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विज्ञान-कथा // मुर्दे की आवाज - जीशान हैदर ज़ैदी

ए क पूरी तरह सुनसान सड़क थी यह। जिसके दोनों तरफ दूर-दूर तक फैले जंगल अमावस्‍या की रात को और भयावह बना रहे थे। यह दृश्‍य किसी भी अकेले व्‍यक्‍ति का रक्‍त जमा देने के लिये पर्याप्‍त था। लेकिन यह व्‍यक्‍ति शायद कुछ ज्‍यादा ही निडर था। काली जैकेट और इसी रंग की पैंट में वह बहुत आराम से चलता हुआ एक दिशा में बढ़ रहा था। एक पेंसिल टार्च की रौशनी उसे आगे का रास्‍ता दिखा रही थी।

फिर वह व्‍यक्‍ति सड़क छोड़कर एक पगडंडी पर बढ़ चला। लगभग आधा किलोमीटर चलने के पश्‍चात वह जिस स्‍थान पर पहुँचा वह एक बहुत पुराना कब्रिस्‍तान था। अनेक टूटी फूटी, कुछ साबुत कब्रों को फाँदता हुआ, वह आगे कदम बढ़ाने लगा और अन्‍त में एक बहुत पुरानी कब्र के सामने जाकर वह रुक गया। कब्र का पुरानापन उसकी जर्जरता में स्‍पष्‍ट हो रहा था।

“यही है वह कब्र” वह बुदबुदाया।

उसने अपने कंधे पर रखी कुदाल उतारी और कब्र खोदना शुरू कर दी। अभी उसे कब्र खोदते हुये थोड़ी ही देर हुई थी कि मानव हडि्‌डयों का ढांचा उसकी कुदाल में फंस कर बाहर आ गया।

“मिल गया ढांचा” वह एक बार फिर बड़बड़ाया। उसी कुदाल की सहायता से उसने एक हड्‌‌डी तोड़ी और बाकी ढाँचा दोबारा गड्‌ढे में डालकर उसमें मिट्‌टी भरने लगा।

अब वह हड्‌डी लेकर वापस उसी रास्‍ते पर चल पड़ा जिधर से आया था।

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यह इमारत अर्धचन्‍द्राकार थी। इसके द्वार पर डॉ. चन्‍द्रा का बोर्ड टंगा हुआ था। इसी द्वार के सामने एक कार आकर रुकी और उसमें से वही व्‍यक्‍ति उतरा जो पिछली रात कब्रिस्‍तान से हड्‌डी लेकर आया था।

कार से उतर कर उसने घंटी बजायी और कुछ ही देर बाद दरवाज़ा खुल गया। खोलने वाला हुलिये से नौकर मालूम हो रहा था।

“डॉ. चन्‍द्रा हैं अन्‍दर?” इस व्‍यक्‍ति ने पूछा।

“जी हाँ। वह अपने कमरे में हैं। आप अन्‍दर चले जायें।” नौकर ने कहा। उसके वाक्‍य से प्रतीत हो रहा था कि आने वाला इस घर के लिये अजनबी नहीं है।

आगंतुक ने कदम बढ़ाये और घर के अन्‍दर प्रविष्‍ट हो गया। राहदारी में चलता हुआ वह एक कमरे के सामने रुक गया और दरवाज़ा खट्‌खटाया।

“आ जाओ” अन्‍दर से आवाज़ आयी। वह कमरे के अन्‍दर प्रविष्‍ट हो गया। अन्‍दर एक ऐसा व्‍यक्‍ति बैठा था जिसकी आयु किसी भी प्रकार सत्तर से कम नहीं थी। वह एक कम्‍प्‍यूटरनुमा मशीन के सामने बैठा हुआ उसकी स्‍क्रीन पर आ रहे आंकड़ों का अवलोकन कर रहा था।

“मिल गया सामान?” “जी हाँ! यह रहा वह सामान।” इस व्‍यक्‍ति ने अपनी जेब से हड्‌डी निकाल कर मेज़ पर रख दी।

अब डॉ. चन्‍द्रा ने स्‍क्रीन पर दृष्‍टि हटायी और हड्‌डी को हाथ में लेकर उलटने-पलटने लगा।

“क्‍या तुम्‍हें पक्‍का विश्‍वास है कि यह तुम्‍हारे परदादा की हड्‌डी है?” डॉ. चन्‍द्रा ने उससे पूछा।

“ठीक उसी प्रकार, जिस प्रकार मुझे आपके डॉ. चन्‍द्रा होने का विश्‍वास है। केवल दो वर्ष पहले ही मेरे पिता की मृत्‍यु हुई है, और मृत्‍यु से पहले वह मुझे हर छह महीने पर परदादा और दादा की कब्रों पर ले जाते थे। अब आप देर न करिये और अपनी रिसर्च शुरू कर दीजिये।

“मेरी सारी तैयारिया पहले ही हो चुकी है। मैं केवल तुम्‍हारी प्रतीक्षा कर रहा था। आओ मेरे साथ” डॉ. चन्‍द्रा ने हड्‌डी अपनी जेब में रखी और उठ खड़ा हुआ।

फिर वह लोग एक ऐसे कमरे में पहुँचे जिसमें चारों ओर विभिन्‍न मशीनों का जाल बिछा हुआ था। उन सबमें एक मशीन जिसका ऊपरी हिस्‍सा पूरी तरह गोलाकार था कमरे के बीचो-बीच रखी थी और आकार में सबसे बड़ी थी।

“क्‍या अब मुझे उस खज़ाने का पता लग जायेगा जो मेरे परदादा ने सुंदरवन के जंगलों मे देखा था” उस व्‍यक्‍ति ने पूछा जो हड्‌डी लेकर आया था।

“निन्‍यानवे परसेंट मैं इस मामले में श्‍योर हूँ मि. मजीद। क्‍योंकि मैंने इस सम्‍बन्‍ध में बीस साल तक रिसर्च की है और तब ये मशीन बनाने में कामयाब हुआ हूँ।” डॉ. चन्‍द्रा ने अपनी जेब से हड्‌डी निकाली और एक कोने में रखी छोटी मशीन के खांचे में डाल दी। मशीन बन्‍द हो गयी और कमरे में एक अजीब प्रकार की घरघराहट की आवाज़ गूँजने लगी।

“लेकिन अभी तक मेरी समझ में नहीं आ पाया कि यह असंभव बात संभव कैसे होगी। वह भी केवल एक हड्‌डी से। मैंने आपको बताया था कि मेरे परदादा को एडवेंचर यात्रायें करने का बहुत शौक था। इसी यात्राओं के दौरान उन्‍हें सुन्‍दरवन में सोने-चाँदी का एक बड़ा भंडार मिला था। किन्‍तु वे उस भंडार को ला नहीं पाये थे और न ही किसी को उसका पता बता सके। यहाँ तक कि अपने बेटे अर्थात्‌ मेरे दादा को भी नहीं क्‍योंकि उससे पहले ही एक खतरनाक बीमारी में उनकी मृत्‍यु हो गयी। प्रश्‍न उठता है कि जिस बात का पता मेरे परदादा के अतिरिक्‍त और किसी को नहीं हो पाया उसे आप कैसे ज्ञात कर सकते हैं?” मि. मजीद ने अपनी शंका प्रकट की।

“तुम्‍हें यह शंका इसलिये हो रही है क्‍योंकि मैंने अभी अपनी रिसर्च के बारे में बहुत कम बताया है” डॉ. चन्‍द्रा कुछ क्षण रुके और फिर कहना आरम्‍भ किया, “मैंने आज से लगभग पच्‍चीस वर्ष पहले एक समाचार पत्र में छोटा सा लेख पढ़ा था जिसमें लिखा था कि मानव जाति की नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से कहीं अधिक बुद्धिमान होती जा रही है। अर्थात्‌ आज से पचास वर्ष मनुष्‍य की औसत बुद्धिमता आज की पीढ़ी की औसत बुद्धिमता से कम थी। मैं इस पर विचार करने लगा कि ऐसा क्‍यों होता है और फिर मैंने इसी विषय पर रिसर्च आरम्‍भ कर दी।”

मजीद बहुत गौर से डॉ. चन्‍द्रा की बातें सुन रहा था। डॉ. चन्‍द्रा ने आगे कहना आरम्‍भ किया। “इसी रिसर्च ने मुझे एक नये सत्‍य से परिचित किया।”

“कैसा सत्‍य?” डॉ. चन्‍द्रा को रुकते देखकर मजीद ने बेचैनी से पूछा।

“वह यह कि मानव शरीर की प्रत्‍येक कोशिका उसके पूर्व जीवन का दर्पण होती है।”

“अर्थात्‌?” मैं कुछ समझा नहीं।

“यह तो तुम्‍हें मालूम ही होगा कि किसी मनुष्‍य के जीवन में जो कुछ घटित होता है वह उसके मस्‍तिष्‍क के स्‍मृति केन्‍द्र में रिकार्ड होता रहता है और समय पड़ने पर हम विभिन्‍न मशीनों की सहायता से उसकी स्‍मृति के चित्र लेकर उसके जीवन में घटी घटनाओं को ज्ञात कर सकते हैं। हालांकि यह बहुत ही जटिल प्रक्रिया है किन्‍तु वैज्ञानिकों ने इस प्रकार की मशीन बनाने में सफलता प्राप्‍त कर ली है।”

“आपने सही कहा। वैज्ञानिक इसे मेमोरी डिस्‍प्‍ले नाम से पुकारते हैं। किन्‍तु मेरे परदादा की खोज का इससे क्‍या मतलब? वह मर चुके और मेमोरी डिस्‍प्‍ले मशीन किसी मरे हुये व्‍यक्‍ति की स्‍मृति नहीं पढ़ सकती।”

“हाँ, यह सच है कि लेकिन मैंने जो खोज की है उसके बाद किसी मरे व्‍यक्‍ति की स्‍मृति पढ़ी जा सकती है?”

“कैसी खोज?” मजीद ने पूछा। किन्‍तु डॉ. चन्‍द्रा का ध्‍यान उसके प्रश्‍न का उत्तर देने की बजाय मशीन की ओर आकृष्‍ट हो गया क्‍योंकि उसमें से विशेष प्रकार की सायरन की आवाज़ आने लगी थी और बीचो-बीच रखा गोला चमकने लगा था।

डॉ. चन्‍द्रा ने गोले के पास लगा एक बटन दबाया और मशीन से आवाज़ आनी बन्‍द हो गयी किन्‍तु गोला अब भी चमक रहा था।

“मैंने अपनी खोज में यह पाया कि मनुष्‍य की स्‍मृति में जो कुछ भी रिकार्ड होता है उसका एक सूक्ष्‍म फोटो पैटर्न उसकी प्रत्‍येक नयी कोशिका में भी बन जाता है। आयु बढ़ने के साथ-साथ मनुष्‍य में पुरानी कोशिकायें नष्‍ट होती रहती हैं और नयी कोशिकायें बनती रहती हैं। उन नयी कोशिकाओं के निर्माण के साथ उनके सृजन के समय की समस्‍त घटनाओं का सूक्ष्‍म फोटो पैटर्न उन पर आ जाता है। यह ब्‍योरा उनकी भावी पीढ़ी का बुद्धिमता बढ़ाने के लिये भी सहायक होता है क्‍योंकि इन्‍हीं कोशिकाओं में से कुछ उस पीढ़ी का सृजन करती हैं”

“ओह! यह तो वास्‍तव में एक नयी और अद्‌भुत खोज है किन्‍तु इस प्रकार तो किसी व्‍यक्‍ति के जीवन में घटी समस्‍त घटनायें उसकी नयी पीढ़ी को मालूम होनी चाहिये”

“ऐसा नहीं होता। क्‍योंकि उन कोशिकाओं से सूचनायें नयी पीढ़ी में ट्रान्‍स्‍फर नहीं होती। बल्‍कि केवल अपना रूप बदलकर थोड़ी-सी बुद्धिमता बढ़ाने में सहायक होती है। अपवाद रूप से यदि कोशिकाओं में किन्‍हीं कारणवश सूचनायें नष्‍ट हो जायें तो नयी पीढ़ी कम बुद्धिमान भी पैदा हो सकती है” डॉ. चन्‍द्रा ने कहा और वाटर कूलर से पानी निकालकर पानी पीने लगे।

“अब मैं यह बता रहा हूँ कि इस रिसर्च का तुम्‍हारे परदादा की हडि्‌डयों से क्‍या सम्‍बन्‍ध है। वैसे तो व्‍यक्‍ति जब मरता है तो उसकी कोशिकायें नष्‍ट होने लगती हैं। किन्‍तु हड्‌डी या अन्‍य ठोस अवययों की कोशिकायें बहुत समय तक नष्‍ट नहीं होती और साथ-साथ उनमें संचित सूचनायें भी। इस प्रकार इन कोशिकाओं का अध्‍ययन करके हम उस व्‍यक्‍ति के जीवन में घटी घटनाओं को ज्ञात कर सकते हैं। मेरी यह मशीन यही काम करती है” डॉ. चन्‍द्रा ने चमकते गोले की ओर संकेत किया जिसके पास वह स्‍वयं खड़ा थे।

“अद्‌भुत! आपकी यह खोज तो दुनिया में तहलका मचा देगी। आपने क्‍यों अभी तक इसे गुप्‍त रखा है। क्‍यों नहीं दुनिया को इसके बारे में बताते?”

“इसलिये क्‍योंकि इस खोज में मेरी सारी जमापूँजी लगी है और अब मैं इससे धन कमाकर विश्‍व का सबसे अमीर व्‍यक्‍ति बनना चाहता हूँ। इसीलिये मैंने तुम्‍हें चुना। अब हम तुम्‍हारे परदादा द्वारा खोजा गया खजाना पहले प्राप्‍त करके अमीर बनेंगे और फिर मैं अपनी खोज को विश्‍व के सामने लाऊँगा।”

“मैं तो पूरी तरह आपके साथ हूँ। आपको अपना वादा याद है न।”

“अच्‍छी तरह याद है। खज़ाने का बँटवारा फिफ्‍टी फिफ्‍टी होगा। और अब मैं मशीन पर तुम्‍हारी परदादा की मृत स्‍मृति देखने जा रहा हूँ” डॉ. चन्‍द्रा ने मशीन में लगा लाल बटन दबाया और गोला जो पहले चमक रहा था अब उस पर विभिन्‍न दृश्‍य आने लगे। अनेक प्रकार की घटनायें तेज़ी से एक के बाद एक गुज़र थीं।

“जल्‍दी ही हम उस स्‍थान पर पहुँच जायेंगे जब तुम्‍हारे परदादा सुंदरवन गये थे” डॉ. चन्‍द्रा ने कहा। उसकी दृष्‍टि स्‍क्रीन पर जमी हुई थी। साथ ही साथ अब्‍दुल मजीद की भी।

लगभग पन्‍द्रह मिनट पश्‍चात डॉ. चन्‍द्रा ने एक बटन पर उंगली रखी और स्‍क्रीन पर दृश्‍यों की गति धीमी हो गयी। यह जंगलों के विभिन्‍न दृश्‍य थे जो स्‍क्रीन पर एक के बाद एक दृष्‍टव्‍य हो रहे थे।

“अब हम सुंदरवन की स्‍मृति में पहुँच गये हैं” डॉ. चन्‍द्रा ने कहा।

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अब्‍दुल मजीद और डॉ. चन्‍द्रा की सुंदरवन यात्रा आरम्‍भ हो चुकी थी। पहले हवाई यात्रा और फिर बस द्वारा वे उस स्‍थान तक पहुँच चुके थे। गोलाकार स्‍क्रीन पर देखे गये दृश्‍यों के अनुसार उन्‍होंने एक नक्‍शा तैयार कर लिया था और अब उसी नक्‍शे के अनुसार वे अपने गंतव्‍य की ओर बढ़ रहे थे।

घने जंगल में विभिन्‍न खतरनाक जानवरों से बचते, झाड़ियों को फांदते और मनोरम दृश्‍यों का अवलोकन करते हुये उन्‍होंने अच्‍छा खासा रास्‍ता तय कर लिया।

“डाक्‍टर, मैं तो चलते हुये काफी थक चुका हूँ। लेकिन मैं देख रहा हूँ कि आपके चेहरे पर उसी प्रकार की ताज़गी है मानो अभी सोकर उठे हैं” मजीद ने कहा।

“हां! यह मेरी बनाई एक आयुर्वेदिक औषधि है, जो सत्तर वर्ष की आयु में भी मुझे स्‍वस्‍थ और ताज़ा रखती है” चन्‍द्रा ने आगे बढ़ते हुये कहा।

“क्‍या हम लोग सही रास्‍ते पर चल रहे हैं?” मि. मजीद ने पूछा।

“नक्‍शे के अनुसार अभी तक हम सही रास्‍ते पर जा रहे हैं। मुझे आशा है कि आधे घन्‍टे के अन्‍दर हम उस स्‍थान पर पहुँच जायेंगे” डॉ. चन्‍द्रा ने कहा।

फिर आधा घन्‍टा और बीता अब वे लोग एक गुफा के सामने खड़े थे।

“हम उस गुफा तक पहुँच गये जिसके अन्‍दर तुम्‍हारे परदादा ने खज़ाना देखा था” डॉ. चन्‍द्रा के चेहरे पर मुस्‍कराहट थी।

“शुक्र है खुदा का! मैं तो थक कर चूर हो चुका हूँ।” अब्‍दुल मजीद ने हाँफते हुये कहा।

डॉ. चन्‍द्रा ने अपनी जेब से एक टेबलेट निकाल कर उसे दी, “लो ये टेबलेट तुम्‍हारी थकान दूर कर देगी। यह वही टेबलेट है जो मैं इस्‍तेमाल करता हूँ” मि. मजीद ने टेबलेट लेकर निगल ली।

“दोनों ने गुफा के अन्‍दर प्रवेश किया। अन्‍दर घुसते ही उनकी आँखें फटी रह गयीं। पूरी गुफा सोने चाँदी के भण्‍डार से चमक रही थी।

“अरे वाह! इतना खज़ाना। इससे तो हम दुनिया के सबसे अमीर आदमी बन जायेंगे” डॉ. चन्‍द्रा बेतहाशा आगे दौड़े और सोने के टुकड़े हाथ में लेकर उछालने लगे।

“हम नहीं सिर्फ मैं” पीछे से मजीद की आवाज़ आयी। डॉ. चन्‍द्रा ने चौंक कर पीछे देखा। मजीद के हाथ में रिवाल्‍वर चमक रहा था।

“क्‍या मतलब?” डॉ. चन्‍द्रा उछल कर खड़ा हो गए। उसी समय मजीद के रिवाल्‍वर से शोला निकला और डॉ. चन्‍द्रा के सीने में सुराख हो गया।

“तुमने मेरे साथ धोखा किया लेकिन यह खज़ाना तुम भी नहीं ले जा सकोगे क्‍योंकि मैंने तुम्‍हें जो टेबलेट दी है उसमें ज़हर मिला था। ठीक दस मिनट बाद तुम मर जाओगे” कहते हुये डॉ. चन्‍द्रा ढेर हो गया।

“डॉ. चन्‍द्रा की बात सुनकर मजीद घबरा गया और उल्‍टी करके टेबलेट उगलने की कोशिश करने लगा। किन्‍तु अब काफी देर हो चुकी थी। धीरे-धीरे उसका चेहरा नीला पड़ने लगा और थोड़ी ही देर बाद वह भी दम तोड़ चुका था।

डॉ. चन्‍द्रा की मृत्‍यु के साथ ही उसकी खोज भी गुमनाम हो चुकी थी।

खज़ाना अपने स्‍थान पर पड़ा हुआ किसी और की प्रतीक्षा कर रहा था।

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ई-मेल ः zeashanzaidi@gmail.com

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