसम खा चुकी हो। यह देख गधे के अभिभावक को हैरानी भी हुई और परेशानी भी। उसे लगा, जरूर गधी पिछले जन्म में भगवान में विश्वास रखने वाली पवित्र आत्मा रही होगी! वरना यहां तो बीवी अपने शौहर के मरने के बाद वैराग्य तो छोड़िए, वैरागनें तक दूसरों के पतियों को अगुआ कर घर बसाए जा रही हैं।

गधी के अभिभावक ने आखिर तय किया कि इससे पहले जो जवान गधी होल टाइमर वैराग्य धारण कर ले ,उसे कुछ करना चाहिए।

और उसने गधी के अकेलेपन को खत्म करने की सोची। वह जान गया था कि गधी गधे के वियोग में बिंधी है। इससे पहले कि वह वियोग से परेशान हो आत्महत्या वाला कदम उठाए उसे उसके लिए सारे काम छोड़ इनसानियत के नाते जीवन साथी का प्रबंध करना ही होगा।

एक दिन गधी के अभिभावक ने बातों ही बातों में गधी के मन की बात जाननी चाही,‘ हे गधी! क्यों न मैं तुम्हारा पुनर्विवाह कर दूं?’ यह सुन गधी के मन में कुछ कुछ हुआ तो गधी का अभिभावक भांप गया कि ....

‘ पर मुझसे अब विवाह कौन करेगा?’ गधी ने अपनी भजनों की किताब परे रखते लंबी आह भर पूछा तो उसके अभिभावक ने कहा,‘ दुनिया में गधों की कमी थोड़े ही है। कदम कदम पर गधे मिल जाएंगे।’

‘ पर मेरा तो.....’

‘ तो क्या हो गया। समाज अब बहुत आगे जा चुका है। वह एक तो क्या दस दस विवाह कर ने लगा है। आज के आदमी के पास विवाह करने के सिवाय और दूसरा काम है ही क्या?’

‘ हे मेरे प्राणप्रिय! जैसी आपकी इच्छा! आपकी इच्छा के विपरीत जब सपने तक में मेरा गधा तक नहीं गया तो मेरी क्या औकात!’

....और गधी के अभिभावक ने शहर की दीवारों पर गधी के लिए सुयोग्य गधे के बारे में पोस्टर चिपका दिए। शहर की दीवारों पर लगे उस पोस्टर को जो भी अविवाहित, विवाहित पढ़ता, पोस्टर और अपने पर हंसता और आगे हो लेता।

उस रोज जब गधी का मालिक अपने अकेलेपन को भूल , गधी के अकेलेपन के बारे सोचता सोचता हार चुका था कि तभी अचानक गधी के अभिभावक को फोन आया,‘ सर! नमस्कार! आपने ही अपने गधे को गधी बारे शहर में पोस्टर लगाया था न?’

‘ हां! क्यों? कोई मेरी गधी लायक योग्य सुयोग्य गधा है कहीं?’ गधी से अधिक गधी का अभिभावक प्रसन्न।

‘हां है तो सही पर....’

‘कोई बात नहीं। मैं गधे की हर शर्त मानने को तैयार हूं पर बस...’ गधी से अधिक गधी का अभिभावक विवाह को बेताब।

‘ सो तो ठीक है पर....’दूसरी ओर से आवाज आई।

‘पर क्या??’ गधी का अभिभावक फिर परेशान,‘ मैं अपने गधी की शादी अपने विवाह से अधिक इतनी धूमधाम से करूंगा कि... पर हां! रखूंगा उसे घर दामाद बनाकर ही। गधा जैसा भी हो चलेगा। गधी को एक जीवन साथी चाहिए बस। मैं आपको अपने गधी की ओर से विश्वास दिलवाता हूं कि गधी के बदले मैं गधे की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेता हूं।’

ज्यों ही बात फाइनल हुई तो गधी के अभिभावक ने यह बात अपनी गधी को सुनाई जो उस वक्त अपने को परमात्मा में लीन करने की कोशिश कर रही थी। उसने तय कर लिया था कि अब वह अपना शेश जीवन परमात्मा के चरणों में वैराग्य के भजन गा काटेगी।

‘अरी गधी! एक खुशखबरी है,’ गधी के अभिभावक ने गधी से अधिक खुश होते गधी से कहा।

‘क्या खुशखबरी है? तुम फिर विवाह करने जा रहे हो क्या?’

‘नहीं! मैंने तुम्हें दूसरा जीवनसाथी ढूंढ लिया है। पहले वाले गधे से भी लाख दर्जे बेहतर गधेपन वाला! ’ गधी के अभिभावक ने उसे बताया तो गधी ने हाथ में ली माला परे फेंकी और अपने अभिभावक के गले लगते बोली,‘ मतलब?’

‘ हां! यार! बड़े दिनों से मुझसे तेरा अकेलापन नहीं देखा जा रहा था। सच कहूं तो तुम्हारे दुख को देख तुमसे अधिक तो मैं बीवी के होते हुए दुखी था। तो ऐसा है , कल तुम्हारा विवाह करवा तुम्हारी गृहस्थी बसवा देता हूं।’

‘ सच मेरे खुदा! तो मेरे विवाह में मंत्र कौन पढ़ेगा? किस रीति से मेरा पुनःविवाह होगा?’ लंच कहां रखा है?’ गधी ने अपने अभिभावक कम मालिक के आगे नाचते एक साथ कई प्रश्न कर डाले तो अभिभावक कम मालिक ने खुशी से पागल गधी की आंखों के आंसू पोंछते कहा,‘ पगली! अधिक खुश मत हो। देखना, कहीं खुशी के मारे तेरा हार्ट भी फेल न हो जाए कहीं। तेरे विवाह के मंत्र पढ़ने को मैंने पादरी से बात कर ली है। अबके अंग्रेजी स्टाइल में तेरी शादी नहीं,री मैरिज होगी। वह भी ऐसे कि तेरे बिना तेरे वियोग में स्वर्ग बैठा तेरा इंतजार करता गधा जब वह नजारा देखेगा तो अब्दुल्ला हो वहीं नाचने लग जाएगा,’ गधी के अभिभावक कम मालिक ने गधी से कहा तो वह मालिक की हिदायत देने के बाद भी मालिक के आगे ऐसे नाचने लगी ज्यों दूल्हे के दोस्त घोड़ी के आगे नाचते हैं। तब गधी के अभिभावक कम मालिक ने गधी को नाचने से रोकते कहा,‘ बस! अब नाचना बंद कर! कल को थक गई तो गधे को वरमाला कैसे पहनाएगी ?’ 

दोस्तो! गधी की पिछले संडे को नई शादी हो गई। गधी से अधिक उसका मालिक खुश है तो अपने मालिक से अधिक गधी खुश । गधी को गधा मिल गया तो लोकतंत्र को रेता बजरी ढोने को गधा।

उसने अब माला, धोती, फिल्मी गीतों पर बने भजनों का संग्रह अपने मालिक को पकड़ा दिए हैं।

०००००

अशोक गौतम

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड़

नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन-173212 हि.प्र

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रचनाकार: साहित्यम् - फेस बुक पर ई-पत्रिका वर्ष-१ अंक -१ प्रवेशांक
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