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लघुकथा - गुलाम - चंचलिका

 

" गुलाम "

" दीदी जी , मुझे सात दिनों की छुट्टी चाहिए , गाँव जाना है बेटा बीमार है । " रामनाथ ने संकुचाते हुए कहा ।

रानु जी ने एक मौन दृष्टि डाली रामनाथ पर और धीरे धीरे अंदर अपने कमरे में दाखिल हो गईं । रामनाथ असमंजस में था आखिर दीदी जी का निर्णय क्या है ।

दस साल पहले जब गाँव में खेती की दशा दयनीय थी , पैसे के लाले पड़ रहे थे तब जमीन बेचकर नौकरी की तलाश में रामनाथ शहर आ गया था । रानु जी ने उस समय उसे अपने यहाँ नौकरी दी । उन्हें अपने काम के लिए एक विश्वसनीय नौकर की तलाश थी जो घर में एवम् उनके धनाढ्य व्यवसायी पति के काम में मदद कर सके । रानु जी के यहाँ मोटी तनख्वाह के साथ रहने खाने की सारी सुविधा थी रामनाथ को । गाँव में परिवार ख़ुशहाल जी रहा था । इन दस सालों में सिर्फ़ दो बार ही घर जाने का अवसर मिला था । रानु को उसका घर जाना गवारा न था ।

" रामनाथ , ये लो पांच हजार रुपये घर भिजवा दो , तुम्हारे बेटे के इलाज के लिए । जरुरत हो तो और भिजवा देंगे , देखना इलाज में कमी न रहे कोई और हाँ शाम को बाबू को लाने वक्त पर एयरपोर्ट जरुर पहुँच जाना । " रानु ने मुस्कुराते हुए कहा ।

रामनाथ कभी उस चेक को और कभी अपने बारह वर्षीय बेटे के चेहरे को याद करने लगा ।

---- चंचलिका .

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