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लघुकथा // "शर्ट चोर" // सुषमा सिंह

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लघुकथा

"शर्ट चोर"

आज तीन साल का क्षितिज बड़ा खुश था।

बुआ अस्पताल से बच्चा लेकर आई हैं, "मम्मी हमारी गोद में दे दो हम भी खेलाएँ।"

अब ये तुमको भैया कहेगा!मम्मी से सुनते ही खूब खुश हो गया और गोद में लेने की लालसा और बढ़ गयी।

मम्मी ने धीरे से क्षितिज को अपनी गोद में बिठाकर पालथी लगवाई फिर धीरे से नवजात शिशु को दोनों तरफ से सम्हालते हुए उसकी गोद में बिठा दिया। देखते ही बड़ा खुश हो गया क्षितिज।

पर ये क्या! इसने तो मेरी पीली शर्ट पहन रखी है? अब इससे कैसे उतरवाई जाय।

मन में कई आशंकाएं उभर रही हैं कभी बुआ की तरफ देख रहा है जो प्यार से एक बार क्षितिज को एक बार नवजात को देख रही है और एक बार मम्मी की तरफ जो दो बच्चों को एक साथ गोद में बैठाये हुए हैं।

कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है ,पर दिमाग 180 की स्पीड से दौड़ रहा है।

अब तो ये मेरी हर चीज़ ले लेगा।

अब हर समय एक ही काम नवजात के आसपास मंडराना! घर के लोग सोच रहे थे कि बच्चे को अपने भाई पर बहुत प्यार आ रहा है पर.....

अगली सुबह जैसे ही नवजात की मालिश करने के लिए शर्ट उतारी गई तो क्षितिज शर्ट के पास बैठ गया और उसने एक बार दायें देखा एक बायें और किसी ध्यान अपनी तरफ न पाकर धीरे से शर्ट उठाई और अपने कमरे की तरफ दौड़ लगा दी।

"मम्मी हम शर्ट चुरा लाये हैं, अब बच्चा को मत पहनने देना"

मम्मी ने मुस्कराते हुए शर्ट लेली और कपड़ों के साथ धो कर धूप में डाल दी अब क्षितिज पर कोई बोझ नहीं दिन भर खेलता रहा पर ये क्या? शाम को फिर वही पीली शर्ट पहनी हुई है बच्चे ने!

फिर तो रोज का क्रम हो गया , शर्ट चोरी होती धुली जाती और पहनाई जाती।।

©®

सुषमा सिंह

कानपुर

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