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लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन 2019 - प्रविष्टि क्रमांक - 146 व 147 // सुरेश सौरभ

प्रविष्टि क्रमांक - 146

सुरेश सौरभ

वसूली 

   पूरी ट्रेन के अंदर बद्तमीजियाँ करते हुए, पैसा वसूलते हुए मेरे पास वह आया। ताली पीटते हुए बोला - चल निकाल पैसा। उसकी उंगलियों में असे-फंसे नोटों की झालर देख कर उसे घूरते हुए मैं बोला- शरम नहीं बद्तमीजियाँ करते हुए पैसा झींटते हुए।" इतना कहना था वह लाल-पीले होते हुए जोर- जोर से तालियाँ पीटते हुए गालियाँ बकने लगा।
   "अजीब गुंडागर्दी है ट्रेन में अभी सही कर दूंगा।' इतना कहना था  , वह लहँगा उठा कर तालियां पीटते हुए ,-बोला छक्का हूं। छक्का हूं बे। सही कर सही कर..
     बर्थ में तार-तार होती अपनी इज्जत को संभालते हुए अपना पाला बदलते हुए फौरन हाथ जोड़ते हुए मैं बोला--माफ कर दो भाई गलती हो गई।
  फिर वह ताली पीटते हुए मुझसे परे हो गया और मेरी जान छूट गई। अब वह ताली पीटते हुए दूसरे यात्रियों के गले पड़ता हुआ , पूरी उद्दंडता से वसूली पर पिला पड़ा था।
     बर्थ से उसे जाता देख पास में बैठे मेरे एक सहयात्री बोले- कहीं अकेले मिल जाएं तो इन्हें दिखा दूं।
     दूसरा- फर्जी वसूली है। कौन बोले जो बोले अपनी इज्जत तोले।
   तीसरा- सरकार को इनका कोई समाधान निकलना चाहिए।
चौथा-- होते ही हैं ये सब बद्तमीज क्या करोगे इनका।"
   सदियाँ बीत गईं। इनका क्या किया जाए कोई एकमत नहीं है। कहीं बस, कहीं ट्रेन,कहीं शादी, कहीं ब्याह, कहीं कुछ कहीं कुछ सब कहीं अपना मुस्तबिल तलाशते हिजड़ों का आखिर स्थाई समाधान कब निकलेगा। यह चिंता अब मेरे माथे पर बल ला रही थी।

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प्रविष्टि क्रमांक - 147

सुरेश सौरभ

हिजड़ा  

'३१ हजार'
'नहीं नहीं नहीं'।
'चलो २१ निकालो। लल्ला तुम्हारा अच्छा रहे। बहू दूधो नहाए पूतो फले।'
'२१ बिलकुल नहीं देंगे। पैसे क्या डाल में लगते हैं। कतई नहीं देंगे।'
'चलो झिक-झिक न करो ११ हजार निकालो।'
'११ हजार ओह ! पॉच सौ से ऊपर नहीं देंगे। लेना हो लो वर्ना तुम लोग रास्ता नापो।
'क्या ' 'तालियां पीटते हुए । लंहगा ऊपर उठाते हुए,' हम रास्ता नापे , हम रास्ता नापे पहले ये दूरदर्शन देखो लल्ला।'..
    'अब हाय-तौबा मच गई । फौरन पांच हजार में सौदा पट गया । सब हिजड़े ताली पीटते हुए गेस्ट हाउस से बाहर चले गये।
  अब सब बारातियो का चेहरा लटक चुका था। अब  पैसे की हील-हुज्जत नहीं, हिजड़ों के लहँगा उठाने की चखचख होने लगी।

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सुरेश सौरभ
निर्मल नगर लखीमपुर खीरी पिन,-२६२७०१

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1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय, आपकी रचना सराहनीय है विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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