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प्राची - जनवरी 2019 : डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय की उपलब्धियाँ

उपलब्धियां

डॉ. उपाध्याय की प्रकाशित कृतियाँ, पुस्तकों का सूची सम्पादन एवं पुस्कार-सम्मान

डॉ. उपाध्याय की प्रकाशित कृतियाँ

1. आलोचक डॉ. नगेन्द्र : कृतित्व के विविध आयाम

2. समन्यवादी आलोचना

3. शुक्लोत्तर समीक्षा के नए प्रतिमान

4. समन्वयवादी समीक्षा और डॉ. नगेन्द्र

5. प्रेरणा के स्रोत

6. हिन्दी आलोचना : विकास एवं प्रवृत्तियाँ

7. अद्यतन काव्य की प्रवृत्तियाँ

8. मिथकीय समीक्षा (पुरस्कृत)

9. समन्वयवादी आलोचना : नव्य परिप्रेक्ष्य

10. शिक्षा और संस्कृति (पुरस्कृत)

11. परम्परा और प्रयोग

12. गोपालदास नीरज : सृष्टि और दृष्टि

13. हिन्दी आलोचना : बदलते परिवेश

14. आपातकालोत्तर हिन्दी कविता

15. हिन्दी नाटक एवं रंगमंच (पुरस्कृत)

16. सांस्कृतिक प्रदूषण : वैश्विक परिदृश्य

17. हिन्दी साहित्य की विविध विधाएँ

18. साहित्यनुशीलन के नए क्षितिज

19. समकालीन हिन्दी कविता : दशा और दिशा

20. समकालीन हिन्दी आलोचना : दशा और दिशा

21. साहित्य समीक्षा के नए मानदंड

22. समकालीन हिन्दी कहानी : दशा और दिशा

23. समकालीन हिन्दी उपन्यास : दशा और दिशा

24. समकालीन हिन्दी नाटक : दशा और दिशा (पुरस्कृत)

25. साहित्य और संस्कृति

26. यात्रा वृतांत : सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य

27. सार्वभौम साहित्यशास्त्र और डॉ. नगेन्द्र

28. योग साधना : साहित्यक परिप्रेक्ष्य

29. ब्रिटेन प्रवास के नब्बे दिन

पशुपतिनाथ उपाध्याय द्वारा सम्पादित

पुस्तकों की सूची

1. भारतीय काव्य चिन्तन डॉ. राकेश गुप्त अभिनन्दन ग्रंथ

2. परिवेश और परिणति डॉ. शिवशंकर शर्मा राकेश स्मृति ग्रन्थ

3. मृत्युंजय मूल्यांकन प्रकल्प

4. धरोहर

5. समीक्षा के नए आयाम

6. सपनों के साहिल

7. समीक्षा के अभिनव सोपान

अन्य प्रकाशन :

साप्ताहिक हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स, साहित्य-सागर, भारतीय वाड्मय, चवर्णा, गाथांतर, हरिगंधा, साक्षात्कार, साहित्य निधि, वीणा, अन्तरा, शोध, दिशा शोध उपक्रम, भाषा, संकल्प, साहित्य भारती, उत्तर प्रदेश पत्रिका, लोकमंगल, मधुमति, पुलिस पत्रिका, अतएव, नवनिकष, शिक्षकप्रभा, प्राची सहित अनेक विश्वविद्यालयी पत्रिकाओं, अभिनन्दन ग्रन्थों, समाचार पत्रों, पत्रिकाओं आदि, में शताधिक आलेख, वक्तव्य रचनाएं, पत्र, समीक्षाएं, आदि प्रकाशित एवं पुरस्कृत।

तीन सौ से अधिक आलेख अभिनन्दन ग्रंथों, स्मृति ग्रंथों एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।

पुरस्कार-सम्मान

1. उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा साहित्य सर्जना पुरस्कार - 2001

2. ग्रन्थायन अलीगढ़ द्वारा साहित्य श्री पुरस्कार-2004

3. उ.प्र. हिन्दी संस्थान द्वारा गुलाबराय साहित्य सर्जना पुरस्कार - 2005

4. राष्ट्रीय राजभाषा पीठ द्वारा भारती भूषण एवं सारस्वत सम्मान - 2004

5. भारती परिषद प्रयाग द्वारा सारस्वती-समभ्यर्चना सम्मान-2004

6. रिसर्च बोर्ड ऑफ एडवाइजर्स अमेरिकन बायोग्राफिकल इंस्टीट्यूट-2005

7. डॉ. एम्पीज ग्रुप आगरा द्वारा सर्वोत्कृष्ट साहित्य सर्जन एवं शिक्षा सेवा हेतु सम्मान-2009

8. समीक्षा सौरभ सम्मान शिव संकल्प साहित्य परिषद नर्मदापुरम्, होशंगाबाद (म.प्र.) द्वारा-2010

9. साहित्य सागर भोपाल द्वारा विशेषांक प्रकाशित-2010

10. अखिल भारतीय अम्बिका प्रसाद दिव्य पुरस्कार भोपाल (म.प्र.) द्वारा-2011

11. समीक्षा सिन्धु सम्मान शिव संकल्प साहित्य परिषद होशंगाबाद-2012

12. भारतीय वांग्मय पीठ कोलकाता द्वारा साहित्य शिरोमणि सारस्वत सम्मान-2015

13. भारतीय वांग्मय पीठ कोलकाता द्वारा समीक्षा शिरोमणि सम्मान-2015

14. भारतीय वांग्मय पीठ कोलकाता द्वारा भारत गौरव सम्मान-2017

15. उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनउQ द्वारा रामचन्द्र शुक्ल नामित पुरस्कार-2016

16. उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनउQ द्वारा साहित्य भूषण पुरस्कार-2016

17. मनु मुक्त मानव मेमोरियल ट्रस्ट नारनौल (हरियाणा) द्वारा आजीवन साहित्य साधना पुरस्कार-2018

18. रोटरी क्लब अलीगढ़ द्वारा नेशनल बिल्डर्स एवॉर्ड सम्मान-2018

सम्मतियां

डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय एवं उनकी कृतियों पर साहित्यकारों के विचार

(शुभाशंसा- प्रो. डॉ. नगेन्द्र, दिल्ली)

साहित्य-समीक्षा में आलोचकों के व्यक्तिगत मताग्रह के कारण एकांगी प्रवृत्ति प्रायः उभर आती है। इसी का नियमन करने के लिए गम्भीर मर्मवेत्ता विभिन्न सिद्धान्तों और प्रतिमानों का समन्वय कर साहित्य-समीक्षा को उचित दिशा प्रदान करते रहे हैं। अंग्रेजी साहित्य में डॉ. जानसन, ड्राइडन तथा मैथ्यू आर्नल्ड और हिन्दी में आचार्य शुक्ल का प्रमुख योगदान यही है। समन्वयवादी समीक्षा साहित्य को उसके समग्र रूप में देखती परखती है।

प्रस्तुत ग्रंथ में डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय ने हिन्दी आलोचना के विभिन्न आयामों और प्रकार भेदों में समन्यववादी तत्वों का संधान कर इसी स्थापना को ऐतिहासिक आधार प्रदान करने का प्रयास किया है। मैं उनकी साहित्य-साधना की शुभाशंसा करता हूं।

अनेक प्रकार की विषम परिस्थितियों के होते हुए भी डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय की साहित्य-साधना निरन्तर विकासोन्मुख रही है। यह अपने आप में एक प्रकार की तपश्चर्या है जिसके आधार पर उन्होंने सर्वोच्च उपाधियां प्राप्त की हैं। आलोचना उनके अध्ययन-अनुसंधान का विशेष क्षेत्र रहा है। इसके अन्तर्गत उनकी चार कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रस्तुत ग्रंथ ‘शुक्लोत्तर समीक्षा के नए प्रतिमान’ में उसी की परिणति मिलती है। उनकी यह साधना अनवरत चल रही है और मुझे विश्वास है कि उसका सुफल भी निश्चय ही उन्हें प्राप्त होगा। मेरी शुभकामनाएं।

(डॉ. रवीन्द्र भ्रमर, अलीगढ़ मु.वि.वि.)

डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय का मन आधुनिक हिन्दी आलोचना की विविध प्रवृत्तियों में एक लम्बे समय से रमा हुआ है। आपने शुक्लोत्तर हिन्दी आलोचना पर शोध प्रबंध प्रस्तुत किया था। डॉ. उपाध्याय की आलोचनात्मक दृष्टि और अध्ययन तथा चिंतन का विकास इसमें परित्नक्षित है। उन्होंने आचार्य शुक्ल के बाद हिन्दी आलोचना पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले इन्हीं पाँच समालोचकों के आलोचनादर्शों के आधार पर नयी समीक्षा के प्रतिमान निर्धारित किए हैं।

(प्रो. रामचन्द्र प्रसाद, पटना वि.वि. अंग्रेजी विभागाध्यक्ष 27.04.1989)

जिस आलोचना-पद्धति में पौरस्त्य एवं पाश्चात्य आलोचना-सिद्धान्तों का समन्वय घटित हुआ हो, वह डॉ. उपाध्याय के मतानुसार, समन्वयवादी आलोचना है। बड़ी बारीकी से समन्वयवादी आलोचना के विकास-क्रम का उद्घाटन करते हुए डॉ. उपाध्याय ने अपने ग्रंथ के द्वितीय अध्याय में हिन्दी की मध्ययुगीन, शुक्ल पूर्व, शुक्लयुगीन तथा शुक्लोत्तर आलोचना परम्पराओं की विशेषताओं का पांडित्यपूर्ण ख्यापन किया है, जिससे उनके आलोचक की विवेचनात्मक प्रौढ़ि की यथेष्ट परिचित हो जाती है।

हिन्दी आलोचना की समस्त प्रवृत्तियों में समन्यवादी तत्वों की गवेषणा एवं उनका यथोचित समीक्षण डॉ. उपाध्याय का प्रधान लक्ष्य है। जहाँ अन्य समीक्षक इन तत्वों पर दो-चार बातें कहकर चुप रह गए हैं, वहां डॉ. उपाध्याय ने मनोविश्लेषणवादी, रसवादी और सौन्दर्य तत्वों का व्यापक एवं विश्लेषणात्मक विवेचन प्रस्तुत किया है, उन्हें पूरी तन्मयता और निवृत्ति दी है और समन्यवादी आलोचना की मूल्यवत्ता और सम्भावनाओं को परखने की सफल चेष्टा की है। प्रथम से लेकर सप्तम अध्याय पर्यन्त इस आलोचना के विविध पक्षों का विवेचन एक ओर लेखक की शोधपरक स्फूर्ति तथा दूसरी ओर एतद्विषयक साहित्य के साथ उसकी गम्भीर परिचिति का ही द्योतन करता है।

(प्रो. कुमार विमल, चेयरमैन, बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन, पटना)

डॉ. नगेन्द्र का जीवन अनिरुद्ध साहित्य-साधना का पर्याय है। गुण और परिमाण दोनों ही दृष्टियों से इनके द्वारा रचा गया साहित्य शुक्लोत्तर आलोचना की बहुमूल्य धरोहर है। हिन्दी आलोचना के ऐसे गौरव शिखर पर डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय ने ‘आलोचक डॉ. नगेन्द्र’ नामक पुस्तक श्रमपूर्वक लिखी है, जो प्रीतिकर है।

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अन्य सम्मतियां

डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय, पी.एच.डी., डि.लिट., हिन्दी के चिन्तनशील लेखक, प्रबुद्ध विद्वान् एवं समर्पित अध्यापक हैं। उन्होंने अपनी स्तरीय रचनाओं से हिन्दी के आलोचना तथा शोध साहित्य को समृद्ध किया है। मैं उनसे दशाधिक वर्षां से सुपरिचित हूँ। उनका व्यवहार छोटे-बड़े सभी से सहृदयता-पूर्ण है, तथा उनका चरित्र उत्तम है। भावी जीवन में उनकी समुन्नति एवं समृद्धि के लिए मेरी मंगल कामनाएँ उनके साथ हैं।

25.7.1990 डॉ. छैलबिहारी लाल गुप्त

398, सर्वोदय नगर, सासनी गेट

अलीगढ़-202001


प्रियवर डॉ. उपाध्याय जी।

सादर नमस्कार।

आपके द्वारा लिखी हुई अभी-अभी ‘कस्मैदेवाय’ की समीक्षा मिली। कृपा के लिए आभार। विज्ञ आलोचकों द्वारा की हुई समीक्षा, पाठकों को कितना प्रभावित करती है, यह तो पाठक जानते हैं, पर रचनाकार को उससे निश्चित रूप से परितोष होता है, यह मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं। आप जिस निस्पृह भाव से और मन से समीक्षा लिखते हैं, वह अनुकरणीय है। इससे मुझे इतना विश्वास हो जाता है कि मैंने सही दिशा में सोचा और लिखा है। आपके प्रति मेरी अशेष शुभकामनाएं।

12.10.2007 प्रो. भगवत प्रसाद मिश्र ‘नियाज’

गुरुकुल रोड, अहमदाबाद-52


डॉ. उपाध्याय की कर्तव्यनिष्ठा, कार्यकुशलता, ईमानदारी, परिश्रम की क्षमता, समर्पण की भावना एवं उत्साही प्रवृत्ति ने एक कुशल प्रशासक के रूप में गौरवान्वित किया है। इनकी साहित्यिक अभिरुचि के परिणाम स्वरूप आठ हिन्दी समीक्षा के मानक ग्रन्थ, एक सम्पादन ग्रन्थ अनेक कविताएं एवं शोघपरक आलेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। हिन्दी समीक्षा के क्षेत्र में समन्यवादी पद्धति के समीक्षक के रूप में डॉ. उपाध्याय अपने को स्थापित कर चुके हैं। मैं इनकी साहित्य साधना की अनुशंसा करता हूँ तथा उनके उज्जवल भविष्य के लिए मेरी अनन्त शुभकामनाएं।

3.4.2002 डॉ. रविकान्त भटनागर

आई.ए.एस.

जिलाधिकारी, हाथरस

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