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*आधी दुनियां के पूरे होते सपने* सुदर्शन सिंह

वर्ष 1975 को अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के रूप में मनाया गया था लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने प्रत्येक वर्ष 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाना शुरू किया। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की महत्ता महिलाओं विशेषकर हमारे समाज की पिछड़ी, वंचित महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने और समाज में अपना उचित स्थान प्राप्त करने के लिए उन्हें सशक्त बनाने की हमारी पुनःपुष्टि में निहित है। सृष्टि के विकास क्रम में शिव व् शक्ति की अवधारणा एक मान्य तथ्य है न शिवेन बिना देवी न देव्या च बिनाशिवा:।

मनुस्मृति में भी कहा गया है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता:। स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने भी कहा है कि "राष्ट्र, समाज, प्रशासन व् परिवार के क्रियाकलाप तब तक उचित ढंग से नहीं किये जा सकते जब तक स्त्रियों को शिक्षा न मिलती"।

श्री मती हंसा मेहता समिति का कथन है कि"यदि नये समाज का निर्माण ठोस आधार पर करना है तो स्त्रियों को वास्तविक व् प्रभावपूर्ण ढंग से पुरुषों के समान अवसर देने होंगे"। कुछ पारम्परिक, धार्मिक व् सांस्कृतिक मान्यताएं समाज को प्रगतिशील व् नवीन भविष्य देखने में अवरोध पैदा करते है उन्हीं में से एक है स्त्री-पुरुष विभेद।

हमारे समाज में लड़कियों की शिक्षा पर आज भी उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितना लड़कों की शिक्षा पर, लड़के को जहाँ कुलदीपक परिवार की प्रतिष्ठा का प्रतीक समझा जाता है वहीं लड़की को पराया धन व् दहेज आदि कारणों से अभिशाप समझा जाता है। परन्तु स्वतन्त्रता के उपरांत स्त्रियों की शिक्षा व् दशा पर ध्यान देते हुए माध्यमिक शिक्षा आयोग 1952-53, राष्ट्रीय महिला शिक्षा समिति 1958, हंसा मेहता समिति 1962, भक्तवत्सलम समिति 1963, कोठारी आयोग 1964-66, राष्ट्रीय स्त्री शिक्षा समिति 1970, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986, राममूर्ति समिति 1990 आदि ने तमाम महत्वपूर्ण सुझाव दिए व् सफल प्रयास किये और सभी ने माना कि राष्ट्र तभी सशक्त बन सकता है जब उसका हर नागरिक सशक्त हो।

इसमें कोई दो राय नहीं कि स्वतंत्रता के बाद से ही महिलाओं का विकास हमारी आयोजना का केन्द्रीय विषय रहा है।1970 के दशक में जहाँ कल्याण की अवधारणा अपनाई गयी वही 1980 के दशक में महिला सशक्तिकरण पर बल दिया गया और 21 मार्च 2001 को महिला सशक्तिकरण नीति को मंजूरी प्रदान कर ये साबित किया गया कि आधी दुनियां को अब पूरा सम्मान व् उनका हक मिलना ही चाहिए। देखा जाये तो भारत के लोगों की सोच अब बदल रही है उनका नजरिया बेटियों और उनकी देखभाल, पालन-पोषण के प्रति नवीन हो रही है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार भारत की 79 प्रतिशत महिलाएँ और 78 प्रतिशत पुरुष अब सन्तान के रूप में बेटी की कामना करते है बेटी की यह चाहत ग्रामीण इलाके की महिलाओं में 81 प्रतिशत है जबकि शहरी महिलाओं में यह आँकड़ा 75 प्रतिशत है लोग अब बेटियों को पढ़ाने व् कमाने के पक्षधर बन रहे है यही कारण रहा की जनगणना 2011 में महिलाओं की साक्षरता दर 65 प्रतिशत रही। आगे चलकर महिलाओं में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा में सकारात्मक जागरूकता व् रुझान बढ़ा जिसको सरकार द्वारा नजर अंदाज न करते हुए देश में केवल महिलाओं को उच्च शिक्षा देने के लिए 4219 कालेज व् विश्वविद्यालय खोली गई जिसमें 843 संस्थान के साथ उत्तर प्रदेश पहले स्थान पर है जबकि 684 संस्थानों के साथ राजस्थान दूसरे व् 383 संस्थानों के साथ तमिलानाडु तीसरे स्थान पर है। वर्तमान में स्त्रियों की स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है।

भारतीय स्त्रियां प्रगति की दौड़ में अन्य देशों से आगे निकल रही है और विधि, अकादमिक, साहित्य, संगीत, नृत्य, खेल, राजनीति, मीडिया, उद्योग व् आईटी सहित विभिन्न क्षेत्रों में प्रभावशाली भूमिका का निर्वहन कर रही है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर भारतीय महिलाओं की कामयाबियों की अपनी अनोखी गाथा है।

जहाँ हम भारत की प्रथम सफल महिलाओं के रूप में प्रथम महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, प्रथम मिस यूनिवर्स सुस्मिता सेन, प्रथम विश्वसुन्दरी रीता फारिया, प्रथम महिला पायलट सुषमा, प्रथम महिला चिकित्सक कादम्बिनी गांगुली, प्रथम अंतर्राष्ट्रीय महिला क्रिकेट में 100 विकेट लेने वाली डायना इदुल , प्रथम महिला अधिवक्ता रेगिनां गुहा, प्रथम महिला आई पी एस किरण वेदी, प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता मदर टेरेसा, प्रथम महिला भारत रत्न इंदिरा गांधी, प्रथम महिला सांसद राधाबाई सुबरायण, प्रथम दलित मुख्यमंत्री मायावती आदि का नाम लेते हैं. वहीं वर्तमान में भी यदि हम सिर्फ फर्स्ट लेडी 2018 की सफलता की बात करे तो इनमें देवजानी घोष 30 सालों में नासकाम की महिला अध्यक्ष, जमीदा बीवी भारतीय मुस्लिम महिला जिन्होंने जुमे के नमाज का नेतृत्व किया, इंदु मलहोत्रा महिला वकील जो सुप्रीम कोर्ट की जज बनी, मिताली राज टी-20में 2000 रन बनाए, पी0वी0सिन्धु ने वी डब्ल्यू एफ वर्ल्ड टूर में गोल्ड जीता, तानिया सान्याल पहली महिला फायर फाइटर, हिमादास ट्रैक इवेंट में गोल्ड जितने वाली भारतीय एथेलीट, अवनी चतुर्वेदी अकेले लड़ाकू विमान उड़ाने वाली महिला पायलट और मैरी कॉम 6 वर्ल्ड चैम्पियन में गोल्ड जितने वाली महिला बॉक्सर आदि का नाम अभिप्रेरणा स्वरूप आता है, जिनके कारनामे संसार की महिलाओं में एक नये ऊर्जा का संचार कर रही है और उनमें एक नवीन दृष्टिकोण विकसित कर रही है।

आज जहाँ महिलाओं को जागरूक करने व् उन्हें आगे बढ़ने के लिए इतना कुछ हो रहा है वही उसमें अभी बहुत कुछ करना बाकी है क्योंकि अभी भी समाज में महिलाओं को लेकर तस्वीर अच्छी नहीं है। एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट 2018  के अनुसार आयुवर्ग 7-10 की 2.8 प्रतिशत, आयुवर्ग 11-14 की 7.4 प्रतिशत व् आयुवर्ग 15-16 की 22.2 प्रतिशत लड़कियां आज भी विद्यालय नहीं जा रही है जो एक संवेदनशील व् चिंतनीय मुद्दा है जिन पर नये सिरे से मंथन किये जाने की आवश्यकता है।

आज महिलाओं से सम्बंधित मुद्दों और सरोकारों पर अत्यधिक संवेदनशील होने और परिपक्वता दिखाने की अतिआवश्यकता है। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर यह दोहराना महत्वपूर्ण है कि हमारे देश में प्रत्येक लड़की व् महिला को आश्वासन दिया जाये की परिवार व् सरकार उसे एक ऐसा अनुकूल वातावरण जुटाने के लिए प्रतिबद्ध हो जो उसे समान अवसर देता है उसमें आत्म विश्वास की भावना होनी चाहिए की वो अपने चुने हुए किसी भी क्षेत्र में उच्चतम अभिलाषा को पूर्ण कर सकती है।

सरकार द्वारा संचालित बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, मेरी बेटी मेरा अभिमान, वर्किंग वुमन हॉस्टल, नारी शक्ति पुरस्कार, स्वाधार गृह, महिला शक्ति केन्द्र योजना, महिला ई हॉट, उज्ज्वला योजना आदि कई महत्वपूर्ण योजनाएं महिला उत्थान, सम्मान व् प्रोत्साहन के लिए अमृत का ही कार्य कर रही है बस जरूरत है कि स्वयं जगे व् दूसरों को जगाये और सशक्त समाज बनाने में एक दूसरे के सहयोगी बनें। सच्चे अर्थों में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनायें इसी में निहित है।

लेखक-

सुदर्शन सिंह

असिस्टेन्ट प्रोफेसर-शिक्षाशास्त्र विभाग

डी0एस0एन0पी0जी0 कालेज, उन्नाव

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