सूर्योदय - राजेश माहेश्वरी की कविताएँ

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- राजेश माहेश्वरी परिचय राजेश माहेश्वरी का जन्म मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में 31 जुलाई 1954 को हुआ था। उनके द्वारा लिखित क्षितिज, जीवन कैसा ह...

- राजेश माहेश्वरी

परिचय

राजेश माहेश्वरी का जन्म मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में 31 जुलाई 1954 को हुआ था। उनके द्वारा लिखित क्षितिज, जीवन कैसा हो व मंथन कविता संग्रह, रात के ग्यारह बजे एवं रात ग्यारह बजे के बाद ( उपन्यास ), परिवर्तन, वे बहत्तर घंटे, हम कैसे आगे बढ़ें एवं प्रेरणा पथ कहानी संग्रह तथा पथ उद्योग से संबंधित विषयों पर किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं।

वे परफेक्ट उद्योग समूह, साऊथ एवेन्यु मॉल एवं मल्टीप्लेक्स, सेठ मन्नूलाल जगन्नाथ दास चेरिटिबल हास्पिटल ट्रस्ट में डायरेक्टर हैं। आप जबलपुर चेम्बर ऑफ कामर्स एवं इंडस्ट्रीस् के पूर्व चेयरमेन एवं एलायंस क्लब इंटरनेशनल के अंतर्राष्ट्रीय संयोजक के पद पर भी रहे हैं।
आपने अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड, सिंगापुर, बेल्जियम, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड, हांगकांग आदि सहित विभिन्न देशों की यात्राएँ की हैं। वर्तमान में आपका पता 106 नयागांव हाऊसिंग सोसायटी, रामपुर, जबलपुर (म.प्र) है।

01.    सूर्योदय

सूर्योदय हो रहा है
सत्य का प्रकाश विचारों की किरणें बनकर
चारों दिशाओं में फैल रहा है
मेरा मन प्रफुल्लित होकर
चिंतन मनन कर रहा है
प्रभु की कृपा एवं भक्ति का अहसास हो रहा है
समुद्र की लहरों पर
ये प्रकाश की किरणें पड़ती है
तो तन, मन हृदय एवं आँखें
ऐसे मनोरम दृश्य को देखकर
शांति का आभास देती है
सुख और सौहार्द्र का वातावरण
सृजन की दिशा में प्रेरित कर रहा है।
आज की दिनचर्या का प्रारंभ
गंभीरता से नये प्रयासों की
समीक्षा कर रहा है।
शुभम्, मंगलम्, सुप्रभातम्
हमारी अंतरात्मा
वीणा के तारों का आभास देकर
वीणावादिनी सरस्वती व लक्ष्मी का
स्मरण कर रही है
तमसो मा ज्योतिर्गमय के रूप में
दिन का शुभारंभ हो रहा है
सूर्यास्त होने पर
मन हृदय व आत्मा में समीक्षा होगी
और आगे आने वाले कल की प्रतीक्षा में
जीवन का क्रम चलता रहा है
और चलता रहेगा।



    

                 02. संकल्प और समर्पण 


गंगा सी पवित्रता
यमुना सी स्निग्धता
सरस्वती सी वाणी
गोदावरी सी निर्मलता
नर्मदा सा कौमार्य
अलकनंदा सी चंचलता
कावेरी सी अठखेलियाँ
सिंधु सा चातुर्य
ब्रम्हपुत्र सी अलहड़ता
मंदाकिनी सी सहनशीलता
क्षिप्रा सा त्याग और तपस्या
सब मिलकर बनती है, भारत की संस्कृति
विश्व में अनूठी, हमें इस पर गर्व है
ये नदियाँ नहीं, हमारी जननी हैं
हम अपनी माँ को प्रदूषित कर रहें हैं
उसे मैला कर रहे हैं
परंपरा के नाम पर
विकास के नाम पर
विस्तार के नाम पर
अपना सारा प्रदूषण
उंडे़ल रहे हैं उसके आँचल में
नदियाँ केवल नदियाँ नहीं हैं
ये हैं हमारी सुख, समृद्धि, वैभव
और जीवन का आधार
हमें इन्हें बचाना है
अपना जीवन बनाना है
अपनी माँ को बचाना है
आओ हम सच्चे अंतः करण से संकल्प लें
हम प्रदूषण रोककर अक्षुण्य रखेंगे
अपनी माँ की पवित्रता
यही हो हमारी भक्ति और पूजा
यही हो हमारा संकल्प और समर्पण।


           03.  खोज और उपलब्धि


हम मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे जा रहे है
संतों के प्रवचन सुन रहे है
पर जिस आनंद की खोज में
हम भटक रहे है
वह नहीं मिलता
मिलेगा तो कैसे
उसका कोई रंग रूप आकार नहीं होता
वह महसूस होता है
हृदय से आत्मा तक
आनंद के लिये चाहिए
चिंतन, मनन, सकारात्मक दृष्टिकोण
और निरंतर नूतन सृजन
फिर होगा नया परिवर्तन
जन्म लेगी नए विचारों की एक धारा
होगा हमारा विरोध
पर उसे तो स्वीकार करना ही होगा
हमारे जाने के बाद
यही विचारधारा दिखलाएगी रास्ता
बना देगी हमें अमर
क्यों कि यही है
एक नई राह।


                     04.  हे राम


इतनी कृपा दिखाना राघव,
कभी न हो अभिमान।
मस्तक ऊँचा रहे मान से ,
ऐसे हों सब काम।
रहें समर्पित, करें लोक हित,
देना यह आशीष।
विनत भाव से प्रभु चरणों में,
झुका रहे यह शीश।
करें दुख में सुख का अहसास,
रहे तन-मन में यह आभास।
धर्म से कर्म
कर्म से सृजन
सृजन में हो समाज उत्थान।
चलूं जब दुनियाँ से हे राम!
ध्यान में रहे तुम्हारा नाम।



   

               05.  रूदन

कभी भी, कही भी, किसी का भी रूदन
देता है उसकी मजबूरी का आभास
बतलाता है उसके भीतर की कमजोर बुनियाद।
हमें समझना है
उसके रूदन का कारण
और करना है
उसके निराकरण का प्रयास
समाप्त करना है उसका रूदन।
हमारा यह प्रयास
हमारा उपकार नही़
हमारा कर्तव्य है
हमारा यह कृत्य
हमारा पुण्य है
ऐसे अवसर पर चुप नहीं बैठना है
इससे किसी को मिलता है नया जीवन
और हमारे जीवन में आता है आनंद।
किसी को नये जीवन का इंतजार है
आगे बढो।
दुखिया यह संसार हैं।



                   06.  लोग करें याद


जीवन में गरीबी
पैदा करती है अभाव
पनपाती है अपराध और
होता है समाज का अपराधीकरण।
जीवन में अमीरी
पैदा करती है दुर्व्यसन
लिप्त करती है समाज को
जुआ, सट्टा, व्याभिचार
और शराब में।
इसलिये हमारे ग्रंथ कहते हैं :-
धन हो इतना कि
पूरी हो हमारी आवश्यकताएँ।
कभी ना हो
धन का दुरूपयोग।
जीवन हो
परोपकार और जनसेवा से परिपूर्ण।
पाप और पुण्य की तराजू में
पाप हमेशा कम हों।
तन में पवित्रता और
मन में मधुरता हो।
हृदय में प्रभु की भक्ति और
दर्शन की चाह हो।
धर्म कर्म करते हुए ही
पूरी हो जीवन की लीला।
हमारे निर्गमन के पश्चात
लोगों के मनों में
बनी रहे हमारी याद।


            07.  रीति और प्रीति


सुनो मेरे मीत
यहाँ किसको है किससे प्रीत ?
इस दुनिया को समझो
यह चलती है धन पर।
जब तक धन होता है
सच्चे होते है सपने
सभी होते है अपने
सभी करते हैं गुणगान
हम समझते लगते हैं
अपने आप को महान
जिस दिन धन की नदी सूख जाती है
अपने तो क्या अपनी किस्मत भी रूठ जाती है
वे करने लगते है उपहास
जो रहते थे सदा हमारे पास
कोई नहीं देता सहारा
सभी कर लेते है किनारा
लेकिन वह परम पिता
नहीं छोड़ता है अपने पुत्रों का साथ
बढ़ाओ उनकी ओर हाथ
यदि चरित्र में होगी ईमानदारी
तथा कर्म में लगन व श्रम
मन में होगी श्रद्धा व भक्ति
परम पिता के प्रति सच्ची आसक्ति
तो वे थामेंगे तुम्हारा हाथ
बतलाएंगे तुम्हें रास्ता
और देंगे तुम्हारा साथ
जीवन में होगी स्नेह की बरसात
रूठे हुए भी मान जाएंगे
दूर वाले भी पास आएंगे
मेरे मीत, तुम स्वयं दुनिया के साथ रहो
पर स्वयं को परमात्मा के साथ रखो।


                08.  सृजन का नया इतिहास


मैं अपनी ही धुन में जा रहा था।
वह अपनी ही धुन में आ रही थी।
नजरें हुईं चार, फिर हुआ प्यार
मैंने उसे और उसने मुझे
सात फेरों के साथ
कर लिया स्वीकार।
जीवन की बगिया में खिल उठे
गेंदा, गुलाब, मोंगरा और हर सिंगार।
मेरे हर काम में अब
वह हाथ बंटाने लगी।
मेरी हर अपूर्णता को
पूर्णता बनाने लगी।
उसके कौशल से
घर की लक्ष्मी
दिन दूनी रात चौगुनी
बढ़ती ही जाती है।
उसके सद्भावों से
उसकी प्रतिष्ठा
ऊपर और ऊपर को
चढ़ती ही जाती है।
मैं अक्सर सोचता हूँ
अगर मेरे देश में हर घर में
चौके चूल्हे की सीमाओं को लांघकर
हर नारी कर्मक्षेत्र में उतर जाए।
तो देश की विकास दर
कभी नहीं घट पाए।
बस ऊपर और ऊपर को
बढ़ती ही चली जाए।
तब कल्पना में नहीं
हकीकत में देश हो समृद्ध
बढे उसका मान सम्मान और गौरव
रचे सृजन का नया इतिहास।


    

               09.  जन्मदिन

आज आपका जन्मदिन है
उम्र एक वर्ष और बढ़ गई
जीवन के सुनहरे सपने
पूर्णता पा रहे है
जीवन के बीते हुए ये वर्ष
कामनाओं को सफलता में
समाहित कर रहे है
बीत गये जो वर्ष उनमें
हम अपनी सेवा, समर्पण
और सद्कार्यों का करे चिंतन
अब सद्भाव के दीपों को
प्रज्जवलित करके
उसकी रोशनी से
जगमग करे स्वयं को
और अपने परिवार को
तभी सार्थक होगा
हमारा जन्मदिन।


         

          10.  आभार


शिशु का जन्म हुआ
मन में प्रश्न उठा
हम किसके प्रति आभारी हों ?
माता पिता के प्रति
जिनके कारण यह जीवन मिला।
वसुधा के प्रति
जो करती है शिशु का लालन पालन।
ईश्वर के प्रति
जिसकी कृपा के बिना
संभव ही नहीं है
जन्म भी और लालन पालन भी।
विज्ञान तो कहता है
किसी के भी प्रति
आभार की आवश्यकता नहीं हैं।
यह संस्कार तो बस
क्रिया की प्रतिक्रिया है।
संतों का कहना
गुरू आपकी बलिहारी है।
इसीलिये हम आभारी है
जन्म दाता माता पिता के
पोषणकर्ता आकाश और धरा के
मार्गदर्शक गुरू के
और कृपा बरसाने वाले प्रभु के।



  

             11.  दोस्ती

न तख्त है
न ताज है
बस दोस्तों का साथ है।
कोमल सुमन है दोस्ती,
शीतल पवन है दोस्ती।
है तरल सरिता दोस्ती,
पूजा की थाली दोस्ती।
बिछुडे अगर हम दोस्त से
तो दोस्ती कायम रहे।
होंठो पे हो मुस्कान
अपनी आँख चाहे नम रहे।
है क्या पता किस मोड़ पर
शायद कभी मिल जाए हम।
तब काम शायद आ सकें
कठिनाई हो या कोई गम।



  

              12.  दुआ

मुझे तुमसे यह शिकायत नहीं है
कि तुमने बेवफाई की।
लेकिन तुम्हारी बेवफाई ने
जो घाव दिया है
वह गहरा है
बंदूक की गोली से भी अधिक।
गोली का घाव तो
समय के साथ
भर ही जाता है,
पर बेवफाई का घाव
वह कभी नहीं भरता
लौकता रहता है
जीवन भर।
तुम्हारे प्यार में
बेवफाई का यह घाव
और इसकी यह टीस
दोनों मुझे प्यारे है,
क्योंकि ये तुमने दिये है
मेरा दिल तो तुम्हारे लिये
हमेशा यही दुआ मांगेगा
तुम सलामत रहो।
तुम सलामत रहो।



      13.  योग और खुशी

तनावग्रस्त मानव
खो देता है स्वयं पर नियंत्रण
नहीं पहचान पाता है
विपरीत परिस्थितियों को
हो जाता है दिग्भ्रमित
बदल जाता है उसका व्यवहार
दूर होते जाते है उसके अपने
चिंता ले जाने लगती है
उसे चिता की ओर
तब उसे आवश्यकता होती है
तनाव से मुक्ति की
भारतीय दर्शन ने
इसके लिए दिया है योग।
योग एक माध्यम और साधन है
तनाव से मुक्ति का
इससे बढ़ती है
चिंतन, मनन और निर्णय लेने की क्षमता
यह दिखलाता है
जीवन में सफलता का रास्ता।
इसीलिये कहते है
योग करो
स्वयं भी खुश रहो और
परिवार को भी खुश रखो।


       

         14.   अंतिम रात


आज की रात मुझे
गहरी नींद में सोने दो
क्या जाने
कल का सूरज देखूं
या ना देख सकूं
चांद के दूधिया प्रकाश को
दस्तक देने दो
मेरी आत्मा के द्वार पर।
जा रहा हूँ -
अंधकार से प्रकाश की ओर
जाग रहा है -
भूत, वर्तमान और भविष्य का अहसास।
हो जाने दो -
पाप और पुण्य का हिसाब।
आ गया है अंत -
आ जाने दो।
बरसने दो उस अनंत की कृपा
जगमगाने दे आत्मा
मैंने किये जो धर्म से कर्म
स्थापित रहें।
उनका फल मिले
परिवार और समाज को
ऐसी प्रार्थना करते करते ही
गहरी नींद में सो गया।
प्रारंभ से अंत नहीं
अंत से प्रारंभ हो गया।


              15.  भीष्म


जीवन की राहों में
फूल हैं कम
कांटे हैं ज्यादा।
हम जिन्हें समझते हैं फूल
वे ही चुभते हैं बनकर शूल।

कांटे तो कांटे हैं
उनसे हम रहते हैं सावधान,
धोखा वहीं खाते हैं
जहाँ बस फूल नजर आते हैं।

पितामह भीष्म का मन था
कृष्ण के साथ
लेकिन वे
तन से
जीवन भर कांटों के साथ रहे
और
कांटों की सेज पर ही मरे।

भीष्म जब संसार से विदा हुए
तो अपने साथ ले गए
धरती के ढेर से कांटे
और अपनी जन्मभूमि पर
छोड़ गए श्रीकृष्ण को
और पाण्डवों सहित उन वीरों को
जिनका चरित्र था
फूलों सा,
वे स्वयं अधर्म के कांटों पर सोये
और जनता को दिये
धर्म के फूल।

आज नेता
सो रहे हैं फूलों की सेज पर
और जनता को दे रहे हैं
मंइगाई और भ्रष्टाचार के कांटे।
जनता का दुख-दर्द
उन्हें नजर नहीं आता,
इसीलिये उनमें कोई भी
भीष्म पितामह नहीं बन पाता।

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नाम

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड 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रचनाकार: सूर्योदय - राजेश माहेश्वरी की कविताएँ
सूर्योदय - राजेश माहेश्वरी की कविताएँ
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