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छः लघुकथाएँ // दर्शना जैन

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         अटूट दोस्ती      दो मित्र उजास और तमस में एक दिन बहस छिड़ गयी। उजास बोला तमस से," तुम जब किसी के घर पहुँचते हो तो घर के सारे सद...

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       अटूट दोस्ती

     दो मित्र उजास और तमस में एक दिन बहस छिड़ गयी। उजास बोला तमस से," तुम जब किसी के घर पहुँचते हो तो घर के सारे सदस्य घबरा जाते हैं। वे भगवान से तुम्हारे जल्दी जाने की प्रार्थना करते हैं।" तमस भी बोला," वो लोग अगर डरते हैं तो यह उनकी कमजोरी है, इसमें मेरा क्या दोष है?" उजास फिर तेवर दिखाते हुए बोला," लोग तुमसे ज्यादा मुझे पसंद करते हैं मैं जब उनके घर में होता हूँ तो वे कामना करते हैं कि मैं सदा वहीं रहूँ और भूल से कहीं तुम न आ जाओ यही दुआ करते हैं।" तमस भी कहाँ चुप रहता, वह उजास से बोला," मैं अगर किसी के घर जाता हूँ तो वहाँ के लोगों को डराने नहीं बल्कि चलना सिखाने जाता हूँ।" उजास बोला," तुम जहाँ होते हो वहाँ किसी को कुछ दिखाई नहीं पड़ता है और मैं जहाँ होता हूँ वहाँ सबकुछ साफ साफ दिखता है। तुम्हें तो लोग काला भी कहते हैं।" यह कहकर उजास हंसने लगा। तब तमस ने कहा," हाँ, मैं काला हूँ और कई बार मैं और भी काला हो जाता हूँ, उसके बाद ही तुम आते हो। अगर मैं न होऊँ तो तुम्हारा भी महत्व नहीं रह जायेगा।"

     तभी तमस और उजास का मित्र जीवन आया, जो काफी समय से दोनों की बहस सुन रहा था, और बोला," क्या मित्र होते हुए ऐसे झगड़ रहे हो, वो भी मेरे अभिन्न मित्र होते हुए, हम तीनों की अटूट दोस्ती में इस तरह उलझना क्या अच्छा है? तुम दोनों तो मेरे दो बाजू हो, जैसे चलते वक्त एक बाजू आगे तो दूसरा पीछे रहता है, वैसे ही तुम भी आगे पीछे होते हुए मेरे दो पहलू हो।"

      उजास और तमस अपने मित्र जीवन से बोले," नाराज मत हो यार, दोस्ती में ऐसी बहस तो चलती रहती है। बहसें चाहे कितनी भी हो पर हमारी दोस्ती पर आँच नहीं आयेगी।"

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शेर बनाम पापा

     परी रोज रात को सोते समय दादी से कहानियाँ सुना करती थी। दादी कभी देवी देवताओं की, कभी कोई शिक्षा की, कभी मन से भी कहानी बनाकर सुनाया करती। एक रात दो तीन कहानियाँ सुनने के बाद भी परी को नींद नहीं आयी तो उसने एक और कहानी सुनाने को कहा। तब दादी उसे एक मन से गढ़ी कहानी सुनाने लगी," एक जंगल में शेर रहता था, वैसे तो शेर जंगल का राजा होता है और सब जानवर उससे डरते हैं पर उस जंगल का शेर बहुत मस्त था, सबसे मिलजुलकर बड़े प्यार से रहता, सबका ध्यान रखता, गलती करने पर किसी को सजा देने की बजाय उसे समझाता, सबके साथ बैठकर उनके सुख दुःख की बातें करता, उन्हें दिलासा देते हुए हिम्मत भी देता और सब जानवर भी शेर के इस अच्छे व्यवहार के कारण उसके साथ हिलमिलकर रहते थे, कुल मिलाकर वह शेर अपने शेर होने को भूल गया था और दोस्त बनकर सबके साथ रहा करता था। उस जंगल के थोड़ी दूर दूसरा जंगल था, वहाँ के राजा शेर का व्यवहार पहले वाले शेर से एकदम उल्टा था, वह हर किसी से शेर की तरह ही बात करता था इसलिये सब जानवर उससे डरने लगे और परेशान होकर पहले वाले जंगल में जाने लगे..." परी कहानी के बीच में ही बोल पड़ी," दादी, पापा भी पहले वाले शेर जैसे होते तो कितना अच्छा होता ना! फिर वो भी अपने पापा होने को भूल जाते और एक दोस्त बन जाते।"

     परी ने कुछ तो देखा होगा, कुछ तो चाहा होगा अपने पापा से जो उसके मानसपटल पर यह सवाल सहज ही उभर आया और उसने दादी से पूछ लिया पर दादी जवाब न दे पाने की वजह से असहज महसूस कर रही थी।

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कैसे हो शोर शांत?

   कक्षा में बच्चे बहुत शोर मचा रहे थे, शोर ऐसा था कि आस पड़ोस दो तीन कक्षाएँ भी डिस्टर्ब हो रही थी। उस कक्षा की टीचर श्रीमती गीता कक्षा में आते ही डांटते हुए चिल्लाने लगी," क्यों इतना शोर हो रहा है कक्षा में, यह कक्षा है या बाजार, चुप रहो सब।" कुछ समय तक तो बच्चे शांत रहे पर फिर और जोर से शोर मचाने लगे। यह एक तरह से रोज की ही चर्या थी। तंग आकर गीता एक दिन प्रिंसिपल के ऑफिस में गयी और जाते ही बोली," सर, मेरी कक्षा बदल दीजिये क्योंकि उस कक्षा के बच्चों ने नाक में दम कर दिया है, मैं उन्हें समझा समझाकर परेशान हो चुकी हूँ।"

     प्रिंसिपल की आदत थी कि वे कभी भी स्कूल के राउंड पर निकल जाते और किसी कक्षा के बाहर खड़े होकर टीचर के पढ़ाने का ढंग देखते, वह सही होता तो शाबाशी देते, गलत होता तो समझाते। गीता के समझाने के तरीके पर भी कुछ दिनों से प्रिंसिपल की नजर थी सो वे बोले," गीता जी, आप अन्यथा मत लीजियेगा पर मैं आपसे कहना चाहूँगा कि आप कक्षा नहीं अपितु अपना तरीका बदल लीजिये। कक्षा बदलना समस्या का हल नहीं है।" गीता प्रिंसिपल से बोली," सर, मैं आपका आशय समझी नहीं।" प्रिंसिपल समझाने के लिहाज से बोले," गरम पानी को ठंडा करने के लिए उस पर गरम पानी डालेंगे या ठंडा।" गीता बोली," सर, यह कैसा सवाल है? इसका जवाब तो बच्चा भी दे देगा कि गरम पानी तो गर्मी को और बढ़ायेगा, ठंडा होने का तो सवाल ही नहीं उठता।" प्रिंसिपल बोले," बच्चे तो जानते होंगे गीता जी लेकिन अफसोस कि वही बात आप समझ न सकीं।" गीता प्रिंसिपल की समझदारी से वाकिफ थी इसलिये बुरा न मानते हुए गीता थोड़ा शर्मिंदा हो गयी पर वह क्या कहना चाह रहे हैं गीता अभी भी समझ नहीं पा रही थी। गीता की शर्मिंदगी भांपकर प्रिंसिपल बोले," मेरा मकसद आपको असहज महसूस करवाना नहीं था। जैसे गरम पानी का डालना पानी को शीतल करने की बजाय तपिश को बढ़ा देगा ठीक वैसे ही आपका चिल्लाकर बच्चों को चुप कराने का प्रयास उन्हें शांत नहीं कर सकता, हाँ वे और उद्दंड जरूर बन सकते हैं, जैसा कि आप देख भी रही हैं।"

      गीता ने खुद से कहा कि सर ने एक सटीक उदाहरण से कितनी गहन बात बोल दी, वाकई मैं और मेरे जैसे कई शोर को शोर से शांत करने की कोशिश में वक्त बर्बाद कर देते हैं।

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परिवर्तन संभव या नहीं

एक महात्मा संस्कार और संस्कार परिवर्तन पर प्रवचन दे रहे थे। प्रवचन के बाद एक भक्त महात्माजी के पास आया और

बोला,

"आपका प्रवचन बहुत अच्छा था लेकिन आपने जो संस्कार परिवर्तन की बात कही वह कहने में तो आसान है पर संस्कारों को बदलना बहुत कठिन है।"

तब महात्मा बोले कि अच्छा बताओ संस्कार मतलब क्या?

व्यक्ति ने कहा कि संस्कार याने व्यवहार या आदत।

महात्मा बोले, "बिल्कुल सही।" अब मान लो कि कोई व्यक्ति पहली बार कार चलाना सीख रहा है तो उसे क्लच, ब्रेक, एक्सीलेटर का ध्यान रखना पड़ता है किंतु जब उसे कार चलाने का अच्छा अभ्यास हो जाता है तो वह उसके व्यवहार में आ जाता है, संस्कार बन जाता है। 15-20 साल तक व्यक्ति बिना किसी दिक्कत के वही कार चलाता है और उसके बाद वह नयी कार खरीदता है जो आटोमेटिक गियर की होती है। अब उसे 15-20 साल की अपनी आदत बदलना पड़ेगी। तुम बताओ कि व्यक्ति को आदत बदलने में कितना समय लगेगा?

व्यक्ति ने कहा कि ज्यादा से ज्यादा 15-20 दिन।

महात्मा ने पूछा," जब 15-20 साल की आदत 15-20 दिन में बदली जा सकती है तो तुम कैसे कह रहे हो कि आदत बदलना बहुत कठिन है?"

भक्त ने कहा कि ये तो कार की आदत बदलने की बात की पर किसी में यदि गुस्सा करने की या कोई और गलत आदत हो तो उसे बदलना इतना सरल नहीं है।

महात्मा बोले कि जब एक जगह संस्कार बदला जा सकता है तो हर जगह बदलना संभव है बस जरूरत है तो दृढ़ इच्छा शक्ति और सच्चे पुरुषार्थ की।

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कैसे बने रिश्ता भगवान से?

एक दार्शनिक था। एक दिन उसका कोई मित्र उससे मिलने आया। हाय हैलो करने के बाद उसने मित्र से पूछा," और क्या चल रहा है?"

वह बोला," सब ठीक है। कुछ दिनों पहले मैं एक ध्यान के शिविर में गया था, वहाँ अच्छा भी लगा पर एक बात मुझे समझ नहीं आयी।"

दार्शनिक ने पूछा कि कौन सी बात?

मित्र ने कहा," हमें अपने माता पिता, रिश्तेदार, दोस्त को याद करने के लिए कोई अभ्यास नहीं करना पड़ता वो याद आ जाते हैं, यहाँ तक की जिन्हें नहीं याद करना चाहिए वो भी याद आ जाते हैं लेकिन भगवान को याद करने का समय निकालकर अभ्यास किया जाता है फिर भी उन्हें याद करना मुश्किल क्यों होता है?"

दार्शनिक ने कहा कि पहले मैं एक छोटा सा अभ्यास बताता हूँ वो करो, फिर मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा। मित्र बोला," ठीक है, बताओ क्या करना है।" दार्शनिक ने कहा कि आँखें बंद कर मन में एक गोला बनाकर उसमें अपने सबसे करीबी रिश्तेदार का नाम लिखो, अब बाहर दूसरा गोला बनाकर उसमें दो रिश्तेदारों के नाम लिखो, फिर तीसरे में चार, चौथे में आठ नाम लिखो। अब आँखें खोल लो और बताओ की उन गोलों में तुमने अपने जिन रिश्तेदारों के नाम लिखे उनमें भगवान का नाम किस गोले में है? मित्र सोच में पड़ गया की क्या जवाब दे क्योंकि भगवान का नाम तो किसी गोले में था ही नहीं।

दार्शनिक उसकी मनोस्थिति समझ गया और बोला," जब तुमने भगवान का नाम रिश्तेदारों के किसी गोले में नहीं लिखा तो उसे याद कैसे कर पाओगे क्योंकि याद करने के लिए रिश्ता होना जरूरी है। हमने कभी भगवान से रिश्ता बनाने की कोशिश ही नहीं की। काम करवाने का हर रास्ता अपनाने पर भी जब मंजिल नहीं मिलती तब हमें भगवान याद आते हैं जबकि उनसे तो हमारा ऐसा रिश्ता होना चाहिए कि सबसे पहले उसकी याद आये।" इतना कहकर उसने मित्र से पूछा आशा करता हूँ कि तुम्हें जवाब मिल गया होगा।

मित्र ने फिर प्रश्न किया," पर यह रिश्ता बनेगा कैसे?" दार्शनिक ने जवाब दिया," जब उन गोलों में भगवान का नाम आ जायेगा तो उनसे रिश्ता बन जायेगा और जब नाम सबसे अंदर के गोले में आ जायेगा तो रिश्ता इतना मजबूत हो जायेगा कि याद करना मुश्किल नहीं होगा, वो सहज ही यादों में समा जायेंगे।" कोई भी रिश्ता बनाने में थोड़ी मेहनत तो करना पड़ती है। भगवान से रिश्ता बनाने में शुरू में मेहनत ज्यादा करना पड़ती है पर जब बन जाता है तो उसे कायम रखना बहुत आसान है।

मित्र समाधान से संतुष्ट हुआ और इसके लिए अपने मित्र को दिल से धन्यवाद दिया।

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अनोखी तुलना से इलाज

शहर में एक पहुँचे हुए महात्मा आये थे। बहुत चर्चे हो रहे थे उनके शहर में। नीना ने अपने भाई नीरज को उनके दर्शन करने के लिए चलने को कहा, उसने मना कर दिया। बहन के बहुत कहने पर वह उसके साथ महात्माजी के दर्शन करने गया पर वहाँ जाकर नीना से बोला पहले तुम जाओ, मैं बाद में आता हूँ। नीना तो यही चाहती थी कि पहले वो बात करे महात्माजी से इसलिये उसने भाई से कहा ठीक है, मैं जाती हूँ और कुछ समय बाद तुम्हें बुला लूँगी। नीना महात्माजी के पास गयी, उन्हें प्रणाम किया और बताया कि मेरा भाई बहुत गुस्सा करता है, आप कुछ उपाय बताइये। "कहाँ है तुम्हारा भाई? " उन्होंने पूछा। 

नीना भाई को बुला लायी। महात्माजी ने नीरज से सवाल किया "क्या करते हो?" नीरज ने बताया कि वह डॉक्टर है। तुम्हारी बहन का मानना है कि तुम बहुत गुस्सा करते हो, क्या तुम भी इस बात को मानते हो? जी, मैं गुस्सा करता तो हूँ लेकिन जल्द ही नार्मल भी हो जाता हूँ नीरज ने कहा। कितनी बार गुस्सा आता है तुम्हें दिनभर में महात्माजी ने पूछा। "आठ-दस बार आता होगा।" नीरज ने उत्तर दिया। महात्माजी बोले तुम्हारे जवाब से तुम इमानदार लग रहे हो, एक बात बताओ कोई व्यक्ति तुम्हारे पास आये जो बार बार बीमार पड़ता हो, हालाँकि एक आध दिन में वह ठीक भी हो जाता हो तो तुम क्या करोगे, क्या सलाह दोगे उसे? नीरज बोला कि मैं उससे कहूँगा ऐसे बार बार बीमार होना शरीर के लिए ठीक नहीं है, यह कमजोरी की निशानी है और तुम्हें अपना चैकअप कराकर इलाज कराना चाहिए। "क्या बात है, कितना सही जवाब दिया है तुमने, तुम एक अच्छे डॉक्टर मालूम पड़ते हो, अपना इलाज सही तरीके से कर पाओगे।" महात्माजी ने नीरज के सिर पर हाथ रखकर कहा। "अपना इलाज!" कहना क्या चाहते हैं आप नीरज ने महात्माजी से पूछा। यही कि तुम्हारे हिसाब से बीमार पड़ते रहना शरीर की सेहत के लिए सही नहीं है और मेरे विचार से गुस्सा करते रहना मन की सेहत के बिगड़ने का लक्षण है जिसका इलाज तुम्हें ही करना होगा, कैसे करोगे? महात्माजी के इस सवाल से जहाँ नीना अचंभित थी वहीं नीरज निरूत्तर। वे बड़े प्यार से आगे बोले शरीर जब बीमारी से ग्रस्त होता है तो वह वायरस के चपेट में होता है और मन जब विकारों से ग्रस्त हो तो वह गलत आदतों के चपेट में रहता है।

नीरज और वहाँ बैठे दूसरे भक्त महात्माजी की इस अनोखी तुलना से आश्चर्यचकित थे।


दर्शना जैन

रामकृष्णगंज, खंडवा

म.प्र. - 450001

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