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लघुकथा - अछूत - ज्योत्सना सिंह

(अछूत )

“सुन,मेरी सलवार में दाग़ आ गया है। मैं न घर जा रही हूँ और चार पाँच दिन मैं स्कूल नहीं आ पा आऊँगी तो तू न मुझे सारी पढ़ाई घर आ के बता जाना।”

सहेली की बात सुन नीरू हँसने लगी और फिर सहजता से सखि को जागरूक करते हुए बोली।

“यूँ स्कूल से छुट्टी ले कर एकदम क्यूँ जाना?

हम सरकारी स्कूल की छात्रायें हैं हमारे स्कूल में इन सुविधाओं के लिये समुचित व्यवस्था रहती है चल आ टीचर दीदी जी के पास चलते हैं।”

उसने ख़ुद को संकोच से समेटते हुए कहा।

“न,न सबको पता चल जायेगा सब रहते हैं आस-पास।”

वह फिर समझदारी से बोली।

“तो क्या हुआ जो किसी को पता चल जायेगा?”

वह सर नीचे कर बोली।

“माँ कहती है ये शर्म की बात है इन दिनों हम अछूत होते हैं हमें कुछ भी साफ़ सुथरा छूना नहीं चाहिये और अपने बड़ों भी दूर रहना चाहिये।”

नीरू ने आत्मविश्वास से भर उससे कहा।

“सखि, हम अछूत नहीं हैं पूज्य हैं अगर हममें यह चक्र नहीं होगा तो जीवन चक्र ही रुक जाएगा हम सृष्टि की रचना कर पाते हैं क्यूँ कि हम इस चक्र से गुज़रते हैं।

एक बात बता तो,जो भी तू यहाँ पढ़ती हैं वह क्या केवल पास होने के लिये पढ़ती है टीचर दीदी जी का पढ़ाया पाठ से सीख ले कर जीवन जीना सीख हम बदले हुए भारत की बेटियाँ हैं।”

और अब ली हुई छुट्टी की अर्ज़ी को फाड़ते हुए वह दोनों स्कूल की पहली सुरक्षा सुविधा दवा वाले कमरे में जा रहीं थी।


ज्योत्सना सिंह

गोमती नगर

लखनऊ

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