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लघुकथा - बेहतर - ज्योत्सना सिंह

बेहतर

सूनी हवेली का गर्द भरा आँगन और ठंडी पड़ी रसोई में फागुन आते ही बात चीत शुरू हो गई।

दर्द दोनों का एक ही था मगर फिर भी दोनों का अहं आड़े आ रहा था।

गर्द भरे आँगन ने अपना पुराना वक़्त बखानते हुए कहा।

“साफ़-सफ़ाई लीप-पोत के किसी दुल्हन सा रूप होता था मेरा त्यौहारों में।

गेरू और चुने से सज़ा सँवरा मैं ख़ूबसूरती के सारे आयाम पार कर लेता था।

क्या कहूँ मालिक क्या जा बसे शहर मैं तो सच में बदसूरत हो गया।”

रसोई ने ठुनकते हुए कहा।

“अरे! तुम्हारा क्या रूप होता था मेरा तो कोना-कोना केसर केवड़े और पकवानों से महर-महर महकता था ख़ुशबू का मज़ा तुम भी तो लेते थे। पूरे घर की जान होती थी मैं।

तुम तो बस लीपे-पोते जाते थे मैं तो सबके मुँह में स्वाद की गंगा बहाती थी।”

आँगन कैसे पीछे रहता आख़िर वह भी तो अपना ख़ास अस्तित्व रखता था। वह फिर बोला।

“हाँ ठीक है पर लाल गुलाबी नीले पीले रंग गुलाल तो सब मुझ पर गिर कर ही फबते थे। होली क्या होती है बहन रसोई ये मेरे ही आँचल में खिल कर आती थी।”

“और मेरे दामन में होता था भैया! खाना-खजाना गुझिया कचौरी पूरी आलू का भंडार“

कहती हुई रसोई दोहरी हुई जाती थी।

थोड़ी देर को नीम सन्नाटा सा हो गया दोनों के बीच यूँ लगा परिस्थिति बस उपजा बात व्यवहार का तारतम्य टूट गया हो।

सच तो यह था की अपने गुज़रे वक़्त की टीस दोनों की एक सी ही थी पर अहं की आवाज़ यहाँ भी बुलंद थी।

किसका वक़्त बेहतर था साबित करने को बेवजह ही दोनों बतिया रहे थे।

तभी आँगन के कोने में लगे नीम ने फ़िज़ा में शीतल हवा का झोंका दिया और बोला।

“दोस्तों! ये ख़ुद को बेहतर से और बेहतर बनाने की दौड़ ही तो है जो बहुत कुछ पीछे छूट जाता है।

अब रसोई और अँगना दोनों ही नीम की ओर मुख़ातिब हुए।

नीम ने अपनी बात आगे शुरू की।

“देखो! मालिक गाँव से ख़ुद को बेहतर ज़िंदगी देने के लिये शहर गये तो गाँव छूटा और छूट गये हम सब।

अब जब बेहतर से और बेहतर की ललक बढ़ती है तो शहर के बाद छूट जाते हैं देश और फिर छूटते हैं अपने ये रंग-बिरंगे त्यौहार।”

अब तीनों एक दूसरे को प्यार से निहारते हुए ख़ुद में ही समेट लेना चाह रहे थे बस अपनी अपनी जगह।

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ज्योत्सना सिंह

गोमती नगर

लखनऊ

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