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एक्वेरियम तथा अन्य कहानियाँ” कहानी-संग्रह की समीक्षा - समीक्षक—डॉ मनोज मोक्षेन्द्र

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(पुस्तक-समीक्षा) *पुस्तक का शीर्षक—एक्वेरियम तथा अन्य कहानियाँ (कहानी-संग्रह) *प्रथम संस्करण (2019) *कॉपीराइट--लेखक * ISBN NO.—978-93-85325-...

(पुस्तक-समीक्षा)

*पुस्तक का शीर्षक—एक्वेरियम तथा अन्य कहानियाँ (कहानी-संग्रह)

*प्रथम संस्करण (2019)

*कॉपीराइट--लेखक

*ISBN NO.—978-93-85325-21-2

*लेखक—महेन्द्र सिंह

*प्रकाशक—राज पब्लिशिंग हाउस, पुराना सीलम पुर (पूर्व), दिल्ली—110031

*कुल पृष्ठ संख्या—138

*पुस्तक का मूल्य—450/-रुपए

*कहानीकार का संपर्क-सूत्र—फ्लैट नं ए-8, राज्य सभा आवास, आई एन ए कॉलोनी,

नई दिल्ली-1100 23;

ई-मेल 226mahenku1969@gmail.com

*समीक्षकडॉ मनोज मोक्षेन्द्र

(“एक्वेरियम तथा अन्य कहानियाँ” कहानी-संग्रह की समीक्षा)

गेय गीतों की भाँति कहानियाँ

समीक्षक—डॉ मनोज मोक्षेन्द्र

कथाकार महेंद्र सिंह की कहानियों में सजीले अहसासों का एक चौरस दालान है जिसमें से दाख़िल होकर जब हम अंदर झाँकते हैं तो पता चलता है कि वहाँ एक ऐसा संसार है जिसके पात्रों से बातें करते हुए हम उनके साथ होने वाली घटनाओं के एक अरसे से प्रत्यक्षदर्शी रह चुके हैं। महेंद्र जितनी सतर्कता के साथ अपने सामाजिक परिवेश के प्रति संवेदनशील हैं, उससे हम जैसे पाठकों को यह अनुभव होने लगता है कि हमें भी उनके द्वारा रचे गए संसार को गहनता और सूक्ष्मता से देखने की आवश्यकता है। नहीं तो, उनकी कहानियों के साथ बड़ा अन्याय होगा। महेंद्र जैसे कथाकार के पाठकों को भी उन्हीं की तरह सूक्ष्मदर्शी बनना पड़ेगा। घटनाओं और पात्रों के प्रस्तुतीकरण एवं उनके पीछे परिवेश की संरचना के निहिताशय को अच्छी तरह भाँपकर ही उनके कथानक का छिद्रान्वेषण किया जा सकता है जो पाठक के लिए आनन्द का स्रोत होगा और तभी उनकी कहानी की सार्थकता से आनंदित भी हुआ जा सकता है।

महेंद्र ने कोई नाटक भले ही न लिखा हो लेकिन उनकी कहानियों में जिस नाटकीयता से कथोपकथन का अग्रेतर विकास होता है, वह न केवल उनके कलात्मक पक्ष का एक महत्वपूर्ण अंग है बल्कि इससे उनकी कहानियों में पाठकीय जिज्ञासा की सुनामी लहरें हिलोरें लेने लगती हैं। कथ्य और शिल्प पर उनकी पैनी नज़र होती है; क्या मज़ाल कि उनकी किसी कहानी की कोई पंक्ति हटाए जाने पर भी उक्त कहानी पूर्ण और सार्थक लगे। यदि ऐसा किया जाए तो उनकी वह कहानी पूर्णरूपेण खंडित नज़र आएगी। अस्तु, वह भाषा और भाव को अनुभव के तराज़ू पर तौलकर दोनों का हिसाब बराबर रखते हैं। पात्रों के मनोविज्ञान को अपने अनुभव की प्रयोगशाला में विश्लेषण करते हैं, उसे तब तक निखारते हैं जब तक कि वह पूरी तरह वह सुघड़ और सुगठित न हो जाए।

काफ़ी इंतज़ार के बाद आए उनके कहानी-संग्रह “एक्वेरियम तथा अन्य कहानियाँ” में जो कहानियाँ हैं, वे ज़िंदग़ी के अलग-अलग पहलुओं को व्याख्यायित करती हैं। इन कहानियों के अनुशीलन से यह साफ हो जाता है कि एकांगिकता या दूसरे शब्दों में एक ही थीम पर कथानक बुनना उनकी रचनाधर्मिता में शुमार नहीं होता। जीवन और समाज की सभी दिशाओं में अपनी जिज्ञासा के घोड़े दौड़ाना उनका स्वभाव है। वह स्वयं कहते हैं कि ‘मुझे तो हर ओर कहानियाँ घूमती-फिरती नज़र आती हैं।’ इस संबंध में मुझे पदुमलाल पन्नालाल बख्शी का एक कथन याद आता है कि लेखक के लिए लिखने के विषयों की कमी नहीं है। बस, जिस जमीन पर वह अपनी सृजनात्मकता के बीज बोना चाहता है, उसके लिए उसे समुचित औजारों की ज़रूरत होती है तथा वे औजार हैं—भाषा, विचार-भाव एवं शिल्प। सृजन-संसार में अग्रसर होते हुए उनमें भावना, कर्म और जीवनानुभव (ज्ञान) तीनों का संश्लिष्ट मिश्रण है। कथानक की चादर को बुनने से पहले वह अपने ही जीवन के विस्तार पर पूर्वापेक्षी दृष्टि डालकर जिन एहसासों से उसे सौष्ठवपूर्ण बनाने की क़वायद करते हैं, वह साहित्य के पिपासुओं के लिए अत्यंत लोमहर्षक और मार्मिक होता है। हाँ, बेहद दिलचस्प भी होता है।

मैं संग्रह की ‘कहानी क और कहानी ख’ को सभी पाठकों को पढ़ने का मशविरा देता हूँ। अवश्य पढ़ें और अपने ज़ेहन में इसे अपने-आप कौंधने दें। हाँ, यह कौंधती रहेगी--बरसों-बरसों तक। एक सफल रचना की भी यही कसौटी होती है। मैं अपनी पूरी शख़्सियत से पुरआवाज़ में यह अवश्य घोषित करूंगा कि यह एक विशिष्ट कहानी है। इस कहानी के दो भागों में कथानक के अतिरिक्त इसके प्रस्तुतीकरण में एक तरफ़ चुंबकीय नाटकीयता का संपुट है तो दूसरी तरफ़ आत्म-प्रवंचना के जंजल से मुक्त जिस विशिष्ट शैली में यह कहानी साकार रूप लेती है, वह इस लिए भी आवश्यक है क्योंकि कथाकार को जो सामने दिखाई दे रहा है, उसे तो उसने वर्णित कर ही दिया; उसके दूसरी ओर के अनदेखे को भी उसने बिल्कुल पारदर्शी बना दिया। कोई लेखक यहीं चूक कर देता है; वह सिक्के के किसी एक ही पहलू का सच बयाँ कर पाता है; लेकिन, महेंद्र ने बड़ी अचूकता से वस्तुस्थिति के चित और पट को चित्रित किया है; दृश्यमान जीवन के अदृश्य नेपथ्य में झाँकने का सफल प्रयास किया है।

बड़ी तन्मयता से सृजनरत महेंद्र सिंह जैसा कोई लेखक जीवन के लिए संघर्षों को प्रतीकात्मक रूप में रूपायित करने का दमखम रख पाता है। ऐसा हम उनकी महत्वपूर्ण कहानी “एक्वेरियम” में पाते हैं जहाँ जीवन के संघर्ष को एक्वेरियम में मुक्ति के लिए छटपटाती मछली के माध्यम से बिंबित किया गया है। यह एक दिलचस्प कहानी तो है ही; लेकिन, मैं कहूंगा कि यह कहानी कम, ‘रूपक’ अधिक है जिसमें एक विशिष्ट भाषा-शैली के साथ-साथ व्यंग्यात्मक विवेचना का प्रयोग भी किया गया है जिससे उनकी अभिव्यंजकता अत्यधिक प्रभावशाली बन पाई है। नकारात्मकता के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने की लेखकीय परंपरा का निर्वाह करते हुए महेंद्र की सकारात्मक तत्वों को परिवार और समाज में रोपित करने की प्रवृत्ति रेखांकित की जाएगी। समाज की अति महत्वपूर्ण इकाई परिवार के विघटन पर घड़ों आँसू बहाने की सायास कोशिश कथाकार अपनी कहानी “पॉलीथीन की थैली” में करता है जिसमें मानवीय स्तर पर पारिवारिक द्वंद्वों को रूपायित किया गया है और सकारात्मक प्रवृत्तियों के दीर्घजीवी होने की कामना की गई है। अगली कहानी “दांव” में मानव-मन में पालित-पोषित हो रहे ज़हरीले सपोले की मनःस्थितियों का आमूलचूल निरीक्षण किया गया है। इस कहानी में महेंद्र दूभर हो चुकी सामाजिक समरसता की पुनर्स्थापना का संकल्प बार-बार लेते हुए प्रतीत होते हैं।

महेंद्र सिंह ऐसे कथाकार हैं जिनके लिए जीवन एक ठोस पिंड की भाँति है; वह उसके सभी फलकों को घुमा-घुमा कर देखते-भालते तो हैं ही, उसके भीतरी भाग का भी जमकर मुआयना करते हैं। अपनी चरित्र-प्रधान कहानी “जाननिसारी” में जीवन की चौरस जमीन पर एक पात्र को उसकी वर्जित-स्वीकृत आपाधापियों के साथ सांगोपांग वर्णन करने में महेंद्र का कहानीकार निखर कर सामने आता है। कथा विधा के रसिया पाठक और आलोचक भी कथाकार की बाल की खाल निकालने की ऐसी आदत को पसंद करते हैं। इससे पाठक को तो अत्यंत सुखानुभूति होती ही है, कहानीकार को भी एहसास होता है कि उसमें अच्छी कहानियाँ लिखने का माद्दा है। अपने इसी स्वभाव के कारण जब महेंद्र घटनाओं और पात्रों के बारे में विवेचन करते हुए अपने विशिष्ट समय की तह तक जाकर विवरण देते हैं तो पूरा प्रसंग पाठक के लिए सुरुचिपूर्ण और सुग्राह्य बन जाता है। संग्रह की उल्लेखनीय कहानी “भोर का तारा” में वह बाल मनोविज्ञान पर विशेषज्ञतापूर्वक विश्लेषण करते हैं। इसी कहानी में वह अनछुए मनोवैज्ञानिक गुत्थियों को जानबूझ कर सुलझाने के उधेड़बुन में कुछ ऐसी बातें उद्घाटित कर जाते हैं कि सारा प्रसंग पाठक को आश्चर्य-सागर में निमग्न कर देता है। पाठक को ऐसा लगने लगता है कि जैसे लेखक अपने बचपन के बारे में बातें न करके, स्वयं उसके बारे में बातें कर रहा है; लेखक का जीया हुआ अनुभव ख़ुद पाठक का अनुभव लगता है।

कहानी-संग्रह “एक्वेरियम तथा अन्य कहानियाँ” महेंद्र सिंह को उनके दौर के एक ख़ास कथाकार के रूप में स्थापित करता है। हिंदी साहित्य की शीर्ष पत्र-पत्रिकाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा चुके महेंद्र अपने कथानकों का ताना-बाना बुनते समय अपने पात्रों को जीने, अपने समय की घटनाओं के बीच होने, देशकाल के प्रति ज़वाबदेह होने और लोकजीवन की छवियों को आत्मसात करने की सायास कोशिश करते हैं। बेशक, उनकी कहानियाँ गेय गीतों की भाँति हमें आत्मविभोर करने की क्षमता रखती हैं। पाठक उनकी कहानियाँ आरंभ करके बेअटक और एक सांस में उन्हें समाप्त किए बग़ैर ख़ुद को संतुष्ट नहीं कर सकता।

मेरा कहानी के पिपासु पाठकों से आग्रह है कि वे इस संग्रह की कहानियाँ अवश्य पढ़ें और तदुपरांत मुझे धन्यवाद दें क्योंकि मैंने ही उन्हें ऐसा करने के लिए अनुरोध किया है।

(समाप्त)

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जीवन-चरित

लेखकीय नाम: डॉ. मनोज मोक्षेंद्र {वर्ष 2014 (अक्तूबर) से इस नाम से लिख रहा हूँ। इसके पूर्व 'डॉ. मनोज श्रीवास्तव' के नाम से लेखन}

वास्तविक नाम (जो अभिलेखों में है) : डॉ. मनोज श्रीवास्तव

पिता: (स्वर्गीय) श्री एल.पी. श्रीवास्तव,

माता: (स्वर्गीया) श्रीमती विद्या श्रीवास्तव

जन्म-स्थान: वाराणसी, (उ.प्र.)

शिक्षा: जौनपुर, बलिया और वाराणसी से (कतिपय अपरिहार्य कारणों से प्रारम्भिक शिक्षा से वंचित रहे) १) मिडिल हाई स्कूल--जौनपुर से २) हाई स्कूल, इंटर मीडिएट और स्नातक बलिया से ३) स्नातकोत्तर और पीएच.डी. (अंग्रेज़ी साहित्य में) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से; अनुवाद में डिप्लोमा केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो से

पीएच.डी. का विषय: यूजीन ओ' नील्स प्लेज़: अ स्टडी इन दि ओरिएंटल स्ट्रेन

लिखी गईं पुस्तकें: 1-पगडंडियां (काव्य संग्रह), वर्ष 2000, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 2-अक़्ल का फलसफा (व्यंग्य संग्रह), वर्ष 2004, साहित्य प्रकाशन, दिल्ली; 3-अपूर्णा, श्री सुरेंद्र अरोड़ा के संपादन में कहानी का संकलन, 2005; 4- युगकथा, श्री कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित संग्रह में कहानी का संकलन, 2006; चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह), विद्याश्री पब्लिकेशंस, वाराणसी, वर्ष 2010, न.दि., (हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा चुनी गई श्रेष्ठ पाण्डुलिपि); 4-धर्मचक्र राजचक्र, (कहानी संग्रह), वर्ष 2008, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 5-पगली का इंक़लाब (कहानी संग्रह), वर्ष 2009, पाण्डुलिपि प्रकाशन, न.दि.; 6.एकांत में भीड़ से मुठभेड़ (काव्य संग्रह--प्रतिलिपि कॉम), 2014; 7-प्रेमदंश, (कहानी संग्रह), वर्ष 2016, नमन प्रकाशन, न.दि. ; 8. अदमहा (नाटकों का संग्रह) ऑनलाइन गाथा, 2014; 9--मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में राजभाषा (राजभाषा हिंदी पर केंद्रित), शीघ्र प्रकाश्य; 10.-दूसरे अंग्रेज़ (उपन्यास); 11. संतगिरी (कहानी संग्रह), अनीता प्रकाशन, ग़ाज़ियाबाद, 2017; चार पीढ़ियों की यात्रा-उस दौर से इस दौर तक (उपन्यास) पूनम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, 2018; 12. महापुरुषों का बचपन (बाल नाटिकाओं का संग्रह) पूनम प्रकाशन द्वारा प्रकाशित, 2018; चलो, रेत निचोड़ी जाए, नमन प्रकाशन, 2018 (साझा काव्य संग्रह) आदि

संपादन: महेंद्रभटनागर की कविता: अन्तर्वस्तु और अभिव्यक्ति”

संपादन: “चलो, रेत निचोड़ी जाए” (साझा काव्य संग्रह)

--अंग्रेज़ी नाटक The Ripples of Ganga, ऑनलाइन गाथा, लखनऊ द्वारा प्रकाशित

--Poetry Along the Footpath अंग्रेज़ी कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य

--इन्टरनेट पर 'कविता कोश' में कविताओं और 'गद्य कोश' में कहानियों का प्रकाशन

--वेब पत्रिकाओं में प्रचुरता से प्रकाशित

--महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्याल, वर्धा, गुजरात की वेबसाइट 'हिंदी समय' में रचनाओं का संकलन

--सम्मान--'भगवतप्रसाद कथा सम्मान--2002' (प्रथम स्थान); 'रंग-अभियान रजत जयंती सम्मान--2012'; ब्लिज़ द्वारा कई बार 'बेस्ट पोएट आफ़ दि वीक' घोषित; 'गगन स्वर' संस्था द्वारा 'ऋतुराज सम्मान-2014' राजभाषा संस्थान सम्मान; कर्नाटक हिंदी संस्था, बेलगाम-कर्णाटक द्वारा 'साहित्य-भूषण सम्मान'; भारतीय वांग्मय पीठ, कोलकाता द्वारा ‘साहित्यशिरोमणि सारस्वत सम्मान’ (मानद उपाधि); प्रतिलिपि कथा सम्मान-2017 (समीक्षकों की पसंद); प्रेरणा दर्पण संस्था द्वारा ‘साहित्य-रत्न सम्मान’ आदि

"नूतन प्रतिबिंब", राज्य सभा (भारतीय संसद) की पत्रिका के पूर्व संपादक

"वी विटनेस" (वाराणसी) के विशेष परामर्शक, समूह संपादक और दिग्दर्शक

'मृगमरीचिका' नामक लघुकथा पर केंद्रित पत्रिका के सहायक संपादक

हिंदी चेतना, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, कथाक्रम, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा, व्यंग्य यात्रा, उत्तर प्रदेश, आजकल, साहित्य अमृत, हिमप्रस्थ, लमही, विपाशा, गगनांचल, शोध दिशा, दि इंडियन लिटरेचर, अभिव्यंजना, मुहिम, कथा संसार, कुरुक्षेत्र, नंदन, बाल हंस, समाज कल्याण, दि इंडियन होराइजन्स, साप्ताहिक पॉयनियर, सहित्य समीक्षा, सरिता, मुक्ता, रचना संवाद, डेमोक्रेटिक वर्ल्ड, वी-विटनेस, जाह्नवी, जागृति, रंग अभियान, सहकार संचय, मृग मरीचिका, प्राइमरी शिक्षक, साहित्य जनमंच, अनुभूति-अभिव्यक्ति, अपनी माटी, सृजनगाथा, शब्द व्यंजना, अम्स्टेल-गंगा, इ-कल्पना, अनहदकृति, ब्लिज़, राष्ट्रीय सहारा, आज, जनसत्ता, अमर उजाला, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, दैनिक भास्कर, कुबेर टाइम्स आदि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं, वेब-पत्रिकाओं आदि में प्रचुरता से प्रकाशित

आवासीय पता:--सी-66, विद्या विहार, नई पंचवटी, जी.टी. रोड, (पवन सिनेमा के सामने), जिला: गाज़ियाबाद, उ०प्र०, भारत. सम्प्रति: भारतीय संसद में संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत


इ-मेल पता: drmanojs5@gmail.com

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रचनाकार: एक्वेरियम तथा अन्य कहानियाँ” कहानी-संग्रह की समीक्षा - समीक्षक—डॉ मनोज मोक्षेन्द्र
एक्वेरियम तथा अन्य कहानियाँ” कहानी-संग्रह की समीक्षा - समीक्षक—डॉ मनोज मोक्षेन्द्र
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