370010869858007
नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

****

Loading...

नाथ गोरखपुरी की कविताएँ

01:- शिवस्तुति

भुजगेंद्रं शिवम् वीरभद्रं शिवम्
त्रिपुरारी शिवम् चन्द्रमौलि शिवम्
रूद्ररूपं शिवम् नीलकंठं शिवम्
कृपालु शिवम् दयालु शिवम्

मदनारि शिवम् शम्भुनाथं शिवम्
महेशं शिवम् नाथनाथं शिवम्
कैलाशपतियं शिवम् भूतनाथं शिवम्
उमापतियं शिवम् भोलेनाथं शिवम्

देवाधिदेवं शिवम् महादेवं शिवम्
कालकालं शिवम् महाकालं शिवम्
मगंलं हे शिवम् शुभंकरं हे शिवम्
कल्याणं शिवम् शुभशुभं हे शिवम्

02:-पड़ोसी

सुन लो मेरे प्यारे बच्चों
नापाक पड़ोसी नहीं चाहिए
समझाने से जो ना समझे
घाघ पड़ोसी नहीं चाहिए

हरदम ही जो है अकड़ता
घिर जाने पर पैर पकड़ता
शान्ति भाषा ना जो जाने
मर्यादा को ना पहीचाने

कोई उससे मेल ना राखै
वो दाग पड़ोसी नही चाहिये
नापाक पड़ोसी नही चाहिये

जो तुमसे ही मांगे खाये
पेटभरे तो आँख दिखाये
पहना हो धोखे का चोला
प्यार की बोली कभी ना बोला

जो तेरी परवाह करे ना
वो बेलाग पड़ोसी नही चाहिये
सुन लो मेरे प्यारे बच्चों
नापाक पड़ोसी नही चाहिये

03:- नारी

नारी तूने क्या कर डाला
पुरूषवाद घायल कर डाला
दहलीजों को पार कर गई
पौरूष पर युं वार कर गई

तूने भी अब सपना देखा
दुनिया में कुछ अपना देखा
क्या आंगन में दम घुटता था?
क्या दामन में कंटक चुभता था?

पुरूषवाद हावी था तुझपर
परम्परा प्रभावी था तुझपर
तेरे लिये था ताना बाना
अब जाके तुने पहचाना

चल तुझको यह समझ तो आई
पुरूषों वाली यह प्रभुताई
पर कदम से कदम मिलाकर चलना
सभ्यता से कहीं आगे ना निकलना

भारत का अभिमान तुम्ही हो
नारी पुरूषों की शान तुम्ही हो
जेहन में अपने अहं ना लाना
हृदय को हरपल ये समझाना

सत्ता सदा एक ना रहती
नदिया जैसी है ये बहती
माना तुझको चोट बहुत है
पुरूषों में ही खोट बहुत है

तो बदला लेना क्या होता है
बदल देना सब जो सोता है
सोया है संसारा बेचारा
छाया है कलुषित अंधियारा

इस अंधियारा को दूर भगाना
नारी सबको ये समझाना
नर नारी से नगर है अपना
दोनो मिलकर देखें सपना

तभी धरा यह स्वर्ग बनेगी
गली गली तब कली खिलेगी
नाथ नही कुछ आगे कहना
नारी तुं पुरूषों से मिलके रहना

04:-रावण

ना मैं तब हारा था,ना अब हारूँगा प्रिये
मौत को भी मसलके ,मार डालूँगा प्रिये
असाधारण हुये तो ,डर किस बात का
कर कमलो से खुद, को संवारूँगा प्रिये

मुझे जरा डर नही ,चाल हो काल का
झुकने दूंगा ना सिर, लंक के भाल का
संधि मैं क्युं करूँ ,कायरों की तरह
मैं रावण हूँ रावण! ,भक्त त्रिकाल का

05:- गीत

चाँद रफ्ता रफ्ता, रहबर बन गया
रौशनी जो मिली तो, शहर बन गया
उसकी आदत हुई
उसकी आहट हुई
उसकी चाहत हुई तो खब़र बन गया
चाँद रफ्ता रफ्ता रहबर बन गया

वो था मनचला
मन से ही वो चला
दिल की बस्ती में बसके
वो दिल को छला
छलिया कैसा मेरा हमसफर बन गया
चाँद रफ्ता रफ्ता रहबर बन गया

धड़कने बढ़ गयी
इक नशा छा गया,
प्रिय तुम जो मिले
रंग नया आ गया।
रंग देके मेरा रहगुजर बन गया
चाँद रफ्ता रफ्ता रहबर बन गया

वो सताने लगा
याद आने लगा
उसकी यादों में दिल तड़फड़ाने लगा
दिल का अपना वो अब इस कदर बन गया
चाँद रफ्ता रफ्ता रहबर बन गया

06:-

के प्यार मरता नही, ना ही मरेगा
जिंदा रहा है सदियों सो जिंदा रहेगा
वो जिंदा रहेगा....
तेरे यादों में ,
तेरे यादों के उस दरपन में
तेरे वादो में ,
तेरे वादों के उस उलझन में
तेरे चाहत में,
तेरे चाहत के उस उल्फत में
वो जिंदा रहेगा....
तेरे आहट में,
तेरे आहट के घबराहट में
तेरे तड़पन में,
तेरे तड़पन के उस तापों में
वो जिंदा रहेगा....
तेरे धड़कन में,
तेरे धड़कन के उस धकधक में
तेरे खुश्बू में,
तेरे खुशबू के उस आंगन में
वो जिंदा रहेगा....
तेरे बन्धन में,
तेरे बन्धन के उन पाशों में
हाँ वो जिंदा रहेगा
वो जिंदा रहेगा....
इन सांसो के एहसासो में
क्योंकि प्रेम नही मरता !
नही मरता !
नही मरता !! कभी नही मरता !!!

07:-श्लोक
समूलंपापनाशिनींचदुष्टचित् विनाशिनीं
शुभ्ररंगधारिणीं माते,नाथचित्सुहासिनीं
जगतिविपत्तिकरक्रंदनं हे!मातुतोहिवदनं

जगत्कलासंवारति सत्यसंगविहारति
पापंपुण्य विचारति हृदयंघरं निवासतिं
देतीयशोबलंधनम् हे! मातुतोहिवदनं

08:- नदी लोकगीत

आवा मिलि नदिया बचावल जाय हो
अरे बचावल जाय हो
ना त तलवा सुखईहें

लोगवा के चलिं अब जगावल जाय हो
अरे जगावल जाय हो
ना देर होई जईंहे

सुख$तिया नदिया, सुखाता पोखरवा
शहरी कचरवा से नहाता पोखरवा

पोखरा में गंदगिया ना बहावल जाय हो
ना बहावल जाय हो
ना तअ ताल मुरूझईंहें
आवा मिलि--------------

09:- नदिया चौपाई

नदि बिन कइसन होइ संसारा
तनिका एही पर करि विचारा
मानुष जीव जन्तु जल चाहा
जल बिन सब हो जइहें स्वाहा

नदि से ताल ताल से तलईया
पै नदि कै कोउ ना रखवईया
जहुँ नदि नाहिं बचावल जाई
सगरो ताल ह जईंहों सुखाई

जल से जगत जगत से लोगा
जल जीव बिच गजब संजोगा
पै जल खाति सोचै नहि कोऊ
आगै पीढ़ी बैठि जल रोऊ

सबकै सब बन गइलें शहरी
जलकै कोउ बने ना प्रहरी
नाहि करें नदि कै कोउ रक्षा
बात करै सब अच्छा अच्छा

पीढ़ी पढि रहल पोखरवा
जबसे गउआं बनल शहरवा
सगरी पोखरा गइलें पटाई
बागि बगईचा गइलें कटाई

जल जीवन जग मा सब माना
ताअब नद लइ जग, जग जाना
सबहिं मिलहिं करहिं बिचारा
तबहिं बचहिं नदहिं संसारा

"नाथ" सकल लोगा जब चाहा
नदजल संचै मिलहिं तब राहा
जल जग मा तब सब उजियारा
नातै दिनै लागि अंधियारा

हाथ जोरि नाथ नदि चाहा
जल राखै ढूंढीं सब राहा
दुनिया तबै दिखै हरियाली
जल जग मा रही खुशिहाली

10:-गीत

नाहक नशे में नशाए गयो रे
जुल्मी जमाना जलाए गयो रे
अरे अरे सुन रे सजन
मोहे लागी लगन
कब होगा मिलन ओ सुन रे सजन

तूने पहली नजर, डाली मोह पर
अब तो देख सब को, लागे है खबर

तेरी तिरछी नजरिया फंसाए गयो रे
मोहे मिलन की आस जगाय गयो रे
बढ़ती जाय रे तपन
अरे अरे सुन रे सजन
मोहे है लागी लगन
कब होगा मिलन ओ सुन रे सजन

मेरा तो कुछ भी नही,तेरा शहर शहर
पांवपथ भी है नही,तेरा हर इक डगर

'नाथ'अपने डगर पर चलाय गयो रे
सपनो में सपना दिखाय गयो रे
तेरा हुआ मेरा तनमन
अरे अरे सुन रे सजन
मोहे है लागी लगन, ओ सुन रे सजन

- नाथ गोरखपुरी 

कविता 5780641531959864831

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

emo-but-icon

मुख्यपृष्ठ item

कुछ और दिलचस्प रचनाएँ

फ़ेसबुक में पसंद करें

---प्रायोजक---

---***---

ब्लॉग आर्काइव