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डॉ अश्वनी शुक्ल की कविताएँ

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यौवन जीवन का है बसंत । भैरवी तान की तरह मधुर, उज्जवल प्रभात की यह उमंग । जो स्निग्ध सांध्य की छटा लिए,कण-कण में भर देता अनंग।। यह प्रथम म...

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यौवन जीवन का है बसंत ।

भैरवी तान की तरह मधुर, उज्जवल प्रभात की यह उमंग ।
जो स्निग्ध सांध्य की छटा लिए,कण-कण में भर देता अनंग।।
यह प्रथम मल्लिका कलिका सी ,कर्ता जीवन को दिग दिगंत
यौवन जीवन का है बसंत ।।

यह शरत चंद्र का मधुर रूप ,मध्याह्न ग्रीष्म उत्ताप विकल।
भूकंप भयंकर अवनी का ,ज्वाला के मुख सा उच्छ्रंखल।।
मातंग, मदान्ध ,निरंकुश यौवन   प्रबल ,प्रभंजन सा प्रचंड ।
यौवन जीवन का है बसंत।।

यदि उन्नति का सर्वोच्च शिखर तो अधः पतन का भी खंदक।
यदि त्याग तपस्या कीर्तिमान , तो कर सकता है  विश्व त्रस्त।।
यश दुन्दुभि का यह तुमल नाद, जय वैजयंती का सुदृढ़ दंड।
यौवन जीवन का है बसंत ।।

रणचंडी की ललाट रेखा , रावण का निर्भय अहंकार ।
प्रहलाद भक्त का सत्याग्रह, कर सकता सत्ता तिरस्कार।।
पाकर यौवन नर मतवाला   , भर देता जीवन में उमंग।
यौवन ही जीवन का बसंत ।

रस परिभाषा विहीन कविता का कुशल चितेरा ,स्वयमसिद्ध।
हो छंद शास्त्र अनभिज्ञ भले,प्रतिभाशाली कवि यह प्रसिद्ध।।
भगवदरचना के कौशल का  उत्कृष्ट नमूना है यौवन ।
यौवन जीवन का है बसन्त ।


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बंजारा सा, आवारा सा फिरता था मन सांझ सकारे ।


बिना बताए तुमसे हमने सिर्फ चुराए भाव तुम्हारे ।।
उन गीतों को चूम-चूम कर अपनी रात रँगीली कर ली ।।
अपनी चाल नशीली कर ली ।।

सदा अनिद्रा की स्थिति में इन गीतों को दोहराता हूं ।
छंद छंद में बंद बंद में केवल मैं तुमको पाता हूं ।।
लगती हो प्रत्यक्ष हमारे और मुझे सान्निध्य मिल रहा ।
मधुर कल्पनाओं के द्वारा अपनी रात रंगीली कर ली ।।
अपनी आंखें गीली कर ली ।।

जब-जब लगा उनींदे मन को तेरे चरणों की है आहट ।
मृग शावक से चकित नयन यह अंतर्मन में थी घबराहट ।।
जरा देह रस पीकर मन का हर कोना मदमस्त हो गया ।
  तुमको छूकर लगा कि जैसे स्वप्निल आंख नशीली कर ली ।।
अपनी रात रँगीली कर ली ।।

मन में था तूफान कि तुम को छूकर- पाकर सब पा लूंगा ।
युगों- युगों का प्यासा मन, भूखा ,अतृप्त सब कुछ खा लूंगा।।
  लक्ष्मण रेखा की मर्यादा और विवशता केवल तन की ।
संयम की देहरी पर मन की गोपन कथा हठीली कर ली ।।
अपनी आंखें गीली कर ली।

           

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**** इन आँखों में वृन्दावन है*******

जितना भी प्रिय तुम्हें देखता,उतनी प्यास और बढ़ जाती ।
इन आँखों में वृन्दावन है ,इन आँखों में मथुरा-काशी ।।

सुमनों की कोमलता इनमें,सागर जैसी है गहराई ।
इनमें जीवन की खुशियाँ हैं ,इनमें यौवन की तरुणाई ।।
इनकी है निस्सीम मधुरता, इस मृदुता की दुनिया प्यासी ।
इन आँखों में वृन्दावन है ,इन आँखों में मथुरा-काशी ।।

सुख का प्रतिबिंम्बन है इनमें और प्रीति का आलम्बन है।
निश्छल भावों का उद्दीपन ,सहज प्रेम का अभिनन्दन है।।
करुणा,इनमें ममता, इनमें कितनी भरी उदासी।।
इन आँखों में वृन्दावन है ,इन आँखों में मथुरा-काशी ।।

इनको शब्दों से क्या लेना, बिना शब्द के अर्थ बताते।
शब्दों की सीमा से आगे, अंतर्मन तक ए पढ़ जाते।।
हर भाषा के विज्ञ नयन ए, चाहे जो हो भाषा-भाषी।।
इन आँखों में वृन्दावन है ,इन आँखों में मथुरा-काशी ।।

अनुगूँज-----
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गुलामी की निशानी है, नया यह वर्ष कैसे है।


गुलामी की कहानी है, नया यह वर्ष कैसे है।।

वही इंसान जिंदा है ,जिसे इतिहास मालूम है।
जिसे पुरखों के गौरव गान का एहसास मालूम है।।
जिन्हें मालूम है कीमत ,कि आजादी किसे कहते।
गुलामी की करुण गाथा,शहादत जिनको मालूम है।।
दुखद इतिहास यादों का नया यह वर्ष कैसे है।।
गुलामी की निशानी है, नया यह वर्ष कैसे है???

जिन्होंने दर्द देकर के , गुलामी को  जगाया था ।
जिन्होंने छद्म व आतंक से सत्ता बनाया था।।
जिन्होंने भारती के भाल को श्रीहीन कर डाला।
जिन्होंने क्रूरता से इस जमी को नर्क कर डाला ।।
यही हैवानियत का पर्व यह नववर्ष कैसे है ।
गुलामी की निशानी है,नया यह वर्ष कैसे है ??

ये भारत वर्ष , पूरे वर्ष हम उत्सव मनाते हैं।
ये पूरा विश्व अपना है, यही सबको जताते हैं।।
मगर इतिहास अपना किस तरह से भूल जाएं हम।
जो है अपकर्ष संस्कृति का,उसे हम क्यों मनाते हैं।।
बड़ी दारुण कहानी है ,नया यह वर्ष कैसे है??

हमें है गर्व भारत पर हमारी शान भारत है।
हमारी आन भारत है, हमारी जान भारत है।।
हमें प्राणों से प्यारी देश की माटी व थाती है।
ये भारत की कहानी है, भला नववर्ष कैसे है??
गुलामी की निशानी है नया यह वर्ष कैसे है??

मनाने में बुराई क्या, कि हम तो उत्सवधर्मी हैं।
गुलामी की कहानी के ए गोरे रचनाधर्मी हैं।।
कि जिससे भारती की शान में कुछ दाग लग जाये।
उन्हीं गुस्ताख़ के वंशज यही काले कुकर्मी हैं।।
ये शास्वत देव् वाणी है , नया यह वर्ष कैसे है??
गुलामी की निशानी है नया यह वर्ष कैसे है??


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नदी बह गई ..............


क्षण-क्षण, कण-कण बहता जाता ।
समय नहीं फिर से दोहराता ।।
जल प्रवाह अस्तित्व नदी का,
जल बह जाता ,तट रह जाता ।
प्रतिपल बहना ही जीवन है ।
चुपके से यह बात कह गई ।।
नदी बह गई ..................

ज्वार लिए कुछ ऋतुएँ आती ।
कुछ ऋतुएँ भाटा दे जाती ।।
कुछ वैभव देकर इतराती ।
कुछ जैसे घाटा दे जाती है ।।
है निर्व्याज प्रवाहित रहना ही जीवन ,
यह बात कह गई ।।
नदी बह गई ...................

सदियां ,दिवस ,मास ,दिन बीते ।
मन का आंचल कभी न रीते ।।
हरी-भरी हो धरती सारी
इसी भाव में जीवन बीते ।।
जीवन झंझावातों का संगम है
इतनी सी बात कह गई ।।
नदी बह गई................


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मन मे मधुमास हम लिखे।


जीने की आस हम लिखे ।।

बदल गए बालों के रंग ।
वक्त लूट ले गया मकरंद ।।
लुट गई प्यार की तरंग ।
मीठी मीठी यादों के संग ।।

बुझे हुई जीवन की आस हम लिखे ।।
मनका मधुमास हम लिखे ।।

घुंघराले बालों का प्यार ।
पावस की पहली फुहार।।
चेहरे पर काल की कटार ।
वैसे ही झुर्रियों से प्यार ।।
डूब मरी प्यास ऐसे पनघट के पास ।
चाट चाट होठों को बुझी नहीं प्यास ।।

दर्पण को देखने की आस हम लिखे ।
मन का विश्वास हम लिखे ।।

थके हुए पंखों की चाह ।
बुझे हुए मन का उत्साह ।
अपनों से अपनों की चाह ।
रिश्तों की किसको परवाह ।
आर्त्त वेदनाओं की आह ।
एकाकी राहों की चाह ।

जीने का फिर नया उत्साह हम लिखे।
मनका मधुमास हम लिखे ।।



अनुगूंज से

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पीर भी जवान हो गई ।


धीरे-धीरे शाम हो गई ।।

कामना की राह में
लोभ की ही चाह में
याचना की छांव में
दर्द की पनाह में ...
जिंदगी की चाह में
मोह के उछाह में
प्यार के प्रवाह में
व्यर्थ के ही चाह में
लोभ मोह संकलन के
ऊंचे ऊंचे हैं महल ।
इस महल की एक दिन
मिटेगी ये चहल पहल ।।
तिनका तिनका जोड़ जोड़ शाम हो गई ।
पीर भी जवान हो गई ।।

चार पल की जिंदगी
धीरे धीरे चल रही ।
जिंदगी के रात दिन की गांठ
कैसे खुल रही ।।
क्या पता है कल का
कौन साथ छोड़ जा उड़े ।
जिंदगी में कौन कब कहां
स्वयं ही आ जुड़े ।।
वक्त की शिला पे जो
लिखे थे लेख मिट गए ।
शेर थे जो लोमड़ी के हाथ
आज पिट गए ।।
जन्म मृत्यु की कथा
पुरान हो गई ।।
पीर भी जवान हो गई
धीरे धीरे शाम हो गई ।।

रात दिन की छांव धूप का
अता-पता नहीं ।
एक एक पल नियत है
वक़्त की खता नहीं ।।
जिंदगी के यक्ष प्रश्न
का जवाब मिल गया ।
गर्दिशों में खो चुका सुमन
स्वयम् ही खिल गया ।।
लोभ मोह के हिमालय
आज तक गले नहीं ।
चेतना के दृग हमारे
आज तक खुले नहीं ।।
मन का मैल प्यार पा के
आज तक धुले नहीं ।
धोते-धोते चीर भी पुरान हो गई ।
पीर भी जवान हो गई ।।


अनुगूंज से

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मैं पथभ्रष्ट नहीं हो पाया इसीलिए है राह बदल ली ।


मैं दुर्लक्ष्य हमेशा ही संधान लगाता रहा अकेले ।
देखा बहुरूपिए आखेटक छल-प्रपंच के थे अलबेले ।।
वह ही चोर , सिपाही खुद ही फिर कैसे अपराधी पकड़े ।
झूठ सत्य पर भारी देखा तो अपनी परवाह बदल ली ।।
मैं पथभ्रष्ट नहीं हो पाया इसीलिए है राह बदल ली ।।

शिक्षण जैसे श्रेष्ठ कार्य को करने का दायित्व हमारा ।
मानव की रचना करने का सुंदरतम है कृत्य मारा ।।
कुछ तो अर्थ पिशाचों को है पता नहीं दायित्व स्वयं का ।
इन लोगों की सिर्फ उपेक्षा करके अपनी चाह बदल ली ।।
मैं पथभ्रष्ट नहीं हो पाया तो फिर अपनी राह बदल ली ।

इस समाज की राजनीति के कितने हैं विचित्र हथकंडे ।
जिन हाथों में फूल कभी थे आज लिए हैं लाठी-डंडे ।।
जन्म जन्म के वैरी देखा कैसे है गलबहियां डाले ।
अवसरवाद स्वार्थ के अंधों ने भी अपनी चाह बदल ली ।
मैं पथभ्रष्ट नहीं हो पाया तो फिर अपनी राह बदल ली।।

जिनको जनादेश था जनता के विकास का कार्य करेंगे ।
स्वार्थसिद्धि को छोड़ हमेशा जनता का उपकार करेंगे ।।
उन बेचारों को मैंने हाथों की मैल चाटते देखा ।
इसीलिए इन नेताओं से मैंने परवाह बदल ली ।।
मैं पथभ्रष्ट नहीं हो पाया इसीलिए है राह बदल ली ।।

शिक्षा ही वह साध्य हमेशा मानव संसाधन रचता है ।
  मानवता के सृजन हेतु शिक्षक तिल-तिलकर के जलता है ।।
  जब चाणक्य , वशिष्ठ, द्रोण ही लोकतंत्र के दास बन गए ।
  संकट में अस्तित्व हुआ तो मैंने भी परवाह बदल ली ।।
मैं पथभ्रष्ट नहीं हो पाया इसीलिए है चाह बदल ली ।


अनुगूंज

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सब कुछ टूटे स्वप्न न टूटे ।

जीवन कुछ भी नहीं सिर्फ यह आशाओं का रूप क्रमागत ।
सुख-दुख तो मन का विकल्प है निश्चय यह अपना अभ्यागत ।।
समय बहुत बलशाली होता सब के सब गुलाम हैं इसके।
कोई नहीं बचेगा इससे यह मन का विश्वास न छूटे ।
सब कुछ टूटे स्वप्न न टूटे ।

इस जीवन का रूप अनोखा कोई जीता कोई हारा ।
कोई यहां सिकंदर जैसा कोई हरिश्चंद्र बेचारा ।

जीत हार का प्रश्न नहीं है यह भी तो विकल्प है मन का।

कटु
स्मृतियों के घावों में अच्छे दिन की आस न छूटे ।।
सब कुछ टूटे स्वप्न न टूटे ।

नहीं पूर्णता मिली किसी को, सबके बचते काम अधूरे ।
जीवन की पंकिल राहों में , कार्य कंहा हो पाते पूरे !।
छोटी-छोटी ही खुशियों से जीने का अभिप्राय बदल दो ।
पल दो पल के इस जीवन में ,अपनों का अहसास न छूटे।।
सब कुछ टूटे स्वप्न न टूटे ।।


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असह्य वेदना के पल प्रियवर याद करूं या जाऊं भूल ?

क्रोध गरल सा ,अनिल नेह का , शांति तुम्हारी चंदन सी ।
है पावन सान्निध्य तुम्हारा , देह तुम्हारी कुंदन सी ।।
प्रथम दृष्टि के वे अनुपम क्षण भाग्य लगा जैसे अनुकूल ।।
असह्य वेदना के पल प्रियवर याद करूं या जाऊं भूल ?

हुआ सार्थक जीवन तब से जब से यादों में आये ।
भटक रहा था मन बेचारा , मृगमरीचिका भरमाये ।।
तुमको पाकर जीवन पथ के शूल हो गए जैसे फूल ।
असह्य वेदना के पल प्रियवर याद करूं या जाऊँ भूल ?

जीवन के सब द्वंद मिट गए पाकर पल दो पल का साथ ।
हुआ आत्मबल विकसित तब से जब से मिला तुम्हारा हाथ ।।
तापित शापित से जीवन का भाग्य हो गया हो अनुकूल ।
असह्य वेदना के पल प्रियवर याद करुँ या जाऊँ भूल ?

तुमको पाकर लगा कि जैसे जीने का आनंद मिला ।
नीरस और निरर्थक जीवन को यह परमानंद मिला ।।
असरहीन है दैहिक,दैविक,भौतिकता के आज त्रिशूल ।।
असह्य वेदना के पल प्रियवर, याद करूँ या जाऊं भूल?

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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,513,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,31,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,93,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र 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इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,240,लघुकथा,1184,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1986,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,694,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,755,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,75,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,196,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,75,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: डॉ अश्वनी शुक्ल की कविताएँ
डॉ अश्वनी शुक्ल की कविताएँ
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