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एक रोचक विश्लेषण // रार और तकरार // डॉ सुरेन्द्र वर्मा

अटल जी की एक कविता है, ‘हार नहीं मानूँगा / रार नहीं ठानूँगा’। जब भी मैं इसे पढ़ता हूँ, असमंजस में पड़ जाता हूँ। अगर हार या जीत नहीं होगी, तो लाजमी है रार तो बनी ही रहेगी। लेकिन अटल जी शायद उस जय-विजय स्थिति (विन-विन सिचुएशन) की बात कर रहे हैं जिसमें किसी पक्ष की हार नहीं होती। लेकिन ऐसा वास्तव में होता कहाँ है ?

कहना मुश्किल है की रार से तकरार होती है कि तकरार रार को जन्म देती है। अगर रार न हो तो तकरार काहेकी ? लेकिन अक्सर यह भी देखा गया है कि तकरार सिर्फ तकरार तक ही सीमित नहीं रहती, जल्दी ही झगड़े-फसाद में बदल जाती है और लोग एक दूसरे से रार ले बैठते हैं।

राजनीति में तो यह अक्सर होता है। अपनी राजनीति चलाने के लिए किसी एक मुद्दे को लेकर रार शुरू हो जाती है। और मुद्दा अगर सुलझ भी जाए, भले ही उसे उच्चतम न्यायालय ही क्यों न सुलझा दे, तो भी, राफेल की रार की तरह, रार बरकरार रहती है। फैसले तक में भी कोई न कोई कमी निकालने से लोग बाज़ नहीं आते। रार जो बनाए रखनी है। परनाला तो यहीं बहेगा, कुछ भी हो जाए।

रार बुरी चीज़ है। अगर दो सगे भाइयों में कभी रार ठन जाए तो, जैसा कि मुहावरा है और जो वाजपेयी जी ने ही इस्तेमाल किया है, दूध तक में दरार पड़ जाती है।

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रार के लिए कोई भी मुद्दा हो सकता है। व्यक्तिगत, सामाजिक, पारिवारिक या राजनैतिक। लेकिन कभी कभी साहित्यिक मुद्दे भी रार का कारण बनते देखे गए हैं। साहित्यिक चोरी एक आम चीज़ है और वह दो साहित्यकारों के बीच अक्सर रार का कारण बन जाती है। कवियों में इस तरह की रार आमतौर पर पाई जाती है। किसी कम प्रसिद्ध कवि की अच्छी पंक्तियाँ अपनी बनाकर कवि-सम्मेलनों में धड़ल्ले से पेश कर देने में लोग गुरेज़ नहीं करते। एक बार एक तथाकथित कवि ने जब इसी तरह की कुछ पंक्तियाँ पढीं, तो उन पंक्तियों का वास्तविक रचयिता वहीं मंच पर विराजमान था। वह रार खा गया। बोला, ये कविता तो मेरी है। अन्य कवियों ने भी इस बात का समर्थन किया। लेकिन चोरी से पढ़ने वाला तथाकथित कवि बड़ा घाघ निकला। कहने लगा, मैंने तो आपके सम्मान में ये पंक्तियाँ पढी थीं। अपनी कविता तो मैं अब पढूंगा।

वह रार ही क्या जो किसी न किसी अंजाम तक न पहुंचे। अक्सर रार के चलते हाथा-पाई तक हो जाती है। लेकिन रार कभी-कभी एक खुशनुमा मोड़ पर आकर सुलझ भी जाती है। रार है तो उसका समाधान भी है, बस समाधान ढूँढ़ने की मानसिकता चाहिए। अक्सर मियां-बीवी में किसी बात को लेकर रार हो जाती है। दोनों अपनी अपनी बात पर डटे रहते हैं। पर रार की लम्बी अवधि असह्य हो जाने पर, दोनों में से कोई एक तब रार से बाहर आने का रास्ता ढूँढ़ ही लेता है।

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रार न हो तो सारी अदालतें खाली पडी रहें। बेचारे वकील भूखे मर जाएं। वकील बेचारा तो रार का ही खाता है। दो पक्षों की रार में वकीलों की बन आती है। दोनों पक्षों के वकील अच्छी तरह जानते हैं कि रार का कारण क्या है और झगड़ा किसने किया लेकिन दोनों ही इस पहेली को जज पर छोड़ देते हैं कि वही बूझे।

भाषा की दृष्टि से देखें तो कहा जा सकता है कि तकरार में ‘रार’ निहित है। वास्तविकता भी यही है। पर जहां तक रार का सवाल है, उसमें तकरार अलग से लाई जाती है। ज़रूरी नहीं है की रार हमेशा तकरार को जन्म दे। रार रहते हुए भी हाथा-पाई को टाला जा सकता है। लोग बरसों, कभी कभी तो ताउम्र, रार पाले रखते हैं, और सहज बने रहते हैं। सचमुच तारीफ़ के काबिल हैं ऐसे लोग !

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी – १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

व्यंग्य 906304188095322145

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