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सुगन्ध - कविताएँ - सुरेन्द्र कल्याण बुटाना

देश के जवान

देश के जवान
चलता जा, बढ़ता जा
आगे को बढ़ता जा,
तू अकेला नहीं, तू बेचारा नहीं,
ये पूरा देश तेरे साथ खड़ा,
तू चिंता छोड़, ये देश कह रहा।।

चलता जा, बढ़ता जा
आगे को बढ़ता जा,
आज तेरी जीत का जशन है
तेरे भरोसे यह वतन खड़ा है
तू देश की ताकत है
तू देश का अभिमान।।

खड़ा है देश तेरे साथ
तू गढ़ता-जा इतिहास
आगे तू बढ़ता जा,
जीत का परचंम लहराता जा
मेरे देश के वीर
चलता जा, बढ़ता जा
आगे को बढ़ता जा,।।

देख तू पीछे मुड़ कर आज,
सारा भारत तुझे सलाम कर रहा
चलता जा, बढ़ता जा
ऊँचाइयों को छूता जा।।


मेरे देश के जवान
तू देश का नाम रोशन करता जा।।

मुझे गर्व है

मुझे गर्व है
आज जो मैं हूँ।।

मुझे गर्व है
आज जो मैं कह सकूँ।।

आज न रोक पाएँगे,
आँधी-तूफान
मैं हूँ युवा,
मुझे गर्व है
मिला मुझे ज्ञान
ज्ञान ही तो बनाए महान।।

ज्ञान का प्रकाश
जाऊँ में लेकर,
चौखट-चौखट
करूँ मैं सब को चौकस,
मुझे गर्व होगा
बहुत सारा,
मेरा राष्ट्र होगा,
सर्व समृद्ध शिक्षित सारा।।



सुगन्ध

बैठा एक ठेला लगाए
छोटा-सा जग बनाए
धुप में तपता,
लोगों को बुलाता
फिर भी निराश ही रह जाता,
सारा दिन कमाता
फिर भी लाभ न पाता,
कभी शीत मारती,
तो कभी लूं,
फिर भी खुश रहता।।

बैठा एक ठेला लगाए
छोटा-सा जग बनाए
सोचे सारे क्या ये कमाए?
हर पल खुशी के गीत ये गाए,
फल न तो बिकता
न कोई खरीदता
फिर न हार मानता,
फल ही बेचता,
फल ही खाता,
बस अपना पेट-पालता।।

फल कभी बिक जाता,
कभी सड़ जाता
फिर भी डटा रहता,
सोचे आस-पास के ठेलेदार
क्या है इसका राज?

इसका राज उसी ने जाना
जिसने फल को करीब से पहचाना,
सड़ जाता,
नष्ट हो जाता,
परंतु फिर भी
अपनी मिट्टी प्यारी
सुगन्ध छोड़ जाता।।

बालपन

बच्चे मासूम, सबसे प्यारे
मन के सुंदर, तन के न्यारे।
कह जनता, जगत जहान
बच्चों में बसते भगवान।।

कला कृतियों से सबको बहलाए,
शरारतें करते मनमोहन कहलाए।।

बच्चे देश के होते भविष्य,
बच्चों की समृधि से होता-
देश का विकास सही से।।





समाज की दौड़

समाज की दौड़
चलती जाए शाम-सवेरा,
धक्का-मुक्की
चारों और तेरा-मेरा,
आशाओं का महल यहाँ -
बनाए यहाँ हर राही है।।

समाज की दौड़
चलती जाए रैन-बसेरा,
असमंजस का घेरा
सोच-दृष्टि हो खत्म,
छाए घोर अन्धेरा,
सोचू कब हो-
खुशियों का उदित सवेरा।।

ऊपर-नीचे है मीनार,
इसका खेल अपार,
एक के ऊपर एक
बराबर न कहे कोई,
बराबर में क्यों?
मेरे से ऊपर होए कोई।।

मीनार है सभी के पास,
है यह नाक समान
समाज की दौड़
यूँ ही चलती जाए
जहाँ इसका अंत हो जाए
वह अंतिम सीमा कहलाए।।

अंधविश्वास

बात बनती चौखट-चौखट,
एक मोड़ से चौराहे,
पहुँचती घर-घर।।

बात से बात बनती जाए,
चलती-चलती प्रदेश गुम जाए,
यह होती अफवाह बस
इस अफवाह का रूप ही बदल जाए,
अफवाह का फिर तोल-मोल होता,
सोचे समाजवादी अफवाह है,
या साजिश आदि।।

कोई न इसका भेद पाया,
यह सब जीभ की माया
सब अंधविश्वास है, जो एक शाप है
गाँव पहरे-
लोग ढूँढे अपने-अपने पितारे।।

कभी काले कच्छश्
तो कभी चोटी काटू,
आन ललकारे-
लोगों में दहशत बन जाए,
इस शक के चलते, पहरा लग जाए।।


(अंधविश्वास)
जबकि ऐसा कुछ न होने आए
खबर, समाचार और अखबार,
लोगों को डराते-
झूठ को भी सच बनाते,
लोग नीम को अपना कवच बनाते
पत्ते इनके घर के बहार लटकाते।।

यही तो है अंधविश्वास,
जिस कारण समाज पीछे रहता,
यह पढाई का है अभाव-
जानना पडेगा इसका भाव।।

होना पडेगा जन-जन को जागरूक,
एक होकर खड़ा होना पडेगा,
सबको मिलकर-
इस मेल को धोना पडेगा।।

आज मैं

आज अकेला खड़ा हूँ
खुद से अनजान हूँ।
परेशान हूँ, थोडा नादान हूँ
कोई राह न दिखाई देती,
कोई अपना न नजर आता,
आता नजर तो-
सुनी राह
जहाँ मैं और मेरे जज्बात।।


इन्हीं सब में संसार,
और अन्न दान का भार,
सब लगे एक पल का मेला-
आज मैं हूँ अकेला,
यूँ तो सभी मेरे साथ हैं
फिर न जाने कैसी सनसनाहट है
दिल में रहती।।

यह लगता आधुनिक-
जमाने का रिवाज,
जहाँ हो रहा सब बर्बाद,
सभी रहते साथ,
होते साथ परंतु
दिखाई नहीं पड़ता इनमें प्यार।।

नजरें चुरा कर बातें करते,
फिर बात करके हँसते
पास में भाई कहते,
पीछे सौदाई कहते,
यह है जमाने की नई राह
कोई न किसी का सहा है।।

भोग और वैभव के पीछे
अपना मनुष्यता गँवा बैठे,
आज एक-दूसरे से भी-
भाईचारा गँवा बैठे,
ये थी समाज की सच्चाई-
जो मेरे सामने आई।।


मुसाफिर हूँ

मुसाफिर हूँ
मंजिलों तक जाना है
न घर है
न ठिकाना-
मुझे चलते जाना है
जीवन के हर पडाव को-
पूरा करते जाना है
है अगर संघर्ष जीवन,
तो लड़ते जाना है।।

मुसाफिर हूँ
जज्बों से भरा,
जला जाऊँगा उम्मीदों-
का नया दीया,
जीवन में हर मोड़
है चुनौतियाँ,
तो सामना करते जाना है
मुसाफिर हूँ
मंजिलों तक जाना है।।


सिफारिश

पाप, पाप, पाप
मन में है सभी के पाप !
जग घुमूँ कोई अपना न लगे,
ढूँढूँ सिफारिश कोई अपनी न कहे,
आज तो अपने-
पराए होने की कगार पर है
लगे आज जैसे मेरा इम्तेहान है।।

पाप की परिभाषा न जानूँ
इस घडी को देख, सब पहचानूँ,
सिफारिश आज सभी जगह जरूरी,
सिफारिश बिना न कोई मन्नत हो पूरी।।

दूर गगन में

दूर गगन में
है वो कौन?
दूर चमन में
है वो जो
बहारों का राही है
जिसमें न कोई बुराई है
वो ही तो पक्षी-
उठता एक सिपाही है।।

नजर वो रखता है
जानता - समझता है
हर मौसम में प्रभु को-
याद वो रखता है
इंसान से न कभी लड़ता है
किसी से कुछ न चाहता है
दूर गगन में-
खुश वो रहता है।।

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Name- Surender Kalyan Butana

Father Name- Suraj Bhan

Eduction- B.A

Address- Village Butana Post Office- Nilokheri,

Distt- Karnal (haryana)

Contact- surenderkalyan8@gmail.com

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