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समीक्षा - आशा, विश्वास, समर्पण का अमृत कलश है: “खोजना होगा अमृत कलश” - डॉ. नितिन सेठी

प्रकाशनार्थ: पुस्तक समीक्षा

●आशा, विश्वास, समर्पण का अमृत कलश है: “खोजना होगा अमृत कलश”●

                                  ● समीक्षक: डॉ. नितिन सेठी

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कृति  :खोजना होगा अमृत कलश

कवि  : राजकुमार जैन राजन

प्रकाशक: अयन प्रकाशन, 1/20-महरौली, नई दिल्ली- 110030

पृष्ठ: 120 (सजिल्द), मूल्य: 240/- रुपये, संस्करण : 2018

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   साहित्य का कार्य आज केवल मनोरंजन करने का ही नहीं रह गया है।आज का साहित्य नवीन मार्गों की खोज करता है।आज का साहित्य इन मार्गों पर संकल्पबद्ध होकर चलने वालों की खोज करता है।अवसाद, चिंता और व्यथा भरे आज के मशीनी युग में इंसान अपनी सारी खुशियों को भूल सा गया है। हमारे शास्त्रों में शरीर की “ यत्र पिण्डे तंत्र भ्रमाण्डे” उक्ति से महत्ता दर्शाई गई हैं। हमारा मन स्वयम ही अमृत घट है। बस आवश्यकता है अपनी सोई हुई शक्ति को जगा पाने की। ऐसे समय में जब राजकुमार जैन राजन “खोजना होगा अमृत कलश” का उद्घोष करते हैं, एक सात्विक विश्वास -सा मन में जगता है। सत्यम- शिवम- सुन्दरम की स्थापना का भाव लिए राजन अपनी कलम की शक्ति से बेदार दुनिया को जगाना जानते हैं। उपर्युक्त नाम के आपके कविता संग्रह में कुल पचास कवितायें समसामयिक पृष्ठभूमि पर लिखी गई हैं।

       “जिंदगी का गीत” कविता में कवि का आह्वान है कि मानवता की रक्षा के लिए जिंदगी के गुनगुनाते गीत लिखें जायें-

                 “ आखिर कब तक देखते रहेंगे हम

                  देश को यूं होते बदरंग

                  कहाँ गया वो मेहमान नवाजी

                  और भाईचारे का रंग

                  आओ, मिलकर करें कुछ

                 मौत का सन्नाटा बुनती अंगुलियों को

                 जिंदगी का गीत लिखना सिखाएं”

        “अंतहीन अनुसंधान”  में जीवन को अंतहीन यात्रा दर्शाया गया है। “ तुम कौन हो ?”  कविता में राजनजी की व्यथा प्रश्नों के माध्यम से बाहर आई है। धरती पर विष बीज बोने वालों से कवि प्रश्न करता है और कहता है -

               “ यह सब क्या हो गया है

                 धरती के अमृत कोष में

                 विष बीज कौन बो गया है

                 नये सूर्योदय के साथ जिंदगी का

                एक नया गीत लिखा जाय”

          संग्रह में रुमानियत भरी कविताएँ भी हैं। प्रेम का कोमलकांत अहसास शब्दों में नये अर्थ भर देता है। “नियति” में वियोग का दर्द  उपस्थित हुआ है। प्रतीक्षारत नायक अलगाव को ही अपनी नियति मान बैठा है दुःख भरे शब्दों में कवि का वक्तव्य उल्लेखनीय है -

           “ मैं कोई  पत्थर तो नहीं

            कि टूटना ही नियति बन गई है मेरी

            कितना कठिन है दुनिया में

            किसी से प्यार का अहसास “

       इसी प्रकार की आत्म अभिव्यंजना “ पीड़ा के दुर्गम पथ “ , “ सपनों की पगडंडी “, “ नहीं देखा समुद्र “, “ सूरज की इजाजत “ कविताओं में भी है। “ सूरज की इजाजत “ में एक किरन संसार भर  में पुनर्जीवन भर देती हैं। कवि की कल्पना देखिए-

           “ मैं प्रतीक्षारत था

             अंधकार में होती हलचल

             सूरज की इजाजत लेकर

             उजाला फैलाने को आई एक किरन

             जो हमारी जिजीविषा को

             देगी पुनर्जीवन “

        शीर्षक कविता “ खोजना होगा अमृत कलश “ में सार्वभौमिकता और समरसता का मूल उत्स शब्दायित हुआ है। जीवममूल्यों कि तलाश, शांति की तलाश, शांति की स्थापना,आदर्श मूलक समाज की स्वीकृति और सहअस्तित्व का संधान  हम यहां प्रमुख रूप से देख सकते हैं। कवि का विचार सराहनीय हैं-

           “खोजना होगा उस अमृत कलश को

           भर दे धरा पर जो प्यार की खुशबू

           मानवता के घर आंगन को जो

           रोशन करे आज फिर”

          इसके आगे भी कवि “सत्यम, शिवम, सुंदरम” के प्रकाश की स्थापना का आह्वान करता हैं। कवि को उस अमृत कलश की तलाश है जिसमें शांति, सौहार्द, सहानुभूति, सौजन्यता के अनमोल रत्न भरे हों। राजन जी सामाजिक परिस्थितियों से भी अछुते नहीं है। समाज के विभिन्न वर्गों  और पात्रों को आधार बनाकर सृजित की गई उनकी अनेक कवितायें संग्रह में हैं।

       एक साधनहीन गरीब बच्चे का प्रति चित्रण कवि ने “ हासिए पर वह” में किया है। “लोकतंत्र की सुविधायें” ऐसे बच्चों से कोसों दूर है। छल और बहकावे की दुनिया मे ऐसे दीन-हीन की स्मृति में डूब कर कवि लिखता है-

           “ सालते रहते हैं हरदम उसे

             खामोशियों के गहरे साये

             उदासी भरी जिंदगी में

             रोशनी की तमन्ना ही न थी

             आज भी हासिए पर

             उसकी वही दुनिया है”

     इसी प्रकार “ बेरोजगार “ कविता में भी बेरोज़गारी की समस्या को उठाया गया है। दिखावटी राजनीति पर “एक सवाल”  में सवाल उठाया गया हैं।  तब और अब के समय का अंतर “अर्थ युग का चमत्कार” में द्रष्टव्य है।  यहां कवि ने बदलते वक्त की नब्ज टटोली है और अपनी नाराजगी भी ज़ाहिर की है।  संग्रह की कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता है इनकी “संवेदनशीलता” । छोटी- छोटी बातों को भी राजन जी बड़ी बारीक नज़र से देखते हैं और उनमें नवीन उद्भावनाओं की संसृष्टि करते हैं। आम आदमी का दर्द उकेरना और उसे सीधी-सादी भाषा में अभिव्यक्ति देना, राजन जी का ही कार्य है। ये कवितायें आशा, विश्वास, समर्पण का अमृत कलश है जिनके अमृतपान से तन- मन दोनों ही पवित्र हो जाते हैं। राजनजी के ही द्वारा बनाये गये विभिन्न रेखा चित्र पुस्तक के सौंदर्य को बढ़ाते हैं। सभी कविताएँ छंदमुक्त हैं परंतु इनकी अपनी अन्तर्निहित लयात्मकता पाठक को बरबस ही बांध लेती है। आज समाज को इसी प्रकार की समसामयिक चिंतना से पूर्ण कविताओं की ही आवश्यकता है। “ खोजना होगा अमृत कलश”  यह पिपासा शांत करती है।

      आकर्षक कवर पृष्ठ,  बढ़िया कागज़, सुंदर छपाई , सजिल्द यह संग्रह साहित्य जगत के लिए अनुपम उपहार है। राजकुमार जैन राजन को इस सुंदर कृति के लिए हार्दिक बधाई। ●

                                      समीक्षक -

                                      डॉ. नितिन सेठी

                                     सी- 231, शाहदाना कॉलोनी,

                                     बरेली- 243005 ( उ. प्र. ) 

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