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2 लघुकथाएँ - सरस दरबारी

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1 - बदलता हुआ मौसम

आभा आज बहुत खुश थी। अपने बचपन की सहेली से मिलने जा रही थी , पूरे 38 साल बाद ...!
वैसे तो वह मिसेज चन्द्रा थी। बेटा बहू जान छिड़कते थे और पोता तो एक दिन दादी के बगैर नहीं रह सकता था। बहुत खुश थी अपने इस छोटे से परिवार में।
पर आज वह सिर्फ आभा थी , एक छोटी सी बच्ची के उत्साह और जोश से भरपूर। रह रहकर बचपन की बातें दिमाग में कौंध रहीं थीं, और उसका उत्साह कई गुना बढ़ा रही थीं।
बहू ने बहुत प्यारसे तैयार किया था उसे।
"माँ घर की चिंता मत करना ...खूब एंजॉय करना , और तस्वीरें खींचना। हम भी तो देखें उन्हें। वैसे माँ बीस तो आप ही होंगी। इस उम्र में भी, टचवूड , कितनी सुंदर लगतीं हैं।"
टॅक्सी गंतव्य की ओर बढ़ रही थी और स्मृतियाँ किसी न्यूज़ रील सी आँखों के सामने से गुजरती जा रहीं थीं। बहुत संभ्रांत परिवार से थी सीमा। पैसों की कोई कमी नहीं। बस मुँह से फरमाइश निकलती और पूरी हो जाती। उसके खिलौने , कपड़े, उसकी हर चीज़, देखकर आभा हमेशा ही अचंभित होती।
सीमा, ज़िद करके उसे अपनी चीज़ें देना चाहती।
" तुम्हें पसंद है , रख लो , मेरे पास और भी है।"
पर आभा मना कर देती। उसके संस्कार उसे रोक देते। हाँ मन में बाल सुलभ विचार ज़रूर आता ,काश मैं उसकी जगह होती।
सीमा घर के दरवाजे पर ही उसे मिल गई। बरसों बाद गले मिलकर , अलग होने का दिल ही नहीं कर रहा था। वैसा ही आलीशान घर,वही ऐशोआराम , जो आभा बचपन से देखती आ रही थी।
शुरू में स्कूल कॉलेज, पुराने मित्रों की बातों के बाद , दोनों अपनी अपनी गृहस्थियों का ज़िक्र ले बैठीं।
आभा जहाँ अपने बच्चों की तारीफ करते नहीं थक रही थी, वहीं सीमा कुछ बुझी बुझी सी लगी।
"बहुत खुश नसीब हो आभा , जो तुम्हारे बच्चे तुम्हें इतना पूछते हैं।
यहाँ पैसे से खरीदी हुई हर खुशी है, पर जिसके लिए सबसे ज़्यादा तरसती हूँ, वह है, बच्चों का समय, प्यार के दो पल। बस वही नहीं हैं। बेटा बिज़नस के सिलसिले में अक्सर टूर्स पर रहता है, और बहू घूमने फिरने की शौकीन। वह भी साथ हो लेती है। एक ही बेटा है जिसे हॉस्टल में डाल दिया है, ताकि उनके जीवन में कोई खलल न हो। तरसती रहती हूँ पोते का मुँह देखने के लिए। छुट्टियों में जब घर आता है , तो उसे घुमाने ले जाते हैं, दो घड़ी , जी भरकर बातें भी नहीं कर पाती।"
जाते वक़्त सीमा ने सबके लिए तोहफे दिये , आभा मना करते करते रुक गई। कम से कम यह खुशी तो उससे न छीने।
घर लौटते हुए रास्ते भर वह सीमा के विषय में ही सोचती रही।
आज वह किसी कीमत पर उससे जगह बदलने को तैयार नहीं थी।

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2 - मूक मिलन

"सुनो जी , बहुत प्यास लग रही है।"

"अरे पानी तो खत्म हो गया। अच्छा रुको , मैं लेकर आता हूँ। तुम यहीं इसी जगह खड़ी रहना। यहाँ से हटना नहीं। यह पीछे जो पंडाल बना है न , श्री श्री श्री 1007 बाबा। बस यहीं रहना ", कहकर पुरुषोत्तम पानी लेने चले गए। जानकी वहीं खड़ी, भीड़ को आते जाते देख रही थी। मन ही मन सोच रही थी , मेरे कितने वर्षों की आस इन्होने पूरी की है। कबसे एक बार कुम्भ में आकर पावन गंगा में स्नान करना चाहती थी। बेटों का वश चलता तो अभी भी न आने देते। कितने बहाने बनाए थे उन लोगों , "इस उम्र में वहाँ जाओगे। कितनी भीड़ रहती है पता नहीं। ठीक से चला नहीं जाता आप दोनों से, वहाँ तो मीलों पैदल चलना पड़ता है। आराम से घर बैठो, कहाँ धक्के खाने जा रहे हो।" पर यह तो कहो , इन्होने इस बार दृढ़ निश्चय कर लिया था , सो हम लोग निकल ही आए। बरसों की साध पूरी हुई। अपना तो लोक परलोक तर गया।

तभी वहाँ से नागा बाबाओं का जुलूस निकला। सब तरफ अफरा तफरी मच गई। लोग जुलूस से बचने की कोशिश करने लगे। जानकी घबरा गई।

" अरे यह क्या हो रहा है। सब लोग भाग क्यों रहे हैं ? यह कहाँ रह गए ?"

तभी किसीने उन्हें धकेला , "अरे माई मरना है क्या , देख नहीं रही जुलूस आ रहा है। रास्ते से हट जाओ नहीं तो हाथी के पैरों के नीचे कुचल जाओगी ," कहते हुए वह आदमी जानकी को ठेलता हुआ दूसरी ओर ले गया।

"पर बेटा यह अभी आयेंगे तो हमें ढूँढेंगे। हम यहाँ से नहीं हटेंगे"

"अरे माई , जान बचेगी तब न मिलोगी। पहले जान बचाने की चिंता करो।" कहकर वह आदमी भीड़ में खो गया।

जुलूस तो निकल गया पर जानकी का धैर्य अस्त व्यस्त कर गया। वहाँ पुरुषोत्तम जब भागते हुए पहुँचे तो जानकी नदारद थी। उनके तो होश ही उड़ गए।

"कहाँ चली गई। मैंने कहा था यहीं रहना। अब इस भीड़ में कहाँ होगी वह। वह अभागन तो कुछ जानती भी नहीं। पहली बार घर से निकली है। उसका क्या हाल हो रह होगा। हे ईश्वर , मैंने बेटों की बात क्यों नहीं मानी। अब उसे कहाँ ढूँढूँ। "

पुरुषोत्तम बेहाल उसे संगम के तट पर खोज रहे थे। मीलों तक फैला लोगों का सैलाब , उसमें जानकी मिले तो कैसे।

तभी कुछ कार्यकर्ताओं ने उन्हें बेहाल देखा तो पूछा ,

"क्या बात है बाबा। किसे खोज रहे हैं?"

"अरे बेटा मेरी घरवाली खो गई है। बेचारी , ठीक से दिखाई भी नहीं देता उसे। अब इस भीड़ में कहाँ खोजूँ। "

"कोई बात नहीं बाबूजी। परेशान न हों , उनका नाम बताइये।"

" जानकी" उन्होंने काँपते स्वर में कहा. और आपका ? " पुरुषोत्तम "

"आप चलिये , यहाँ सहायता शिविर बने हैं, आप वहाँ बैठिए। यहाँ की व्यवस्था बहुत अच्छी है, माताजी मिल जाएँगी। "

सहायता शिविर से अनाउंसमेंट हुआ ,"जानकी देवी मेले में जहाँ कहीं भी हों , उत्तर की तरफ दिखाई दे रहे राम के पुतले के पास पहुँच जाएँ। आपके पति श्री पुरुषोत्तम जी यहाँ पर खड़े हैं। उनसे आकर मिल लीजिये।"

अनाउंसमेंट तीन चार बार हुआ। जानकी के कानों में जैसे ही यह शब्द पड़े , वह बौरा गई।

"अरे बेटा हम को राम के पुतले के पास पहुँचा दो। बहुत पुण्य कमाओगे।"

एक सज्जन उसका हाथ पकड़कर उसे वहाँ ले गए। जानकी को आता देख पुरुषोत्तम जी की साँस में साँस आ गई।

" कहाँ चली गईं थीं जानकी " कहते हुए वे उसकी तरफ लपके और कसकर गले से लगा लिया।

बाकी सब कहना सुनना आँसुओं के जिम्मे छोड़ दिया।

सरस दरबारी

1 टिप्पणियाँ

  1. आदरणीय महोदय,
    विनम्र निवेदन है कि लघुकथा क्रमांक 180 जिसका शीर्षक राशि रत्न है, http://www.rachanakar.org/2019/01/2019-180.html पर भी अपने बहुमूल्य सुझाव प्रेषित करने की कृपा कीजिए। कहते हैं कि कोई भी रचनाकार नहीं बल्कि रचना बड़ी होती है, अतएव सर्वश्रेष्ठ साहित्य दुनिया को पढ़ने को मिले, इसलिए आपके विचार/सुझाव/टिप्पणी जरूरी हैं। विश्वास है आपका मार्गदर्शन प्रस्तुत रचना को अवश्य भी प्राप्त होगा। अग्रिम धन्यवाद

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