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मानवता का प्रथम महासमन्वय --- पौराणिकता आधारित कथा -- डॉ. श्याम गुप्त

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सभी कबीलों को एक करके समन्वित करने वाले दक्षिण भारतीय भूभाग के राजा शंभू चिंतित थे। उत्तर क्षेत्र से आये हुए मानवों से प्रारम्भिक झड़प के पश्चात ही उनके सेनापति इन्द्रदेव इस सन्देश के साथ आये कि वे आपस में मिलजुल कर परामर्श करने के इच्छुक हैं। अंततः उन्होंने मिलने का निश्चय किया।

पितामह ! शम्भू जी पधारे हैं, इन्द्रदेव ने ब्रह्मा जी को सूचित किया।

उन्हें सादर लायें इन्द्रदेव, वे हमारे अतिथि हैं, सुना है वे अति-बलशाली हैं साथ ही  महाविद्वान् व कल्याणकारी शासक भी, ब्रह्मदेव बोले।

शंभू दक्षिण भारतीय भूभाग के एकछत्र अधिपति थे। सुदूर दक्षिण से लेकर मध्यभारत व विन्ध्य-क्षेत्र तक एक उन्नत वनांचल मानव-सभ्यता-संस्कृति का फैलाव था, वे इसके निर्माता थे व जन-जन के पूज्य राजा - जाय जन्तोर राजाल ।

ब्रह्मा विष्णु व इंद्र मानसरोवर-सरस्वती-सुमेरु क्षेत्र में विकसित एक अति उन्नत मानव सभ्यता-संस्कृति के प्रतिनिधि थे। ब्रह्मा प्रजापति, विष्णु अधिपति व इंद्र सेनापति तथा अन्य देवता विभिन्न विशिष्ट शक्तियों के धारक थे।

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आबादी बढ़ने पर पृथ्वी अर्थात सुमेरु से हिमालय-क्षेत्र के पार बसने की इच्छा से इंद्र व विष्णु के नेतृत्व में सरस्वती के किनारे किनारे चलकर इस प्रदेश में पधारे। कुछ प्रारम्भिक मुठभेड़ों के पश्चात राजा शम्भू की विद्वता व शक्ति के बारे में जानकर कि वे समस्त प्रजा का कल्याणकारी भाव से पालन करते हैं,  ब्रह्मदेव ने तुरंत युद्ध रोकने का आदेश दिया एवं उन्हें इंद्र के द्वारा समन्वय का सन्देश भजा गया और वे भी समन्वय के पक्ष में थे अतः पधारे।

निर्भीक मुद्रा में, हाथ में त्रिशूल, कमर में बाघम्बर लपेटे राजा शंभू का स्वागत करते हुए विष्णु बोले, आइये शम्भू जी, सभा में स्वागत है, आसन ग्रहण कीजिये।

परन्तु आप तीन लोग एक समान स्थित हैं, आपके अधिपति कौन हैं ? शंभू आश्चर्य से पूछने लगे।

ये ब्रह्मदेव हैं समस्त मानव जाति के पितामह प्रजापति, मैं विष्णु व ये इन्द्रदेव। हम सभी आपस में मिलकर सभी समस्याएं-आर्थिक, सामाजिक व युद्ध संबंधी, सुलझाते हैं, हल करते हैं|

ओहो ! ब्रह्मदेव ! आदिपिता, वे तो हमारे भी पितृव्य हैं शम्भु प्रणाम करते हुए, प्रसन्नता से बोले, अब भी स्मृति में सुमेरु-क्षेत्र ब्रह्मलोक की यादें हैं एवं वे भी जब हम लोग इस क्षेत्र को छोड़कर दिति-सागर पार करके उत्तर सुमेरु क्षेत्र में जाकर बसे थे।

      ‘अति शोभनं शम्भू ‘ ब्रह्मा जी कहने लगे,  दिति-सागर (टेथिस समुद्र) के हट जाने पर उस क्षेत्र में आबादी बढ़ने पर हमने प्रजा को यहाँ पर बसाने का निर्णय किया। सुदूर उत्तर तो समस्त हिम से आबद्ध रहता है अतः बसने योग्य नहीं है।’ ‘तो तुम पुत्र शंकर हो, रूद्र-शिव जो साधना हेतु सुमेरु से कुमारी-कंदम हेला द्वीप चले आये थे।’ तुम्हारी व तुम्हारे क्षेत्र एवं प्रजा की प्रगति देखकर मैं अति प्रसन्न हूँ।

जी पितामह, आप सब तो अपने ही लोग हैं, युद्ध की क्या आवश्यकता है, आज्ञा दें, परन्तु मेरे लोग कोई भी अधीनता स्वीकार नहीं करेंगे।

अधीनता कभी हमारा मंतव्य व उद्देश्य नहीं रहा, शंभू जी, उचित कहा आपने, युद्ध की क्या आवश्यकता है, विष्णु बोले, समन्वय, मिलजुल कर रहने पर ही उस क्षेत्र, प्रजा व संस्कृति का विकास होता है, ज्ञान का प्रकाश उत्कीर्ण होता है, दोनों संस्कृतियाँ व सभ्यताओं की सम्मिलित, समन्वयात्मक प्रगति होती है। सब अपनी अपनी संस्कृति अपनाते हुए मिल-जुल कर निवास करेंगे। उन्होंने सभी को आश्वस्त करते हुए कहा ।

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स्वीकार है, शम्भू कहने लगे, यद्यपि विरोध होगा, सभी कबीलों, वर्गों को मनाना पडेगा परन्तु मैं सम्हाल लूंगा। प्रगति हेतु समन्वय तो आवश्यक ही है।

आभार है शम्भू जी, विष्णु व इंद्र बोले, आपका यह कदम मानवता के इतिहास में स्वर्णिम निर्णय कहा जाएगा।

हम इस समन्वित संस्कृति को ज्ञान के प्रसार, प्रकाश की संस्कृति, विज्ञजनों की, विद्या रूप वैदिक-संस्कृति कहेंगे। भाषा व सभी ज्ञान का संस्कार आप करेंगे ताकि एक विश्ववारा संस्कृति का निर्माण हो। मेरा आशीर्वाद सभी के साथ है, सब मिल जुल कर रहें ।. ब्रह्मदेव ने प्रसन्नतापूर्वक सभी को आश्वस्त करते हुए कहा।

इस प्रकार एक उन्नत वनांचल संस्कृति, शायद पूर्व हरप्पा एवं उन्नत ग्राम्य संस्कृति, का समन्वय हुआ जो विश्व का प्रथम मानव समन्वय था। इसे शिव-विष्णु समन्वय भी कहा जा सकता है। यही संस्कृति आगे प्रगतिमान होकर हरप्पा ( हरियूपिया ), सरस्वती सभ्यता, सिन्धु-घाटी सभ्यता व देव-मानव वैदिक सभ्यता कहलाई और विश्व भर में फ़ैली।

------डा श्याम गुप्त , के-३४८, आशियाना , लखनऊ-२२६०१२

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