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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च पर विशेष.... नारियों ने अपने बूते हासिल किए मुकाम - डॉ सूर्यकांत मिश्रा,

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च पर विशेष....

      नारियों ने अपने बूते हासिल किए मुकाम

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  हवाओं का रुख बदल रौशन किया मशाल........

                 "या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता" इस तरह के शक्ति आराधना स्वर हर घर और हर मनुष्य के हृदय में गुंजायमान है। इसी वेद वाक्य की ताकत के बल पर आज भारतवर्ष की नारी अपनी शक्ति और सम्मान की तलाश कर रही । महिला सशक्तिकरण का उदघोष करने वाले हमारे देश में महिलाओं के साथ हो रही घरेलू हिंसा ,शोषण, दुष्कृत्य की घटनाएं रोज समाचारों की सुर्खियों में बनी हुई हैं। वर्तमान में नारी शक्ति की जो परिस्थितियां बनी हुई हैं उन पर चिंतन की जरूरत जान पड़ रही है। नारी ईश्वर की एक ऐसी रचना है जो समाज को रचती है,सहेजती है और समय आने पर अन्याय का विनाश भी करती है। हमारे देश की नारियां अनादिकाल से अंधकार के विरुद्ध सतत युद्ध का प्रतीक रही हैं। सवाल यह उठता है कि जिस देश में महिलाएं खुद सक्षम थीं तब वहां कौन सर कारण पैदा हुए जिनके चलते आज स्थिति संतोषजनक नहीं है। जहां तक मैं समझता हूं इसका कारण है कु-प्रथाओं का जन्म। राजपूतों ने जौहर की प्रथा को जन्म दिया तो मुगलों ने पर्दा प्रथा की शुरुआत कर नारियों पर जुल्म ढाए। सतीप्रथा ने भी समाज में नारियों  को कमजोर कर दिखाया तो देवदासी प्रवृत्ति ने भी महिला के सम्मान को ठेस पहुंचाई। हमारे देश की ऐसी ही प्रथाओं ने आधी आबादी की ऊर्जा व शक्ति को कुंठित कर दिया। मुझे कु-व्यवस्थाओं पर प्रहार करने वाले महान कवि एवम संत कबीरदास जी की पंक्तियां इस संदर्भ में सटीक लगती हैं---

           नारी निंदा न करो, नारी रतन की खान,

            नारी से नर होत है, ध्रुव-प्रहलाद समान ।।

       अर्थात नारी की निंदा कभी मत करो ।नारी अनेक रत्नों की खान है । नारी से ही पुरुष की उत्पत्ति होती है। ध्रुव और प्रहलाद भी नारी की ही देन हैं।

                     शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के मुद्दे भी हैं,जिनसे भारतवर्ष की नारी जूझ रही है। इन तीनों ही अहम मुद्दों पर दर्द एवम टीस पैदा करने वाली खबरें हम प्रतिदिन समाचार पत्रों की सुर्खियों में पढ़ते आ रहे हैं। कभी मासूम बच्ची से लेकर युवती एवम वृद्धा तक के साथ किये जाने वाले दुष्कर्म की खबरें हमारी आत्मा को झखझोर कर रख देती हैं तो कभी महिलाओं एवम युवतियों पर होने वाले तेजाबी हमलों से दहशत कस वातावरण समाज को द्रवित कर देता है। इन घटनाओं के अलावा और भी ऐसी खबरें हैं जिन्हें न चाहते हुए भी सुनना और पढ़ना पड़ता है। इन्हीं नकारात्मक खबरों के बीच अब सरकार द्वारा चलाई जा रही कुछ चुनिंदा योजनाओं के सहारे नारी अपनी सोई और खोई शक्ति को जगाने में कामयाब हो रही है। सरकार द्वारा आत्मनिर्भरता के लिए शुरू की गई इलेक्ट्रॉनिक रिक्शा योजना के तहत अब युवतियां एवम महिलाएं स्वयम रिक्शा चालक बनकर आर्थिक संपन्नता की ओर कदम बढ़ा रही हैं। ऐसे ही उत्साहवर्धक समाचारों में मंगलयान को अंतरिक्ष में छोड़ते समय जिन वैज्ञानिकों को कंप्यूटर स्क्रीन के समक्ष मिशन की प्रगति का निरीक्षण करते हुए दिखाया गया,उसमें उल्लेखनीय संख्या महिला वैज्ञानिकों की भी थी। नारियों के बढ़ते कदम कहीं न कहीं भविष्य की सुंदर तस्वीर दिखा रहे हैं। इसे कुछ इस तरह भी कहा जा सकता है---

         नारी कोमल फूल सी, नारी है बलवान

          वक्त पड़े दुर्गा बने, थामे तीर कमान।।

                   आज हमारे समाज में नर और नारी के प्रति समानता का वातावरण बनाने की बात कही जाती है,लेकिन गंभीरता से विचार करें तो नारी को समानता से ज्यादा सम्मान की जरूरत है। प्राचीनकाल में भी महिलाओं की सामाजिक स्थिति को नर-नारी एक इकाई के रूप में देखा जाता था। दोनों एक-दूसरे पर आश्रित रहते हुए एक-दूसरे के पूरक माने जाते थे। भारतीय समाज में नारी अनेक भूमिकाओं पर देखी जा रही है। यही नारियां पारिवारिक संदर्भ में माँ, बेटी, बहन,पत्नी,बहु,सास आदि संबोधनों से विभूषित की जाती रही हैं। इतनी भूमिकाओं में कर्तव्यों का पालन करने के बाद भी उसे परिवार में सम्मानजनक स्थान नहीं मिलता ।वांछित अधिकार नहीं दिए जाते। सीमित दायरे में रहने का पाठ पढ़ाया जाता है,तो वह अपनी प्रतिभा तथा क्षमताओं का पूर्ण उपयोग नहीं कर पाती है और एक तरह से परतंत्रता भरा जीवन जीने विवश हो जाती है। समाज में महिलाओं की स्थिति का मूल्यांकन कुछ गिनी-चुनी ऊंचे पदों पर बैठी महिलाओं की प्रतिष्ठा के आधार पर नहीं किया जा सकता है ।यदि वास्तव में समाज में महिलाओं की स्थिति का मूल्यांकन करना है इसे छोटे शहरों से लेकर गॉवों और कस्बों में उनकी स्थिति के आधार पर करना होगा। ग्रामीण समाज में महिलाएं सामाजिक बेड़ियों के आधार पर मजबूत नहीं है। भले ही उन्हें गांव का सरपंच चुन लिया जाए लेकिन उनके अधिकार अब भी पुरुष ही तय करते हैं। समाज में एक ओर जहां नारियों की सोच में तेजी के साथ बदलाव आ रहा है तो दूसरी तरफ पुरुषों की मानसिकता में वह परिवर्तन नहीं दिख रहा जो नारी की सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए जरूरी है। इस संबंध में एक कवयित्री के विचार प्रासंगिक हैं-----

        नारी घर की आन है, नारी घर की शान

         नारी बिन घर, घर नहीं,नारी है वरदान।।

                  आज नारी का सफर चुनौती भरा जरूर है ,किन्तु यह भी सच्चाई है कि उसमें चुनौतियों से लड़ने का साहस जन्म ले चुका है। अपने आत्म विश्वास के बल पर आज वह पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बना रही है। हवाई-जहाज उड़ाने के साथ फाइटर विमान पर सवार होकर हमारे देश की नारी वीरता के झंडे गाड़ रही है। एक ओर जहां परिवार की गाड़ी को मजबूत पटरी पर ला खड़ी कर रही हैं वहीं हजारों की संख्या में सवार यात्रियों की ट्रेनें भी दौड़ा रही हैं। आज की नारी आर्थिक और मानसिक रूप से आत्म निर्भरता की ओर कदम बढ़ा चुकी है। परिवार तथा अपने भविष्य के बीच तालमेल का सामंजस्य बैठाती नारी का कौशल वास्तव में तारीफ-ए-काबिल है। वर्तमान समय में कठिन परिस्थितियों पर अपनी काबिलियत व साहस के बूते पर वह कामयाबी की मंजिलों को फतह कर रही है। कल तक भावनात्मक रूप से कमजोर कही जाने वाली महिलाएं अब अपनी सहनशक्ति का लोहा मनवा रही हैं। सामाजिक और आर्थिक स्तर के साथ लैंगिक स्थिति भी असुरक्षा की भावना को पैदा करती है। सामाजिक स्तर पर परित्यक्ता व विधवा जैसे शब्द उसके मार्ग का रोड़ा बनते हैं। बावजूद इसके वह अपनी प्रतिभा के बल पर मौका तलाशते हुए कामयाबी के कीर्तिमान रच रही है। अंत में चंद शब्दों के साथ सभी नारियों को महिला दिवस की शुभकामनाएं----

       "जीवन की कला को अपने हाथों से साकार कर

                नारी ने संस्कृति का रूप निखारा है,

                 नारी का अस्तित्व ही ,

                  सुंदर जीवन का आधार है ।।" 

                                   डॉ सूर्यकांत मिश्रा,

                       न्यू खंडेलवाल कॉलोनी,ममता नगर,

                         प्रिंसेस प्लैटिनम,हाउस नंबर 05 

                                राजनांदगांव(छ. ग )

आलेख 957583742482869732

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