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लघुकथा शीर्षक -"जिंदगी है जंग" - डा.अंजु लता सिंह

अल्लसुबह ही दूरदर्शन पर आतंकवादियों के साथ आर्मी जवानों की मुठभेड़ में शहीद देशभक्तों की सूची जारी की जा रही थी तभी मेरी नवविवाहिता बेटी पायल चीखी-मम्मा!हाय राम!देखो आपका चहेता स्टुडेंट सरताज भी मारा गया..ओफ्फ..

वैरी बैड..अगले हफ्ते ही तो उस बेचारे की शादी थी.

--क् क् क्क क्या कहा.. आ.. आ..अरे.. रे बड़ा  होनहार,सच्चा,मेधावी और जिंदादिल बच्चा था.बेचारा मत कहो बेटा!देश के लिये  मर मिट गया..गर्व की बात है.

--दिनभर शहीद जांबाजों के  ह्रदयविदारक पारिवारिक दृश्य दिखाए जाते रहे.घर में सन्नाटा  सा पसरा था.

--रात को सोते समय रह-रहकर

मुझे बीते दिन याद आने लगे थे

--मैम जी! क्लास में सुधीर और गौतम पिछले बैंच पर बैठकर रोज झगड़ते हैं.मैं डिस्टर्ब होता हूं मैम..आप इन्हें सजा दीजिये.

--लंच में सभी टीचर्स  के बीच ऊंची आवाज में अपनी बात बोलकर वह वहीं मेरी कुर्सी के पास डटा रहा.

--अरे अभी जाओ बेटा..क्लास में याद दिलाना मुझे.

--- मैम क्लास में सबके सामने बोलूंगा तो हम तीनों में युद्ध हो जाएगा.

किसी तरह उसे वापस भेज तो दिया पर उसकी स्पष्ट बेबाक बातें मन को भा गई थीं.

--- यार!तेरी क्लास का ये स्टुडेंट  तो बड़ा निडर है.

---'सरताज' है रे स्कूल का भी..

--यही है हैड ब्वाय?

---यैस..हर विषय में दक्ष है.. सेना में जाना चाहता है.इसके पापा और दादा भी आर्मी में रहे हैं.

मैं बोली और "आजादी के पचास वर्ष :हमारा गर्व"विषय पर  आयोजित वक्तव्य प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार से नवाजे गए  सरताज की तारीफों के पुल भी

बांधती रही.

---अगले दिन कक्षा में जाकर मैंने ब्लैक बोर्ड पर एक विषय देकर आशुभाषण प्रतियोगिता का आयोजन ही कर डाला...हर विद्यार्थी को एक एक मिनट बोलने का समय दिया गया.

विषय था- "एक गाल पर कोई मारे तो क्या दूसरा गाल भी आगे कर दें?"

सरताज वहां भी प्रथम स्थान पर आकर बाजी मार ले गया.

---उसकी कही सारी बातें मैंने रिकॉर्ड  कर ली थीं तभी...सुबह से ढूंढ रही थी आडियो क्लिप..मिली ही नहीं..

---अचानक दूर से आते स्वर  कानों से टकराए-"गांधी जी अहिंसा की बातें करते रहे सुभाष क्रांति की...दोनों ही देशभक्त थे,पर मैं तो अपनी ही अलग विचारधारा का पोषक बनूंगा..शत्रु  को तो मात देनी ही पड़ेगी ना..एक गाल भी आगे क्यों करें...दूसरे गाल पर तमाचा मरवाने का तो सवाल  ही नहीं उठता है बंधु!

--- दुश्मन दो मारे तो बदले में चार मारो...बस समझिये हो गया फैसला..

हमें खुद्दारी,देशप्रेम और झगड़ों से पहले अपने कर्तव्य का ध्यान  रखना होगा.गोली पीठ पर नहीं सीने पर खाओ पर हिंसक को धूल चटाकर ही दम लो...

जिंदगी एक जंग है... मात्र मस्ती और उमंग नहीं ...

आंखें खुलीं तो फिर से रेडियो  पर वही समाचार दोहराए जा रहे थे.

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डा.अंजु लता सिंह

सी-211/212

पर्यावरण काम्प्लेक्स

समीपस्थ-गार्डन ऑफ फाइव सैंसेज

सैदुलाजाब

नई  दिल्ली-30

नई दिल्ली

2 टिप्पणियाँ

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