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इंदर भोले नाथ की रचनाएँ

ग़ज़ल-

1-पर अब है,इतना वक़्त कहाँ...

फिर लौट चलूं मैं,”बचपन” में,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…
खेलूँ फिर से,उस “आँगन” में,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…
क्या दिन थे वो,ख्वाबों जैसे,क्या ठाठ थे वो,नवाबों जैसे…
फिर लौट चलूं,उस “भोलेपन” में,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…
हर रोज था,खुशियों का मेला,हर रात थी,सपनों की महफिल…
फिर लौट चलूं,उस “सावन” में,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…
कोई पहरा न था,बंदिशों का,जख्म गहरा न था,रंजिशों का…
फिर लौट चलूं,उस जीवन में,पर अब है,इतना वक़्त कहाँ…
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2- वो-प्यार याद आया

गुजरें जो गली से उसके,वो-दीदार याद आया
पलते नफ़रतों के दरमियाँ,वो-प्यार याद आया

आँखों से मिलने का वो इशारा करना उसका
फिर करना तन्हा मेरा,वो इंतजार याद आया

शिकवे लिये लबों पे,बेचैन वो होना मेरा फिर
चुपके से लिपट के उसका,वो इज़हार याद आया

मिल के उससे दिल का,वो फूल सा खिल जाना
न मिलने पे होना खुद का,वो लाचार याद आया

यूँही चलते रहना वो,अपना मिलने का सिलसिला
कभी पतझड़ तो कभी वो बहार याद आया

हर इश्क़ की कहानी मुकम्मल हुई नहीं “इंदर”
हर शाम तन्हाई में मुझे वो-यार याद आया

गुजरें जो गली से उसके,वो दीदार याद आया
पलते नफ़रतों के दरमियाँ,वो-प्यार याद आया


3- बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है


क्यूँ उदास हुआ खुद से है तू कहीं भटका हुआ सा है,
न जाने किन ख्यालों में हर-पल उलझा हुआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
खोया-खोया सा रहता है अपनी ही दुनिया में,
गुज़री हुई यादों में वहीं ठहरा हुआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
शीशा-ए-ख्वाब तो टूटा नहीं तेरे हाथों से फिसल के,
जो आँखों में टूटे ख्वाब लिए यूँ रूठा हुआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
क्यों उम्मीद किए बैठा है तू वफ़ा की इस जमाने से,
यहाँ कीमत लगी है प्यार की इश्क़ बिका हुआ सा है,
बता ऐ-दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है

4- अब भी आता है…


ज़रा टूटा हुआ है,मगर बिखरा नहीं है ये,
वफ़ा निभाने का हुनर इस दिल को अब भी आता है…
तूँ भूल जाए हमे ये मुमकिन है लेकिन,
हर शाम मेरे लब पे तेरा ज़िक्र अब भी आता है…
हज़ारों फूल सजे होंगे महफ़िल मे तेरे लेकिन,
मेरे किताबों मे सूखे उस गुलाब से खुश्बू अब भी आता है…
न गुज़रेगी कभी तूँ इस रस्ते से लेकिन,
करना उम्मीद तेरे आने का हमे अब भी आता है…
ज़रा टूटा हुआ है मगर बिखरा नहीं है ये,
वफ़ा निभाने का हुनर इस दिल को अब भी आता है…

5-


कहीं गुम-सा हो गया हूँ मैं, क़िस्सों और अफ़सानों में…
ढूंढता फिर रहा खुद को, महफ़िलों और वीरानों में…
कभी डूबा रहा गम मे ,कभी खुशियों का मेला है…
सफ़र है काफिलों के संग,पाया खुद को अकेला है…
प्यालों मे ढलते,देखा कभी,कभी मीला मयखानों में…..
ढूंढता फिर रहा खुद को,महफ़िलों और वीरानों में…
कभी तो रु-ब-रु हो “ऐ-इंदर” हमसे…
हसरतों की गुज़ारिश है मिलने की तुमसे…
कभी यहाँ,कभी वहाँ,न जाने ढूँढा,कहाँ-कहाँ…
जहाँ खो गया है तूँ, है वो कौन सी जहाँ…
मीला न तूँ मुझे कहीं, तेरे हर ठिकानों में…
ढूंढता फिर रहा खुद को,महफ़िलों और वीरानों में…
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6- "सिगरेट......( Cigarette)


सारी रात मैं सुलगता रहा,
वो मेरे साथ जलता रहा
मैं सुलग-सुलग के
घुटता रहा,वो जल-जल
के, ऐश-ट्रे मे गिरता रहा,
गमों से तड़प के मैं
हर बार सुलगता रहा
न जाने वो किस गम
मे हर बार जलता रहा
मैं अपनी सुलगन को
उसकी धुएँ मे उछालता
रहा, वो हर बार अपनी
जलन को ऐश-ट्रे
मे डालता रहा,
घंटों तलक ये सिलसिला
बस यूँ ही चलता रहा
मैं हर बार सुलगता
वो हर बार जलता रहा
मेरी सुलगन और उसकी
जलन से "ऐश-ट्रे"
भरता रहा....भरता रहा.......!!

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7-सफ़र ज़ारी रहा मेरा,


मंज़िले मिलती रहीं लेकिन सफ़र ज़ारी रहा मेरा,
हुए मुख्तलिफ-ए-राह-ए-गुज़र लेकिन खबर जारी रहा मेरा…


मुकम्मल ख़्वाब न हो शायद ये भी महसूस होता है
उम्मीद-ए-कारवाँ पे लेकिन नज़र ज़ारी रहा मेरा…


उन्हें ये इल्म न हो शायद शब-ए-महफ़िल में जीने का
लेकिन सहरा में भी जीने का हुनर ज़ारी रहा मेरा…


बेशक़ गुज़ारी है “इंदर” नई सुबहों की हर वो शाम
लेकिन गुज़रे हुए कल में बसर ज़ारी रहा मेरा…


ख़्वाहिश अब न हो शायद राह-ए-मोहब्बत से गुजरने का
लेकिन वो इश्क़ का अब भी असर ज़ारी रहा मेरा…

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