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शिवम व्यास की कविताएँ


1.

दर्द दे दो मगर हंसी लौट के ना जाए

मर्म इनका किसी को समझ में ना आए।

भूख होती मगर सपन को खा जाते
प्यास लगती मगर आँसुओं को पीते
ख़्वाब में रोटी बनकर सुब्ह ले आती
भूख और प्यासे में सभी की दुआ कर आती

दर्द दे दो मगर हंसी लौट के ना जाए
मर्म इनका किसी को समझ में ना आए।

बात इनकी करो पर इनसे नहीं
हाथ उठाओ मगर उन बालश्रमिक पर नहीं
समय के पहल ने उनको गरीब शब्द दिया
हमीं के भाषणों से ओर गरीब कहलाए

दर्द दे दो मगर हंसी लौट के ना जाए
मर्म इनका किसी को समझ में ना आए।

चार दीपावली में घर कभी ना जाए
रमजान में घर-घर भिक्षा लेने जाए
त्यौहार में वो भगवान का दूत कहलाए
शेष दिनों में वो तो गरीब हो जाए

दर्द दे दो मगर हंसी लौट के ना जाए
मर्म इनका किसी को समझ में ना आए।

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2.

आकाश में रात हो रही है तन्हा है मेरा मन,

पास तुम जो आओ चांदनी भीगे मेरा तन बदन।।

चिड़ियों का चहकना यूँ लगता है जैसे हो तुम नहीं,
होती हो तुम वहाँ मेरा हृदय का रोग कहता हैं।।

मांग की सिंदूर पुकारे मस्तक पर होती कई शिकन,
तुम रात मेरी हो जाओ मैं बन जाऊं मस्तक चांद।।

चूड़ियों का खनकना हो मेरा मन शोर मचाए,
बन जाऊं पायल मैं चुमू तुमको लाखो बार।।

घूँघट उठा रही हो तुम शरमा के मेरे रुख से,
तुम स्वर्णिम चांदनी हो मेरे ही अंतर्निहित मन।।

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3.

झाँकती हुई गरीबी को सलाम कैसे करूँ

मन में बंदिश आजादी को अलाप किससे करूँ

रात की खामोशी को किस के ऊपर लगाऊँ
उस अधूरे चाँद की शिकायत किससे करूँ

हाथ की लकीरें अब मिटते जा रही हैं
ये भिक्षा की पूरी हिमाकत किससे करूँ

फुटपाथ पर बिलखती गरीबी
वे पग की हिदायत अब किससे करूँ

सुबह को उठती सूरज संग खेलती
पहली किरण की सोहबत किससे करूँ

मन्दिर, मस्जिद, गिरिजा या गुरुद्वारे पर महके
वो परमात्मा की इनायत अब किससे करूँ।।

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4.

कभी जो तुम बोलो, कभी जो हम बोले

प्यार के तराजू पर एक समान हम होए।

समय की घड़ी के समय एक दूजे हो चले
पास कोई आए ना उस पवन की ओर चले
मैं जमीं तुम आसमाँ यूँ एक साथ मिल चले
फलसफा प्यार में तुम मेरे सनद हो गए

कभी जो तुम बोले, कभी जो हम बोले
प्यार के तराजू पर एक समान हम होए।।

लबों की चहल पर तुम मुझे आहरण करना
मैं शब्द-शब्द गीतों में तुम्हारा उदाहरण दूँगा
प्यार की दो मूरत व शब्द की एक सूरत
तुम जीवन जीना हम तुम को जी लेंगे

कभी जो तुम बोलो, कभी जो हम बोले
प्यार के तराजू पर एक समान हम होए।।

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5.

बस्ती बस्ती डगर डगर

सस्ती है पर दर मगर।

खेतों में सब है हरियाली
धरती है ये मेरी प्यारी
सुख समृद्धि सब है यहाँ
गाँव की छाँव है न्यारी

बस्ती बस्ती डगर डगर
सस्ती है पर दर मगर।।

रसोई में तो पकता भोज
उसकी सुगंध आती रह रोज
शाक खुद के मन में कहती
माँ बनाए भोज प्रति रोज

बस्ती बस्ती डगर डगर
सस्ती है पर दर मगर।।

शाम को होता दहलीज पर दीया
यूं लगता दीवाली आई हर रोज
रात की खामोशी में खलता अपना
वो हनुमंत रखवाला होता हर रोज

बस्ती बस्ती डगर डगर
सस्ती है पर दर मगर।।

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6. प्यारा भगत सिंह

प्यारा-प्यारा है भगत
अविगत रूप है जगत

जगत में हुए तुम भगत, हम है तुम्हारे ही प्रादुर्भाव
अविगत रुप हो तुम भगत, भरत के तुम हो भाव
संगत में हो तुम भगत, छद्म के अभिन्न मित्र हो चाव
रजत हो भारत के तुम, हम सब के सर्वत्र हो राव

प्यारा-प्यारा है भगत
अविगत रूप है जगत।।

द्वेष को तुमने राह दिखाई, ओ हमारे प्राणदाता
क्लेश को तुमने अपनाया, ओ हमारे दिव्यदाता
गीत को तुमने राग दिलाई, ओ हमारे गीतदाता
मीत को तुमने गले लगाया, ओ हमारे मित्रता

प्यारा-प्यारा है भगत
अविगत रूप है जगत।।

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7.

मौन हुए मेरे शब्द

मौन हुई मेरी भाषा

सरकार की नीति में डूब रही सूर भाषा
प्रकार की प्रणीति में वितरण हो रही आशा
सिंहासन पर अब बोल रही राजनीति की भाषा
प्रहसन की अब बोली हो रही है हिंद की हिंदी आशा

मौन हुए मेरे शब्द,
मौन हुई मेरी भाषा।।

चार शब्द अब चादर में बोले जा रहे है गाली
माँ की ममत्व को ललकार रही है यह मधुपाली
सुख, चैन अब आकार ले रहा यहां है आम्रपाली
बुद्ध की गरिमा को ललकार रहा है यह कलापी

मौन हुए मेरे शब्द
मौन हुई मेरी भाषा।।

धर्म के रिवाजों से जूझ रही है भाषा
कर्म के जीवन में ढोना बनी है भाषा
प्रक्रम में समाप्त हुई अब निज भाषा
संहार से अब विलुप्त करेगी अब नित भाषा

मौन हुए मेरे शब्द
मौन हुई मेरी भाषा।।

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8.

तिरंगे में लिपटा मेरा अभिमन्यु

श्वास लेता है नहीं,साँस रुख गयी सब की
जान खुद दे बैठा,था तो मेरा अभिमन्यु
आन था देश पर, था तो मेरा अभिमन्यु
तिरंगे में लिपटा आज मेरा ही अभिमन्यु।।

प्यार मुझ पर ही लुटाता मेरा अभिमन्यु
कहता था सम्भाल के रखना मुझको तिरंगे में
मैंने तो रखा मगर मेरे मंगलसूत्र में
देश का था वो अर्जुन, था मेरा ही अभिमन्यु
तिरंगे में लिपटा आज मेरा ही अभिमन्यु।।

छू कर निकली ही गोली, था तो वीर पुत्र
चुम कर वीरत्व हुआ, आज मेरा अभिमन्यु
मातृ का गौरव बढ़ाया, देश का था सूर्य पुत्र
छू गई आज उसकी वर्दी, आज जब मैंने पहनी
तिरंगे में लिपटा आज मेरा ही अभिमन्यु।।

देश की विडंबना पर फेर आया एक चक्र
परदेश में छोड़ आया अपनी वीरता का सूत्र
चुम कर लिपट गया मेरा अभिमन्यु
लौट कर आएगा अभी मेरा अभिमन्यु
तिरंगे में लिपटा आज मेरा ही अभिमन्यु।।

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9.

राधा अब तुम न आए तो नगमा न लिख पाऊँगा
कृष्ण का चरित्र तुम्हारे नयन में न सजा पाऊँगा
छूटेगा आँखों से काजल, छूटेगी हाथों से मेहंदी
मनोहारी चली आओ....गीत का निमंत्रण है

तुम्हारे प्रेम में अधूरी अभिलाषा है
तन से तुम तनिक मेरे अभिशस्त है
मन से वांछित अभिव्यक्ति है
अन हो कर अभीष्ट राधारानी है 
सर्वत्र प्रांत में व्याप्त राधेश्याम है
मनोहारी चली आओ....गीत का निमंत्रण है

मुख से हो मधुर ध्वनि पुकार बाँसुरी
नयन से हो निर्वस्त्र आँसू मेरी हितकारी
प्रेम में हो राधिका तुम सुखकारी
होंठ से अब न छलकाओं अंगिनी
मेरी बन कर यूं सदा रहना संगिनी
मनोहारी चली आओ....गीत का निमंत्रण है

मेरी खोई हुई आँखों में ज्योति है
तुम्हारे नयन में काजल स्पर्श मैं हूँ
रात्रि को रंगई कर दे ए मनोरमा
मेरे दिल में तुम हो प्रियतमा
मेरे संग तुम, तुम्हारे संग मैं
मनोहारी चली आओ....गीत का निमंत्रण है।

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10.

ये रसिया गा गा कर सुनाऊं
जीवन का पैगाम सुनाऊं

करो नमक तैयार साथियों
गांधी का वो स्वप्न दिखाऊं
इस धरती में प्रेम जगाऊं
मां का प्यार तुमको सुनाऊं

उठो और जागो साथियों
नरेंद्र का दिन याद दिलाऊं
संस्कृति की रक्षा कर स्मरण कराऊं
मन में तिरंगा रख कर तुम पर लूट जाऊं

जाग्रत हो जाओ साथियों
"रिशु" को मन में रखकर शोध कराऊंगा
देश का सौंदर्य अब निर्धन में जटाऊंगा
हृदय से देश के निर्धन का नाश कराऊंगा।

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3 टिप्पणियाँ

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