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लघुकथा - चालाकी का रास्ता - ज्ञानदेव मुकेश

   एक ट्रेन स्टेशन पर आकर रुकी। चढ़नेवाले यात्री यकायक दौड़ पड़े और उतरनेवालों यात्रियों का रास्ता रोककर गेट पर धक्का-मुक्की मचाने लगे। उतरनेवाले चीखने-चिल्लाने लगे, ‘‘पहले हमें उतरने दो ! पहले हमें उतरने दो!’’
   मगर चढ़नेवाले कहां सुननेवाले थे। उतरने की नाकाम कोशिश करने वालों में एक बूढ़ी औरत भी थी। वह भी हाथ-पांव जोड़ रही थी। मगर सुननेवाला कोई नहीं था। तभी बूढ़ी औरत ने पूछा, ‘‘यह पटना स्टेशन है न ?’’
    एक यात्री ने जवाब दिया, ‘‘पटना ? वह तो कब का निकल गया। तुम तीन स्टेशन आगे आ चुकी।’’
    बूढ़ी औरत हाथ-पांव पटकने लगी। उसने अन्य यात्रियों को गुहार लगायी, ‘‘भैया लोग, अब तो उतरने दो। सोचो, मैं तीन स्टेशन वापस कैसे जाऊंगी ?’’
   यात्रियों को तत्क्षण दया आ गई। उन लोगों ने बूढ़ी औरत को उतरने के लिए रास्ता बना दिया। बूढ़ी औरत झट से नीचे उतर गई। नीचे उतरकर उसने राहत की सांस ली। नीचे उतरने वाले एक अन्य यात्री को बूढ़ी औरत से सहानुभूति हुई। उसने बूढ़ी औरत से पूछा, ‘‘माई, अब वापस पटना किस ट्रेन से जाओगी ?’’
    बूढ़ी औरत हंसने लगी। उसने कहा, ‘‘बक, बुड़बक ! मुझे यहीं उतरना था। मैंने झूठ कहा। ऐसा न कहती तो वे मुझे उतरने का रास्ता देते क्या ?’’
    वह यात्री बूढ़ी औरत की होशियारी पर हतप्रभ था।   

                                                 -ज्ञानदेव मुकेश                                                
                                     पता-
                                                 फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                                 अल्पना मार्केट के पास,
                                                 न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी, 
                                                  पटना-800013 (बिहार)

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