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व्यंग्य ---- तू मैके मत जइयो ..... विजय शंकर विकुज

             क्यूं भाइयों, आपलोगों की पत्नी बीच-बीच में मायके जाती है या नहीं ? मेरी तो जाती है। जाहिर है कि आप सभी की भी जाती होगी। वैसे सच कहा जाये तो किसी की भी पत्नी का बीच-बीच में मायके जाना कोई आश्चर्य की बात, अन्याय या पाप नहीं है। और जाती भी है तो आप पुलिस या कोर्ट में उसके मायके जाने पर कोई शिकायत या मामला नहीं कर सकते। उन्हें तो मायके जाने देना ही होगा। इसी में आपकी या कहें तो हम सब की भलाई है।  

            वैसे कुछ लोग तो यही चाहते हैं कि उनकी पत्नी हमेशा ही अपने मायके में रहे और वे मजे से यह गाते हुए दिन गुजारें कि मेरी बीवी मैके चली गयी.... बादल, पतंगा, आवारा बन गया हूं.. लोगों में फिर से कंवारा बन गया हूं..... मेरी बीवी मैके चली गयी....। इस दौरान वे घर में दोस्तों का अड्डा जमायें या फिर जाम-ए-महफिल या शाम-ए-महफिल का इंतजाम करें। मगर यह खुशी तब फुर्र हो जाती है जब बीवी मायके से वापस लौट कर आती है।

           बहरहाल पत्नी जब अपने मायके से गाहे-बगाहे लौटकर आती है तो उसे पता चलता है कि उसके नहीं रहने पर उसके पति ने क्या गुल खुलाये हैं। चारों तरफ सिगरेट के टोंटे पड़े रहते हैं और यह भी पता चल जाता है कि इधर कई दिनों तक जाम भी छलके होंगे। बस, बीवी अपने मायके जाने पर अपने आपको कोसने लगती है। उसे यह साफ महसूस होता है कि उसने अपने मायके जाकर अपने ही ऊपर कितना अन्याय किया है, कितनी बड़ी भूल की है।

           यहां मैं अपना नाम नहीं लूंगा लेकिन गोपाल भाई की कहानी संक्षेप में जरूर कहूंगा। उनकी पत्नी जब भी अपने मायके से लौटकर आती है तो घर को बेतरतीब ढंग से बिखरा हुआ पाती है। ऐसे में जब वह गोपाल भाई से पूछती है कि घर की यह हालत क्यूं है तो वे अगल-बगल झांकते हुए कहते हैं कि चीजें ठीक से रखी मिलती नहीं हैं तो बड़ी परेशानी होती है।

            उनकी पत्नी अर्थात भाभीजी कहती हैं कि सब कुछ तो समझाकर जाती हूं, फिर परेशानी क्या होती है। गोपाल भाई कहते हैं कि चीनी खोजता हूं तो नमक मिलता है। साबुन खोजता हूं अंडा मिलता है, ये-वो, कोई भी सामान खोजते-खोजते ऑफिस का टाइम हो जाता है और बगैर खाना-पीये घर से निकलना पड़ता है। भाभीजी चट से कहती हैं, आपलोग भी बड़े अजीब होते हैं। अरे, वह जो डालडा का डिब्बा है, जिस पर दाल लिखा हुआ है, उसी में तो चीनी है। और साबुन, किताबों वाली आलमारी में किताबों के पीछे रखती हूं। इतना भी नहीं कर सकते। हर बार समझाकर जाती हूं और आप भूल जाते हैं। गोपाल भाई अपनी पत्नी के फार्मूले पर चुप रह जाते हैं कि भागवान तुम ही सही हो। बस, मैके मत जइयो...।

            वैसे तो गोपाल भाई अपने तौर-तरकीब को लेकर बड़ी-बड़ी डींगें हांकते हैं लेकिन जब पत्नी कभी-कभार अपने मायके जाती है तो घर में अकेले यही गाना गाते हुए पाते हैं कि राम दुलारी मायके गयी...। जाहिर है आगे कुछ कहने की जरूरत नहीं है। आप समझ ही गये होंगे कि गोपाल भाई की क्या हालत होती होगी। अब उस बेचारे की दुर्गति पर चर्चा न करके बात को किसी दूसरी जगह ले चलते हैं। हमारे दिनेश भाई या रवि भाई की बात करें या पड़ोस के दया शंकर, मनोज, प्रदीप, सतीश या सुरेन्द्र की या अपने कार्यालय के कलाम, गोविन्द या इम्तियाज की। हर किसी का यही रोना है कि जब उनकी पत्नी कुछ रोज के लिए अपने मायके जाती है तो तरह-तरह की परेशानियां और टेंशन उनके लिए घर में छोड़कर जाती हैं। वैसे पत्नियों का मायके जाना उनके लिए कोई बड़ी बात हो या नहीं लेकिन अधिकतर पुरुषों के लिए बहुत बड़ी बात होती है जैसा कि मेरे लिए है।

            मेरी पत्नी अभी मायके गई हुई है भैया दूज में। चार दिनों के लिए कहकर गई है और अब चौदह दिन हो गये यानि कि पूरे दो सप्ताह। आज सुबह फोन किया था तो कहा कि दो दिन बाद आ जाऊंगी, मां की तबियत खराब है, भैया कह रहे हैं कि और दो दिन रुक जाओ। मैंने भी कह दिया कि निश्चिंत होकर आओ। चिन्ता करने की कोई बात नहीं है। कम से कम और कई दिन तो शांति से गुजरें। अब उनके न रहने पर खाना बनाने, घर की सफाई करने से लेकर पता नहीं कितनी तरह की परेशानी झेलनी पड़ती है, बस यही खलता है। 

            शायद इसी को कहते हैं जो दिल्ली का लड्डू खाये वह पछताये और जो न खाये, वह भी पछताये। लेकिन अब तो यही कहना होगा कि अब पछताये होत क्या जब बीवी पड़ गई पल्ले। शादी होने के बाद आदत जो खराब हो गयी सो आज आटे-चावल चावल का भाव पता चल गया है। इस दर्द को अब यही कहकर बयान करना होगा कि तू मैके मत जइयो ..... ।

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विजय शंकर विकुज

द्वारा - देवाशीष चटर्जी

ईस्माइल (पश्चिम), आर. के. राय रोड

बरफकल, कोड़ा पाड़ा हनुमान मंदिर के निकट

आसनसोल - 713301


ई-मेल - bbikuj@gmail.com

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