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कहानी - ऑपरेशन प्रलय - विजय शंकर विकुज

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हड़हड़-खरखर, हड़हड़-खरखर ! सुबह घर से निकलते हुए भी हड़हड़-खरखर की आवाज उसके कानों में रेंगकर दिमाग को थपेड़े मार रही थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा थ...

हड़हड़-खरखर, हड़हड़-खरखर !

सुबह घर से निकलते हुए भी हड़हड़-खरखर की आवाज उसके कानों में रेंगकर दिमाग को थपेड़े मार रही थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अभी तक उसके मन-मस्तिष्क पर परसों की भारी बरसात का शोर कोलाहल मचा रहा है या आसपास के परिचित-अपरिचित पेड़ उस पर हंस रहे हैं। वह समझ गया था कि उसे अपने मन की दशा को खुद से भी छुपाये रखना होगा नहीं तो कहीं बना-बनाया खेल न बिगड़ जाये। कहीं मां, काका और काकी उसे जाने से मना न कर दें या सूरज का मन न बदल जाये।

'हे केदारेश्वर ! हमारे बच्चों की रक्षा करना’, रह-रहकर मां, काका-काकी की प्रार्थना अभी तक उसके कानों में गूंज रही थी। भोर में ही वे तीनों उसे और सूरज को गांव के बाहर उस पगडंडी तक छोड़ने के लिए आये थे जो 'शार्टकट’ कच्चे रास्ते तक पहुंचती थी और कच्चा रास्ता उस सड़क तक जिससे बाजार पहुंचकर कहीं जाने के लिए वे बस में सवार होते थे। पगडंडी तक पहुंचकर उसने मां, काका और काकी को वापस लौट जाने के लिए कहा तो उनकी आंखें भर आयी थीं। मां ने उसके और सूरज के गाल को प्यार से सहलाते हुए कहा था- 'क्या जरूरत थी ऐसे खराब मौसम में केदारेश्वर जाने की ? रह-रहकर बरसात हो रही है। दो-चार दिनों में जब आकाश साफ हो जाता तो तब तुम दोनों चले जाते।’

काका ने उन दोनों की ओर निहारते हुए भरे मन से कहा था, ' हां भौजी ठीक कह रही हैं।’

उसने सूरज को अपने से चिपकाते हुए कहा था, 'एक न एक दिन तो हमें निकलना ही है। और अभी ही तो कमाई करने का मौसम है। आपलोग किसी बात की चिन्ता मत करें। लगता है शाम तक मौसम साफ हो जायेगा।’

काकी ने भरी आंखों से दोनों के सिर पर आशीर्वाद स्वरूप अपना हाथ फेरते हुए उससे कहा था, ' सूरज पहली बार घर से बाहर कमाने के लिए जा रहा है। तू अपने छोटे भाई का पूरा ख्याल रखना। तेरे भरोसे ही छोड़ रही हूं। तू तो उसे बहुत चाहता है न !’

'अरे हम दोनों भाई राम-लक्ष्मण की जोड़ी हैं। बस आपलोग हमें अपना आर्शीवाद दें कि हम आराम से केदारधाम पहुंच जायें।’ कहते हुए नरेश भगवाड़ी ने मां, अपने काका और काकी के पांव छुए तो सूरज ने भी उसका अनुकरण किया।

'आपलोग चिन्ता मत करें। भैया हमारे साथ हैं न ....’ सूरज के चेहरे पर जहां एक अनजानी खुशी थी वहीं आंखों में चिन्ता की परछाइयां भी थीं - 'वहां पहुंचकर हम आप लोगों को खबर कर देंगे। बस, आप लोग अपना ध्यान रखा कीजियेगा। मोबाइल तो है ही, हमलोग भी खबर लेते रहेंगे और जरूरत पड़ने पर चट से पहुंच जायेंगे।’

'ठीक है। भगवान केदारेश्वर, धारी देवी, गंगा मइया तुम हमारे दोनों बेटों की रक्षा करना ’ - मां और काकी ने बलाइयां लीं। नरेश और सूरज ने तीनों को फिर प्रणाम किया और पगडंडी के रास्ते पर बढ़ गये। दोनों चलते हुए बीच-बीच में मुड़कर पीछे देख लेते। सूरज तो एक बार आगे की ओर और एक बार पीछे की ओर निहार रहा था। नरेश समझ गया कि सूरज पहली बार घर से बाहर के लिए निकल रहा है तो उसका ऐसा व्यवहार स्वाभाविक है। नरेश की मां, सूरज के माता-पिता देर तक वहीं खड़े रहे और उनके पीछे उनका गांव भी जैसे उन्हें विदाई देता-सा लगा। दोनों ने मुड़कर फिर देखा, भोर के धुंधलके में तीनों गांव की ओर वापस लौट रहे थे।

पगडंडी का रास्ता बरसात के पानी से भीगा होने के कारण पच्च - पच्च कर रहा था। पंगडंडी के दोनों ओर छोटे - बड़े पेड़ - पौधों के पत्तों से ओर की बूंदें टपक रही थीं। दूर तलक किसी आदमी की छाया तक दिखाई नहीं दे रही थी। आखिर इस बेमौसम में कौन इतनी सुबह घर से निकलेगा और वह भी तब जबकि परसों ही भारी बरसात ने चारों तरफ कहर ढाया हो। लोग पहले से ही आतंकित हैं कि कहीं फिर वैसी ही बरसात न हो जाये। भारी बरसात ने तो केदारधाम में आफत ला दी थी। बरसात ने उनके गांव को भी थोड़ा-बहुत नुकसान पहुंचाया था मगर गांव थोड़ी ऊंचाई पर होने के कारण तबाही की चपेट में आने से बच गया था। बारिश की फुहारें गिरने लगी थीं। दोनों से फटाफट अपने-अपने बैग से टोपी वाला रेनकोट निकालकर पहन लिया। सूरज ने धीरे से कहा - ' भैया, रातभर तो बरसात नहीं हुई लेकिन फिर कहीं वैसी ही बरसात शुरू हो गयी तो?’

'अरे यह टिपटिपुआ बरसात है। कुछ नहीं होगा। और अगर होती भी है तो देखा जायेगा। गांव लौट जायेंगे। दो-चार दिनों के बाद फिर केदारधाम का रुख करेंगे।’ नरेश ने धीरे से मुस्कुराते हुए इतनी सहजता से कहा कि सूरज के चेहरे पर निश्चिंतता के भाव उमड़ आये। सूरज जानता था कि नरेश हमेशा ही केदारधाम आता-जाता रहता है। उसे सिर्फ केदारधाम ही क्या, चारों धाम के रास्ते, नदी-नाले, पहाड़, जंगल, गांव-शहर के बारे में अच्छी जानकारी है। अगर कोई ऐसी-वैसी समस्या आ खड़ी हुई तो भैया रास्ता निकालना जानते हैं। भैया पिछले साल भी ऐसे मौसम में केदारधाम रहकर जा चुके हैं। भैया के भरोसे ही तो वह भी पैसे कमाने के लिए घर बाहर निकला है।

रिमझिम होती हल्की बरसात में भले ही रेनकोट और सिर पर ढकी टोपी से रक्षा हो रही हो मगर हवा की ठंडक खुले हाथ और चेहरे पर अपना आभास दे रही थी। रेनकोट के भीतर शरीर गर्मी महसूस कर ढांढस बंधा रहा था।

नरेश ने धीरे से अपने पैंट की जेब पर हाथ फेरा। मोबाइल का उभार स्पष्ट महसूस हुआ। अभी कई दिनों पहले ही केदारधाम के मार्केट में उम्दा किस्म की बैटरी वाला नया मोबाइल खरीदा है। एक दिन चार्ज करने पर सात दिनों तक चल सकता है। रात में उसने मोबाइल पूरी तरह चार्ज कर लिया था ताकि घर से निकलने के बाद रास्ते में कोई परेशानी न हो। उसने मन ही मन जो योजना बनायी थी, रास्ते में चलते हुए मोबाइल बहुत काम आ सकता है। यह अच्छा संयोग है कि उसने कई रोज पहले ही उसे खरीदा था।

उसने जेब से मोबाइल निकालकर देखा। अभी भी नेटवर्क नहीं आया था। परसों शाम तक उसका मोबाइल काम कर रहा था मगर रात को नेटवर्क फेल हो गया तो अभी तक नहीं आया था। अब भले ही मोबाइल से बात करना फिलहाल संभव नहीं हो लेकिन इसका कैमरा और टार्च तो काम रास्ते में काम आ सकते हैं। नेटवर्क जब आयेगा तक आयेगा। उसके गांव के परिचितों तथा दोस्तों के मोबाइल भी फेल हो गये थे और यह शायद परसों के खराब मौसम के कारण हुआ था।

परसों जब भारी बरसात हुई थी, उस दिन शाम तक केदारधाम, रामबाड़ा, उत्तरकाशी, गोपेश्वर, उखीमठ जैसी जगहों पर रहने वाले उसके कई दोस्तों - परिचितों से पता चल चुका था कि भारी बरसात में उत्तरांचल बह गया है। उस दिन टी.वी. पर भी उसने देखा था कि किस कदर प्रलय की बाढ़ केदारधाम में उतर आयी थी। मंदाकिनी ने तो जैसे तांडव ही शुरू कर दिया था। उस दिन टी.वी. चैनलों ने यह भी बताया था कि वहां आने वाले अनगिनत पर्यटक और श्रद्धालु मंदाकिनी में आयी अचानक बाढ़ में बह गये हैं।

परसों ही बिजली भी चली गयी जो आज उसके घर से निकलने के पहले तक नहीं आयी थी। परसों तक टी.वी. पर जो खबरें उसने सुनी थी, उसके अनुसार अगर वह भी केदारधाम में रहता तो अपनी मां, काका - काकी और गांववालों से मिल पाता या नहीं, भगवान जानें। यह तो उसका सौभाग्य है कि वह चार रोज पहले ही सूरज को लेने के लिए गांव आया हुआ था और इस बीच भारी बरसात गुजर गयी। उसके बाद से हल्की - फुल्की बरसात हो रही है। ऐसे में अचानक परसों आयी बाढ़ और अनगिनत जान - माल की हानि की आशंका के साथ ही उसके मन में ऑपरेशन प्रलय की योजना जन्म ले चुकी थी।

दोनों भीगी पगडंडी पर धीरे-धीरे पांव बढ़ाते हुए चुपचाप चल रहे थे। नरेश समझ रहा था कि ऐसे मौसम में घर पर मां तथा काका - काकी को छोड़कर निकलने के कारण मन ही मन वह जो तकलीफ झेल रहा है, सूरज भी अपने भीतर महसूस कर रहा होगा। काका - काकी बगल में ही रहते हैं। वह पहले भी मां को उनके ही भरोसे छोड़कर आता - जाता रहा है। वे लोग उसकी मां को बहुत मानते हैं। समय -असमय मां की खबर लेते रहते हैं। उनके रहते उसकी मां को कभी कोई असुविधा नहीं हुई है। काका - काकी का ख्याल आते ही उसके मन से मां को लेकर चिन्ता सिमटने लगी थी।

रिमझिम बारिश कुछ ही देर में थम गयी। दोनों से उसी तरह चलते हुए एक - दूसरे को देखा। नरेश ने सूरज की ओर निहारते हुए मुस्कुराकर कहा - 'लगता है आज भी धूप नहीं निकलेगी लेकिन भारी बरसात भी नहीं होगी। हो सकता है कि हल्की बूंदाबांदी हो। सभी चिन्ता कर रहे थे कि हमें परेशानी झेलनी पड़ सकती है मगर ऐसी कोई बात तो नजर नहीं आयी।’

'लेकिन भैया, हमलोग बस स्टॉप तक पहुंचेंगे कैसे ? कहीं आगे रास्ते की हालत बिगड़ न गयी हो ? पता नहीं बस चल भी रही है या नहीं ...... ’ सूरज ने चिन्ता भरे सहमे स्वर में कहा।

'तो क्या हुआ, हमलोग पहाड़ों को लांघते - लांघते केदारधाम पहुंच जायेंगे। आखिर हम तो पहाड़ी जवान हैं और इन पहाड़ - घाटियों खेल-कूदकर बड़े हुए हैं।’ कहते हुए नरेश जोर से हंस पड़ा।

सूरज के चेहरे पर चिन्ता के भाव घने हो उठे। उसके चेहरे को देखते हुए नरेश समझ गया कि सूरज विभिन्न तरह की आशंकाओं की कल्पना करके भीतर ही भीतर कमजोर पड़ने लगा है तो वह फिर हंस पड़ा - 'अरे मैं तो मजाक कर रहा था ........... मैं हूं न।’

दूर - दूर फैली हरियाली पर धुंधलके का ग्रहण काफी छंट गया था। नरेश मन ही मन सोच रहा था, किस तरफ से आगे बढ़ना बेहतर होगा। यहां से उत्तर - पूर्व की ओर कई छोटे - बड़े पहाड़ हैं। जंगल है। दाहिनी ओर डेढ़ कोस पर नदी है। नदी परसो की बरसात से उफनाई हुई हो सकती है। चारों तरफ दिशा छोर का अंदाजा लगाकर आगे बढ़ना होगा। कहीं सूरज के मन में किसी तरह का शक पैदा न हो जाये।

'इसी साल अक्षय तृतीया के बाद जब केदारधाम के लिए पर्यटक आने लगे तो महीने भर में अच्छी कमाई हुई। वो तो इस बार तुझे भी ले जाना था इसलिए रहने - कमाने की व्यवस्था करके दोबारा गांव आना पड़ा नहीं तो एक ही बार छह महीने बाद आता।’ नरेश गहरे उच्छवास के साथ आसमान की ओर देखने लगा।

'हां भैया, अब तो बाबूजी भी काफी कमजोर हो गये हैं। हम समझ गये थे कि वे अब केदारधाम जा नहीं सकेंगे इसलिए मैंने आपको कहा था। अब तो मैं कमाने लायक हो गया हूं तो मुझे भी बेटे का फर्ज निभाना चाहिये।’ सूरज के चेहरे पर अबोध परिपक्वता झलक उठी थी।

'अच्छा, मैंने तुझे जो भी सामान लेने को कहा था, तूने ले लिया है न?’ नरेश ने ध्यान से उसकी ओर देखकर पूछा।

'हां भैया, सब ले लिया है मगर मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि आपने लंबा चाकू लेने के लिए क्यों कहा था।’

'अरे मेरे पास चाकू नहीं है इसलिए तुझे कहा था। हमें चलते रहना चाहिये।’

नरेश आगे - आगे, सूरज पीछे - पीछे। चलते - चलते नरेश ने अपनी चाल धीमी करते हुए कहा - 'हो सकता है कि आगे कहीं बरसात का पानी जमा हो और नीचे गड्ढा हो इसलिए हमें डंडा जुगाड़ करना चाहिये।’

'यहां डंडा कहां मिलेगा? थोड़ी देर में तो हमलोग कच्ची सड़क तक पहुंच ही जायेंगे और उसके बाद ...... ’ सूरज ने सवालिया नजरों से उसकी ओर देखा।

'अरे देख नहीं रहा, कई जगह पानी का जमाव नजर आ रहा है। पता नहीं कहीं कोई बड़ा गड्ढा हो तो हम उसमें गिर भी सकते हैं। क्या जरूरत है जान-बूझकर मुसीबत मोल लेने की ? यहां किसी पेड़ की डाली काटकर डंडा तैयार करना होगा।’ कहकर नरेश ने अपने बैग से लंबे फल वाला एक चाकू निकाला। अपना बैग सूरज को थमाकर आसपास देखता हुआ एक पेड़ की ओर बढ़ा। पेड़ की डालियों से छांटकर लगभग पांच फुट के दो डाल काटे। उन्हें छील - छालकर डंडे लायक बनाया। एक डंडा अपने पास रख दूसरा सूरज की ओर बढ़ाने के बाद चाकू अपने बैग रखते हुए बोला - ' रख, कच्चा है मगर मजबूत है। रास्ते में कहीं न कहीं जरूरत पड़ सकती है।’

डंडा थामते हुए सूरज मन ही मन सोचने लगा, अभी थोड़ी ही देर पहले भैया ने कहा कि उनके पास चाकू नहीं है और अब बैग से चाकू निकालकर डंडा तैयार कर लिया। यह क्या रहस्य है ! नहीं, उसे कुछ भी कहना उचित नहीं होगा। हो सकता है कि घर से निकलने के पहले उन्होंने चाकू ले लिया हो मगर बाद में भूल गये हों। नरेश ने आगे बढ़ने का इशारा किया और हाथ डंडा थामे चलने लगा। जमीन गीली और पिलपिली महसूस हो रही थी। कहीं - कहीं कीचड़ का जमाव दिखाई देने लगा था। यहां - वहां झाड़ियों में पेड़ों की टूटी डालियां अटकी नजर आ रही थीं। नरेश समझ गया कि वह सही दिशा की ओर बढ़ रहा है। उसने देखा, आगे बढ़ते हुए आसपास कीचड़, गड्ढों में जमा पानी, पेड़ों की टूटी डालियों को देखकर सूरज के चेहरे पर असमंजस के भाव उमड़ने लगे हैं। चलते -चलते उसने थकी हुई आवाज़ में धीरे से कहा - 'भैया, कहीं हम रास्ता तो भटक तो नहीं गये ?’

नरेश का दिमाग चट से सतर्क हो उठा। तुरंत सचेत होते हुए उसने कहा, ' हो सकता है। अगर ऐसा हुआ भी तो मैं दूसरे रास्ते से तुझे केदारधाम पहुंचाकर दिखा दूंगा। मैं यहां के बारे में सब कुछ बहुत अच्छी तरह जानता हूं।’

सूरज ने कुछ न समझने जैसा समझदार की तरह सिर हिला दिया।

नरेश ने बायें हाथ की कलाई सामने लाकर घड़ी देखी। दिन के दस बज गये थे अर्थात वे पांच - सात किलोमीटर चल चुके होंगे। बरसात न हुई होती और दिन रोज की तरह सामान्य होता तो वे लोग इतनी देर में पांच क्या दस - बारह किलोमीटर चल चुके होते। यह तो अच्छा हुआ कि सूरज ने अभी तक इस बात को गौर नहीं किया नहीं तो अब तक पता नहीं कितने सवाल जड़ दिये होते। सूरज को उसकी मंशा का आभास नहीं मिलना चाहिये। जरा-सा भी आभास होने से बना-बनाया खेल बिगड़ सकता है। कहीं सूरज वापस न लौट जाये।

वे दोनों आसपास के जंगल-झाड़ियों को निहारते हुए चल रहे थे। चलते हुए सामने एक ढीह-सा नजर आया। नरेश ने सूरज की ओर निहारकर धीरे से कहा - 'अब हमें कुछ खा-पी लेना चाहिये। जूते तो भीग गये हैं। थोड़ी देर के लिए पांव जूते से बाहर निकालने होंगे। आ, इस टीले पर थोड़ी देर ठहर लें।’

दोनों ढीह के पास पहुंचे। छोटा-सा ढीह था जिस पर पांच-छह लोग किसी तरह बैठ सकते थे। दोनों ने अपने जूते उतारे और उस पर बैठ गये। जूते गीले थे मगर उन पर बैठना उनकी मजबूरी थी। दोनों टीले पर बैठकर अपना-अपना बैग खोलने लगे। नरेश ने उसकी ओर देखकर कहा- ' अभी बिस्कुट खा लेते हैं। बाद में घर से लायी रोटी-सब्जी खा लेंगे।’

सूरज ने उसकी बात पर हामी में सिर हिला दिया।

दोनों ने अपने-अपने बैग से बिस्कुट के पैकेट निकाले और खोलकर खाने लगे। बिस्कुट खाने के बाद बैग से बोतल निकालकर पानी पिया। बोतल बैग में वापस रखकर नरेश धीरे से उठा और एक ओर जाकर पेशाब करने लगा। उसकी देखादेखी सूरज भी उठा और दूसरी ओर चल दिया। अब दोनों के चेहरे पर हल्केपन का भाव नजर आने लगा था। नरेश उसकी ओर मुड़कर बोला- ' मैं यहां कई बार आ चुका हूं। आगे थोड़ी ढलान है। अब हमें दूसरे रास्ते से आगे बढ़ना होगा। हम जब निकल पड़े हैं तो पीछे नहीं हटेंगे।’

नरेश ने सूरज को पीछे हटने की बात जान-बुझकर कही थी ताकि वह कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करे जिससे उसके मन को पढ़ने में आसानी हो। सूरज की आंखों में सहजता से भाई पर भरोसे का आभास हुआ। उसका मन निश्चिंत हो गया। थोड़ी देर बाद वे फिर चल पड़े।

नरेश में मन ही मन अंदाजा लगाया, अगर वह सही दिशा में है तो चोपता से ज्यादा दूर नहीं है। उसका गांव चिकिबा अनिमठ और चोपता के बीच पड़ता है लेकिन इनके बीच काफी फासला है। नीचे चमोली है। परसों शाम तक उसे जो खबरें मिली थीं, उससे पता चल चुका था कि केदारधाम से लेकर चमोली, उखीमठ, अनिमठ, बदरीनाथ, मंडल के अलावा और भी बहुत-सी जगह बाढ़ में तबाह हो गयी हैं। सूरज को इन बातों की जानकारी नहीं होगी, होती तो वह उसके साथ हरगिज नहीं आता। आखिर कौन इस आपदा के समय घर से कहीं दूर जाने के लिए निकलेगा। मां, काका-काकी भी इस बात से अनभिज्ञ ही होंगे नहीं तो वे भी उन्हें घर से निकलने नहीं देते। अगर परसों बिजली गुल नहीं हुई होती, सभी के टी.वी. और मोबाइल चालू होते तो केदारधाम से तबाही की खबर घर-घर पहुंच चुकी होती। भगवान करे कि मोबाइल का नेटवर्क अभी और दो-तीन दिनों तक फेल रहे नहीं तो सूरज सारी सच्चाई जान जायेगा।

चलते-चलते आगे जमीन ढलान होने का इशारा कर रही थी। जमीन भीगी हुई तो थी ही, यहां चारों तरफ कीचड़ भी नजर आने लगी थी। वह कीचड़ में पांव धंसाता चलने लगा तो मजबूरन सूरज भी उसके पीछे-पीछे चलने लगा। नरेश समझ गया कि दिशा सही है। यहां उत्तर से दक्षिण की ओर लगभग ग्यारह फीट चौड़ा रास्ता रहा होगा जिसका अब नामोनिशान तक नहीं था। वह सोचने लगा, क्या बरसात ने ऐसी तबाही मचायी होगी कि रास्ते तक को उखाड़ फेंका। छोटे-बड़े पत्थर कीचड़ में धंसे नजर आ रहे थे। शायद बरसात के कारण लुढ़ककर आ गये हों। जहां-तहां पेड़ों की टूटी डालियां अटकी पड़ी थीं। नरेश अपने डंडे से कीचड़ की गहराई के साथ जमीन का अंदाजा लगाता संभल-संभलकर कदम आगे बढ़ाने लगा। सूरज भी उसका अनुकरण कर रहा था। चलते हुए जूते कीचड़ में पूरे धंसे जा रहे थे।

'भैया, यह हमलोग कहां आ गये?’ सूरज चारों तरफ देखता हुआ आश्चर्य के साथ बोला।

'घबरा मत, अगर हमलोग रास्ता भटक भी गये हैं तो कोई बात नहीं। हम दूसरी तरफ से जा रहे हैं। इस ओर के बारे में भी मुझे जानकारी है। मैं थोड़ी ही देर में रास्ता तलाश लूंगा।’ नरेश ने सहजता के साथ कहा तो सूरज के चेहरे पर इत्मीनान के भाव उमड़ आये।

अब पच्च-पच्च की नहीं, कीचड़ में जूते धंसने-निकलने से भच्चाक-ढुस्स की आवाज उभरने लगी थी। जंगल-झाड़ियों के बीच वे सतर्कता से आगे बढ़ रहे थे। नरेश मन ही मन सोच रहा था, उसे ऐसे रास्ते से आगे बढ़ना होगा जिधर कोई गांव-कस्बा न हो। लोगों की नजरों से बचते हुए सूरज को साथ रख उसे अपने टारगेट की तलाश करनी होगी। केदारधाम जाने के बहाने वह सूरज को अपने साथ इसीलिए तो लाया है। बस्स, आगे घना होता हुआ जंगल या छोटे-मोटे जानवरों को देखकर सूरज का मन कमजोर न पड़ने लगे। सूरज को उस पर किसी तरह का संदेह न हो जाये इसलिए उससे लगातार बातचीत जारी रखकर उसके दिमाग को दूसरी तरह की बातों में उलझाये रखना होगा।

वह अपने चेहरे को सामान्य रखते हुए बोला, 'बाबूजी और काका केदारधाम जाने वाले पर्यटकों को पालकी पर ढोते थे। यही काम करते हुए पिताजी ने गांव की जमीन पर पक्का मकान बनाया। दीदी की शादी देहरादून के एक खाते-पीते परिवार में की। काका ने भी घर बनवाया। मेरी किस्मत खराब थी कि हायर सेकेंडरी की पढ़ाई करते-करते बाबूजी ऐसे बीमार पड़े कि भगवान को प्यारे हो गये। मेरी पढ़ाई बंद हो गयी, नहीं तो मैं भी जीजाजी की तरह बी.ए.- एम.ए. तक पढ़ाई करके कहीं अच्छी नौकरी कर रहा होता। बाबूजी कुछ जोड़ नहीं पाये थे। अब मुझे अपना तथा मां का पेट पालने के लिए पर्यटकों को कभी खच्चर पर तो कभी पीठ पर ढोना पड़ रहा है। मेरी किस्मत भी खराब है।’

सूरज ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा, 'हां भैया, अब तो मेरे बाबूजी भी बीमार रहने लगे हैं। पहाड़ की चढ़ाई चढ़ने लायक दम उनमें नहीं रहा। मैं भी तो किसी तरह दसवीं तक पढ़ पाया। अब मुझे भी तुम्हारी तरह पर्यटकों की सेवा करनी होगी।’

पेड़ों से छनकर आती हवा में एक अजीब-सी गंध घुली हुई थी जैसे चारों तरफ गोबर बिखरा हो। यह चारों तरफ पसरे गंदे पानी की गंध थी। ऊपर आकाश घने बादलों से इस तरह ढका नजर आ रहा था जैसे अब सूरज को कभी सामने आने नहीं देगा।

नरेश कीचड़ में संभल-संभलकर चलता हुआ बोला, ' इस समय केदारधाम में देश के कोने-कोने से श्रद्धालु पर्यटक आते रहते हैं। कुछ तो इतने अमीर होते हैं कि उनके घर की औरतें सोने के जेवरों से लदी होती हैं। मर्दों की जेब रुपयों से भरी होती है। अधिकतर लोग अपने धन-दौलत का प्रदर्शन करने यहां आते हैं या कहा जाये तो तीरथ के बहाने यहां मौज-मस्ती करने के लिए आते हैं। अपने फालतू की कमाई को उड़ाकर वापस लौटते हैं। कुछ दल तो ऐसे होते हैं जिनके मर्द यहां आते ही रम-व्हिस्की के लिए दोगुने-तिगुने पैसे देने को तैयार रहते हैं। किसी के पास उड़ाने के लिए इफरात पैसे हैं तो किसी को ठीक से खाना-पहनना नसीब नहीं होता है। वाह रे भगवान !’

'नहीं भैया, भगवान का दोष नहीं है। भगवान ने सभी को अच्छे-बुरे की बुद्धि दी है। जो जैसा करता है, उसे एक दिन वैसा ही भुगतना पड़ता है।’ सूरज की आंखों में किसी अदृश्य शक्ति के प्रति अपार श्रद्धा उमड़ आयी थी, ' भैया भगवान हैं, वे सब कुछ देखते हैं।’

' हां, भगवान तो हैं। यह मैं भी मानता हूं। एक बार बचपन में मैं बहुत बीमार हो गया था। मेरे बचने की कोई उम्मीद नहीं बची थी। तब मां और बाबूजी ने भगवान केदारेश्वर, माता धारी देवी, गंगा मइया की विनती की थी और मैं धीरे-धीरे ठीक हो गया था।’ नरेश की आंखों में जैसे स्मृतियां सजीव हो उठीं और चेहरे पर एक अजीब-सी चमक दिखाई पड़ने लगी थी।

' लगता है हमलोग काफी आगे निकल आये हैं। मौसम खराब, सब कुछ उजड़ा-उजड़ा होने के कारण दूरी का पता नहीं चला।’ सूरज चारों ओर गौर से देखता हुआ बोला। नरेश उसे गौर से निहारने लगा मगर उसने कोई उत्तर नहीं दिया।

कीचड़ की गहराई बढ़ने का आभास उनके डंडे और पांव को होने लगा था। आसपास जंगली पेड़ों की संख्या बढ़ने लगी थी। कीचड़ पतला लग रहा था नहीं तो उन्हें चलने में और काफी तकलीफ उठानी पड़ती। नरेश के पीछे-पीछे सूरज इस तरह चल रहा था जैसे वह मजबूर हो या अपने भैया को किसी मुसीबत में अकेला नहीं छोड़ना चाहता हो। दोनों समझ रहे थे कि यह जगह ढलान में है नहीं चारों तरफ इतना कीचड़ नहीं होता। मगर नरेश ढलान की ओर क्यों बढ़ रहा है, यह बात अभी तक सूरज को खटकी नहीं थी।

अचानक कीचड़ की गहराई ज्यादा लगने पर दोनों किसी आशंका से ठहर गये। बहुत सी जगहों पर पेड़ों की टूटी डालियां पड़ी थीं। आगे भी ढलान नजर आ रही थी लेकिन वहां कीचड़ कम लग रहा था। नरेश ने डंडे से कीचड़ को कुरेदना शुरू किया। इधर-उधर डंडा कीचड़ में धंसाने पर एक जगह ऐसा लगा जैसे नीचे कुछ अटका हुआ हो। उसने दोनों हाथों की पूरी ताकत से उस जगह पर डंडा घुसेड़कर कीचड़ को उठाया। उसके डंडे के साथ पोलीथिन की थैलियां आपस में लिपटी हुई उभरकर बाहर आ गयीं जिसे उसने दूसरी ओर फेंक दिया। कीचड़ पतला था, हड़हड़ाकर ढलान की ओर बहने लगा। नरेश गुस्से में बुदबुदा उठा, ' पता नहीं पोलिथीन की थैलियों का व्यवहार कब बंद होगा। यहां खाने-पीने की चीज और मंदिर में फूल-प्रसाद तक पोलिथीन की थैलियों में बिकते हैं। पानी के बोतल और ऐसी चीजों को लोग जहां-तहां फेंक देते हैं। लोग जानते हैं कि ये चीजें हमारे लिए कितनी खतरनाक हैं मगर इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। एक दिन यही सब हमारी जान का दुश्मन बन जायेगा। यहां कीचड़ का जमाव इसी से हुआ होगा।’

नरेश के पीछे खड़ा सूरज कीचड़ को बहते देख रहा था। कीचड़ धीरे-धीरे घुटनों से नीचे आता हुआ पिंडलियों तक पहुंचने को हुआ तो दोनों ने इधर-उधर देखा और चौंक पड़े। आसपास थोड़ी दूर पर कीचड़ से उभरी कई लाशें नजर आने लगी थीं। दोनों लाशों को गौर से देखने लगे। चार लाशें औरतों की थीं और तीन लाशें पुरुषों की। लाशें कीचड़ में हुई थीं। उनके हाथ-पांव तुड़े-मुड़े थे। लाशों के चेहरे कीचड़ के कारण किसी हॉरर फिल्म के भूत की तरह डरावने लग रहे थे।

'भैया,’ सूरज सहमकर नरेश के करीब आते हुए धीरे से बोला, ' मुझे डर लग रहा है।’

'चुप्प !’ नरेश उसे डपटता हुआ बोला, ' लगता है ये बाढ़ में बहे लोगों की लाशें हैं। तुझे तो पेशाब उतरने लगी। हमें इनकी तलाशी लेनी होगी।’

' क्यों?’ सूरज ने काफी डरी हुई आवाज में कहा। नरेश ने कोई उत्तर नहीं दिया।

वह फुर्ती से लाशों के नजदीक पहुंच गया मगर सूरज सहमा-सा वहीं खड़ा रहा। नरेश ने मुड़कर सूरज को देखा और रहस्यमयी हंसी हंसा, ' तू वहीं खड़ा रह। देख, मैं जादू दिखाने वाला हूं।’

नरेश लाशों को गौर से देखने लगा। फिर डंडे से उनके चेहरे, गले तथा शरीर पर लिपटे कीचड़ को साफ करने की कोशिश करने लगा। सूरज चुपचाप खड़ा उसकी हरकतों को देख रहा था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि भैया क्या कर रहे हैं। नरेश की आंखों में एक चमक-सी उभर आयी। उसने एक महिला की लाश के गले पर अपना हाथ फेरा और उसके गले से कीचड़ में लिपटा हार नोच लिया। आंखों के सामने हार को लाकर ध्यान से देखने लगा और हाथ से उसे साफ करते हुए किलकारी-सी भर उठा, ' सोने का है।’

सूरज का चेहरा थोड़ा सामान्य हो आया था। उसके भीतर का भय नरेश के हाथ में सोने के हार को देखकर सिमटने लगा था। वह भी कीचड़ में चलता हुआ धीरे से नरेश के करीब आ खड़ा हुआ। उसके नजदीक आने का आभास नरेश को हो चुका था। वह आसपास सतर्कता से देखता हुआ बोला, ' इनकी तलाशी लेकर जो कुछ भी मिलेगा, मैं तुझे थमाता जाऊंगा। तू फटाफट रखते जाना। बाद में हमलोग बंटवारा कर लेंगे।’

सूरज ने धीरे से 'हां’ में सिर हिला दिया।

नरेश ने उसी महिला की लाश के हाथों से सोने के कंगन उतारे, कान से बालियां उतार लीं और सूरज को थमा दिया। उस महिला की लाश को अच्छी तरह टटोल लेने के बाद दूसरी महिला की लाश की तलाशी लेने लगा। उसके कानों से सिर्फ सोने के टॉप्स मिले। नरेश खीझकर बुदबुदा उठा, ' लगता है साली इनलोगों की नौकरानी होगी।’

तीसरी महिला की लाश से भी सोने का हार, कान के टॉप्स, दो अंगूठियां मिलीं। इसके बाद चौथी महिला की लाश से भी दो गहने उतारने के बाद पुरुषों की शर्ट और पैंट की जेब की तलाशी ली। तीनों लाशों से लगभग चालीस हजार रुपये, पांच अंगूठियां और दो हार मिले। उनकी जेब से मिले मोबाइल को वापस कीचड़ में फेंक दिया। वे बेकार हो चुके थे। जेब के पर्स से निकले एटीएम-क्रेडिट कार्डों को भी फेंकता हुआ बोला, ' ये हमारे काम के नहीं हैं। चल बहुत मिला।’

' कहां चलूं ? सूरज ने बेवकूफों की तरह जवाब दिया तो नरेश हंस पड़ा, ' किसी सुरक्षित जगह पर इन चीजों को ठीक से बैग में रख लेंगे। अब लाशों को खरोचने से इनका कंकाल निकल आयेगा।’

' हां-हां।’ सूरज गहने थामे तैयार हो गया। नरेश रुपयों को हाथ में इस तरह पकड़े था जैसे वे फिसलकर गिर न जायें। उसने एक नजर इधर-उधर देखा और एक तरफ चल पड़ा। सूरज भी उसके साथ हो लिया। थोड़ी दूर जाने पर उन्हें एक बड़ी-सी चट्टान नजर आयी। नरेश खुश हो उठा, ' चल, उस चट्टान पर बैठते हैं। इसके बाद देखेंगे कि कितना माल मिला है।

नरेश मन ही मन सोचने लगा, अगर इसी तरह कुछ माल-कौड़ी और मिल जाये तो केदारधाम जाकर टट्टू खींचने की जरूरत नहीं पड़ेगी। बीस-पच्चीस लाख ..... कम से कम पचास लाख तक माल बटोरने में सफल हो जायें।

दोनों आकर चट्टान पर बैठ गये। चट्टान काफी बड़ी थी। उसका ऊपरी हिस्सा लगभग पांच बाई सात फुट लंबा-चौड़ा था। चट्टान पूरी समतल नहीं थी लेकिन उस पर दो लोग बैठ-लेट सकते थे। चट्टान पर दोनों ने अपने कीचड़ से सने जूते उतारकर एक तरफ रख दिये तो शरीर काफी हल्का लगने लगा। फिर लाशों से मिले गहने-रुपयों को दोनों ने उलट-पुलटकर देखा। उनके चेहरे से चिन्ता की लकीरें मिट चुकी थीं। नरेश के इशारे पर सूरज ने गहने और रुपये बैग में सावधानी से रख लिये। दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराकर उठे। थोड़ी ही देर में दोनों ने अपने-अपने बैग से रोटी-सब्जी के पैकेट निकाले और हबाहब खाने लगे। लग रहा था उन्हें भूख बड़े जोरों से लगी थी। खाना खाकर बोतल निकाली। पानी पीने के बाद दोनों चित्त लेट गये। हवा के झौंके थोड़े तेज हो गये थे। पेड़ों को झूमने तथा उनके पत्ते खड़खड़ाने की आवाज शरीर में एक अजीब-सी सिहरन पैदा करने लगी थी। आकाश का रंग धुंधलाता नजर आने लगा।

'भैया, लग रहा है कि शाम होने वाली है। हमलोग तो भूल गये कि हमें केदारधाम पहुंचना है। पता नहीं हमलोग इस समय कहां है और कहीं रात हो गयी तो हम इस जंगल में फंस जायेंगे।’ सूरज के चेहरे पर चिन्ता और डर का साया एक साथ लहरा उठा।

नरेश को लगा, कहीं सूरज के भीतर रात का अंधेरा डर पैदा न कर दे। गला खखारकर उसने हंसते हुए कहा, ' आज ज़िंदगी का नया तजुर्बा हो रहा है। इस तरह की बातें हम फिल्मों में देखते आये थे। आज अपनी जिंदगी में भी सामना कर रहे हैं।’

' भैया, सिनेमा अलग चीज है। हम तो आज खुद अपनी जिदगी को अजीब-सा अनुभव कर रहे हैं। समस्या यह है कि कहीं मौसम बिगड़ न जाये या कोई अनहोनी घटना न घट जाये।’ सूरज के चेहरे पर चिन्ता और घनी हो उठी थी।

नरेश ने उसे गौर से देखा मगर अपने स्वर को सामान्य रखता हुआ बोला, ' केदारधाम पहुंचने से पहले हमें इसी तरह और भी गहने और रुपये मिल जायें तो हम कल ही वापस लौट जायेंगे। हमलोग आधा-आधा बांट लेंगे। मैं तो गांव जाकर किसी चीज की दुकान खोल लूंगा। कौन मरने के लिए यहां-वहां भटकेगा ? तू क्या करेगा?’

' जब आप गांव लौट जायेंगे तो मैं कहीं क्यों जाऊंगा। मुझे आधा हिस्सा मिल जायेगा तो मैं भी कोई धंधा करुंगा।’ ऐसा लगा सूरज की आंखों में भी कोई सुखद सपना आकार लेने लगा था। लाशों से मिले गहने और रुपयों की चमक अपना प्रभाव जमा चुकी थी।

नरेश को अपने ऑपरेशन प्रलय की योजना साकार होने का विश्वास हो चुका था। सब कुछ उसकी योजना के अनुसार ही घटित हो रहा है। सूरज उसकी योजना से अंजान होते हुए भी प्रत्यक्ष रूप से उसका हिस्सा बन चुका था। नरेश सोचने लगा, अगर सूरज को उसकी योजना के बारे में पहले बता देता तो वह उसके साथ हरगिज नहीं आता। सूरज कमजोर दिल का लड़का है।

हवा में ठंडक बढ़ गयी थी। दोनों ने अपने-अपने कपड़ों पर कई जगह लगे कीचड़ को साफ किया। खाने के कागज से उन्हें पोंछा। वे समझ गये कि थोड़ी ही देर में रात उतर आयेगी। दोनों ने अपना-अपना मोबाइल निकाला और उसकी टार्च जलाकर इधर-उधर देखा। टार्च की रोशनी इतनी तेज नहीं थी कि दूर-दूर तक का जायजा लिया जा सके। इसके बाद अपने-अपने बैग से चद्दर निकालकर ओढ़ लिया। दोनों के बीच छायी चुप्पी को तोड़ता हुआ नरेश बोला, ' यह तो भला हो कि बारिश बंद है। तू बेफिक्र होकर आराम कर, मैं जगा रहूंगा। अपना मोबाइल और चाकू बगल में तैयार रखना। अगर मैं जगाऊंगा तो तुरंत उठ जाना।’

'क्या यहां खतरनाक जानवर या चोर डाकुओं का खतरा हो सकता है ?' सूरज का स्वर सहमा हुआ था।

' नहीं-नहीं। रात को यहां की जंगल-झाड़ियों में कौन किसके यहां डकैती करने आयेगा। तू बेफिक्र होकर आराम कर। मैं हूं न।’ नरेश की बात से सूरज का चेहरा सामान्य हो आया। अपनी बरसात चट्टान पर बिछाते हुए बैग को सिरहाने रखकर वह धीरे से हंसा, ' फिल्मों में जिस तरह एक्टर रात गुजारते हैं, हम भी गुजारेंगे। ’

दोनों एक साथ हंस पड़े।

रात घनी हो उठी थी। जंगल का अंधेरा सांय-सांय करने लगा था। हवा से कांपते पत्तों की आवाज नरेश को भी भीतर से सताने लगी थी। आसपास झिंगुरों की आवाज तेज होने लगी थी। पहाड़ों मेढ़कों के टर्राने की आवाज हवा में घुलकर उनके कानों में सुरसुराहट पैदा करने लगी थी। दूर कहीं से सियार-हुंडारों की आवाज भी आ रही थी। ठंड थोड़ी और बढ़ गयी थी। उसने मोबाइल के टार्च से देखा, सूरज ने मोटे चद्दर को सिर से लेकर पांव तक ओढ़ लिया था। नरेश ने सिर ऊपर की ओर उठाया। आकाश में चांद या तारे बिल्कुल नहीं थे। रात का घना अंधेरा बादलों को अपने में ढक चुका था। चारों तरफ फैले कीचड़ से उभरकर गोबर जैसी गंध उसके नथुनों में समा रही थी। नरेश किसी पहरेदार की तरह सतर्क था। थोड़ी ही देर में सूरज के खर्राटे की आवाज उभरने लगी थी।

नरेश बीच-बीच में मोबाइल की टार्च जलाकर इधर-उधर देख लेता। काली अंधेरी रात की कोख में पेड़-पौधे गुम हो गये थे। वह सोच रहा था, आकाश में बादल नहीं होते तो चांद की रोशनी में कुछ तो नजर आता। सूरज लेटते ही घोड़े बेचकर सो गया। खुरदुरी चट्टान पर उसे तुरंत नींद कैसे आ गयी, पता नहीं। शायद दिनभर की थकान ने उसकी आंखों की नींद को बेहोशी में बदल दिया है। खैर, उसे सावधान रहना होगा और दो घंटे बाद सूरज को जगा देना होगा। फिर वह भी खुद दो घंटे नींद मार लेगा। इस तरह दो घंटे वह और दो घंटे सूरज सो-जागकर पहरा भी देंगे और अपनी थकान मिटा लेंगे। यह तो अच्छा है कि बरसात बंद है नहीं तो दोनों की नींद हराम हो जाती।

उसने अपनी चादर ओढ़ ली। डंडा उसके दाहिने हाथ की ओर पड़ा था। बांये हाथ में थामे मोबाइल की टार्च जला-जलाकर वह इधर-उधर देख लेता कि कहीं कोई कीड़ा या जानवर न आ जाये। उसकी पीठ और कमर भी थकान की गवाही दे रहे थे। पांव पसारकर वह चट्टान पर सूरज के बगल में अपने बैग के उठंगकर इस तरह लेट गया ताकि चारों तरफ नजर रखी जा सके। उसकी आंखों में नींद अपनी आहट देने लगी थी। वह सतर्क हो गया। नहीं, उसे जगे रहना है और दो घंटे बाद सूरज को उठा देना है।

और पता नहीं कब नींद ने उसे भी अपने आगोश में ले लिया।

आंखें खुलते ही उसने मिचमिचाकर इधर-उधर देखा। भोर का उजाला फैल रहा था। अरे, यह तो सुबह हो गयी। उसने तुरंत आसपास निहारा। मोबाइल बायीं ओर पड़ा था और डंडा दाहिनी ओर। सूरज अभी भी गहरी नींद में गाफिल था। वह हड़बड़ाकर उठा और सूरज को झकझोरने लगा, ' ऐ उठ, सुबह हो गयी है।’

कई बार झोकझोरने और पुकारने के बाद सूरज ने धीरे से आंखें खोलते हुए कहा, ' भैया, थोड़ी देर और सोने दो ना। दो घंटे नहीं हुए होंगे।’

' अरे उठ, सुबह हो गयी है,’ उसने जोर से डांटा तो सूरज हड़बड़ाकर उठ बैठा। चारों तरफ निहारते हुए वह भौंचक रह गया, ' भैया, आप रात भर जागते रहे ? मुझे क्यों नहीं उठाया।’

' चुप बेवकूफ। पता नहीं कब मुझे भी नींद आ गयी थी। हमदोनों की किस्मत अच्छी है कि कोई जानवर इधर नहीं आया होगा। चल फ्रेश होकर हमें सफर शुरू करना है।’ नरेश ने उसकी ओर निहारते हुए गंभीरता से कहा।

' भैया, कल लाशों से हमें काफी गहने और रुपये मिले हैं। ऐसा तो मैंने कभी सोचा तक नहीं था।’ सूरज ने इस तरह से कहा कि नरेश का मन भीतर ही भीतर अपनी सफलता पर खिल उठा। उसकी योजना का प्रथम चरण सफल रहा।

वह धीरे से मुस्कुराकर बोला, ' देने वाला छप्पर फार कर देता है। तुझे भी आधा हिस्सा मिलेगा। आखिर तू मेरा चचेरा भाई है। मगर यह बात हमें अपने गांव या घर में किसी को भी नहीं बतानी है। हमलोग कुछ दिनों केदारधाम रहकर वापस लौट जायेंगे। चल, तैयारी करते हैं।’

चट्टान के आसपास ही दिशा-फारिग होकर दोनों ने पेड़ों के पत्तों से अपने शरीर को साफ किया। बोतल का पानी हाथ पर छिड़ककर फिर कुल्ला किया। बैग से बिस्कुट निकालकर खाने के बाद सफर की तैयारी कर ली।

नरेश जानता था कि आसपास कई पहाड़ हैं मगर धुंधलके और कोहरे से ढके हुए हैं। इसके छटने पर ही सब कुछ साफ दिखाई दे सकता है। कीचड़ में पांव धंसने पर भच्चाक-ढुस्स की आवाज उभर रही थी। कीचड़ से उभरने वाली गोबर जैसी गंध उन्हें अब तकलीफ देने की जगह खुशबू बिखेरती लग रही थी। दोनों बारीकी से आसपास इस तरह निहारते चल रहे थे कि कहीं से कोई खजाना उभरकर सामने आ जायेगा। नरेश ने चलते हुए तिरछी नजरों से सूरज की ओर देखा। सूरज की आंखें किसी सपने में खोयी हुई थीं। वह समझ गया कि सूरज के दिलो-दिमाग में उसने जो सपने बो दिये हैं, वे उसकी आंखों में लहलहाने लगे हैं।

घड़घड़-घड़घड़ ........ घड़घड़-घड़घड़ ........ !

नरेश ने तुरंत सूरज का हाथ पकड़कर खींचा और एक पेड़ की ओट में छिप गया। सूरज ने आश्चर्य से पूछा, ' क्या हुआ भैया ?’

' लगता है बाढ़ में गुम हुए पर्यटकों को खोजने हेलिकॉप्टर पर सरकारी अफसर निकल चुके हैं। अगर उन्होंने हमें देख लिया तो पर्यटक समझकर हमें लेने के लिए नीचे उतर आयेंगे। और किसी तरह का शक हो गया तो ..... हमें अब तक जो कुछ भी मिला है, सब से हाथ धोना पड़ेगा।’ नरेश ने फुसफुसाते हुए धीरे से कहा।

' ओह,’ सूरज भी उसकी तरह ओट में दुबका रहा।

आकाश में दो हेलिकॉप्टर कभी आगे-पीछे तो कभी ऊपर-नीचे होते हुए उड़ान भर रहे थे। जब हेलिकॉप्टर आगे जाते तो वे पेड़ के पीछे चले जाते और जब हेलिकॉप्टर पीछे जाते तो उससे बचने के लिए आगे खिसक जाते। भाग्य से पेड़ घना था। उन्हें देख पाना संभव नहीं था। थोड़ी ही देर में हेलिकॉप्टर उड़कर दूसरी ओर निकल गये।

नरेश उसका हाथ थामे पेड़ की ओट से बाहर निकलते हुए बोला, ' बच गये। लगता है वे उस ओर चले गये जहां पहले हमें लाशें मिली थीं। हो सकता है कि गुम हुए पर्यटकों को खोजने के लिए सरकारी मशीनरी सक्रिय हो गयी है। अब हमें सावधान रहना होगा और जल्द से जल्द कुछ खोज-खाजकर केदारधाम पहुंच जाना होगा।’

सूरज ने 'हाँ’ में सिर हिला दिया।

कीचड़ कहीं घुटने भर तो कहीं थोड़ा कम था। कीचड़ के नीचे जमीन पथरीली महसूस हो रही थी सो उन्हें संभल-संभलकर चलना पड़ रहा था। कहीं गिर गये और गहरी चोट लगी तो सारा गुड़ गोबर हो जायेगा। नरेश ने कलाई घड़ी को देखा। अब तक चलते-चलते तीन घंटे हो गये थे। आज भी आकाश बादलों से ढका हुआ था।

टिप-टिप, टिप-टिप। बूंदाबूंदी।

' लो बरसात भी शुरू हो गयी। हे भगवान, जोरों से बरसात न हो। हमें आज भर का मौका दे दो।’ नरेश ने धीरे से बुदबुदाते हुए आकाश की ओर देखा। सूरज ने आकाश की ओर निहारकर प्रणाम किया। दोनों ने अपनी-अपनी बरसाती पीठ पर लदे बैग के ऊपर ओढ़ ली और एक साथ चल पड़े। चलते-चलते कुछ दूर जाते ही वे चौंक पड़े। सामने जो नजारा नजर आया उससे उनके चेहरे खिल उठे। फिर लाशें। सामने कई लाशें कीचड़ में उभरी-फूली नजर आ रही थीं। दोनों फटाफट लाशों की तलाशी लेने लगे। रुपये-गहने जो भी मिलते उन्हें झाड़कर दोनों अपने बैग में ठूंसते जा रहे थे। दोनों की आंखों में रुपये और गहनों की चमक उन्हें बेचैन करने लगी थी। ग्यारह लाशें। कपड़ों से लेकर उनके शरीर के भीतरी हिस्से तक की तलाशी वे इस तरह से ले रहे थे, जितनी बारीकी से मुर्दाघरों में पड़ी लाशों का पोस्टमार्टम तक नहीं किया जाता। आखिर सारी लाशों को खंगाल चुकने के बाद वे सीधा खड़े हुए। यहां मिलने वाली कोई लाश अब उनकी तलाशी से बाकी नहीं बची थी।

नरेश हंसा, ' इस बार अच्छा माल मिला है। मेरे और तेरे पास मिलाकर पचास-पचपन लाख ......... ’

' ब .. चा .. ओ.., कोई ..... हय ...... ’ दोनों चौंक पड़े। इधर-उधर निहारते वे आवाज की दिशा तलाशने लगे। उन्होंने देखा, कुछ दूरी पर एक आदमी कीचड़ में लिथड़ा दोनों कुहनी के बल घिसट-घिसटकर एक ओर बढ़ रहा था। ऐसा लगता था, उसके दोनों पांवों में लकवा मार गया हो या वे किसी कारण बेकार हो गये हों। दोनों कीचड़ में संभलकर पांव धंसाते-धंसाते वहां तक पहुंचे। सूरज लपककर उस आदमी के पीछे पहुंचा और उसे अपनी गोद का सहारा देता हुआ बोला, 'हाँ-हाँ, बोलिये क्या हुआ ? आप कौन हैं ?’

वह आदमी सूरज की गोद का सहारा पाते ही बिलख पड़ा, ' सब खत्म हो गया। पता नहीं मेरी पत्नी, बहन, बेटे-बेटी कहां होंगे। मेरे दोनों पांव टूटकर बेकार हो चुके हैं। मैं क्यों बच गया ? यह सब क्या हो गया ?’

' हम आपको बचायेंगे ...... ’ सूरज का मन उस बिलखते आदमी की दशा पर खुद ही भीतर से बिलख उठा मगर उसकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि कैसे क्या किया जाये। उसने नरेश की ओर देखा, ' भैया, हमें इन्हें बचाना होगा। ’

' मैं ...... नहीं बचूंगा। तीन दिन से .... कीचड़ में ..... पड़े-पड़े ..... मेरा बदन सुन्न पड़ने लगा है ..... मैं ..... नहीं ..... बचूंगा।’ उस आदमी की आवाज टूटने लगी थी। वह सूरज की बाहों में निढाल होने लगा था। उसकी पलकें भारी पड़ने लगीं थीं। सूरज ने उसे धीरे से झकझोरा, ' आप हिम्मत मत हारिये। हम आपको ले जायेंगे।’

उसकी बाहों में पड़ा वह आदमी जैसे बेहोश होने लगा था। नरेश अचानक आगे बढ़ा और उसने फुसफुसाते हुए सूरज को डांटने जैसे स्वर में कहा, ' अरे, पागल हो गया है। यह तो मरने वाला है और इसके चक्कर में हम भी मारे जायेंगे।’

इसके बाद नरेश फटाफट उस आदमी के शरीर की भी तलाशी लेने लगा। उसे जो कुछ रुपये मिले, उन्हें अपने पैंट की जेब में ठूंसने लगा। उसकी यह हरकत देखकर सूरज आश्चर्य से बोला, ' भैया, यह क्या कर रहे हैं ? हमें इसे बचाना होगा।’

' चुप्प बेवकूफ। इसे बचाने से पहले जरूरी है हमें खुद बचना। थोड़ी देर पहले ही खोजी हेलिकॉप्टर गये हैं। कहीं पुलिस या मिलिटरी वाले इधर आ गये तो हमें ही बचना मुश्किल हो जायेगा। जो माल-कौड़ी हमें मिला है, वह तो जायेगा ही और सारी जिन्दगी हमें जेल में चक्की पिसनी होगी। चल भाग, यहां से निकल चलें।’

उसे लगा कि कीचड़ का बहाव थोड़ा तेज होने लगा है। शायद यह दो-तीन घंटे पहले हुयी तेज बरसात के कारण हो रहा हो। रेनकोट के नीचे भारी बैग, इसके साथ ही उस आदमी को संभालने में सूरज को काफी दिक्कत हो रही थी। उसे महसूस होने लगा कि कीचड़ में ज्यादा देर तक टिक पाना बहुत ही मुश्किल है। उसने खड़े होकर अपने दोनों पांवों के सहारे उस आदमी को उठा लिया जो अब भी धीरे-धीरे कुछ बुदबुदा रहा था। फिर धीरे से अपना बैग रेनकोट के नीचे से निकालकर नरेश की ओर बढ़ाते हुए बोला, ' भैया, गुस्सा मत होइये। इतनी लाशों के बीच हमें एक जिन्दा आदमी मिला है। इसे आंखों के सामने मरता कैसे छोड़ दूं। लगता है केदारेश्वर हमारी परीक्षा ले रहे हैं। आप इस बैग को संभालिये। अगर जरूरत पड़ी तो आप दोनों ही बैग लेकर चले जाइयेगा। मैं इस अदमी को किसी ऐसी जगह पहुंचाकर आ जाऊंगा जहां से इसके इलाज के लिए कोई व्यवस्था की जा सके।’

नरेश ने तमतमाये चेहरे के साथ उसका बैग थामते हुए कहा, ' अरे, यह आदमी नहीं बचेगा और तू तो पकड़ा ही जायेगा, मुझे भी मरवायेगा।’

नरेश ने रेनकोट के ऊपर से ही सूरज का बैग लाद लिया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह सूरज को कैसे समझाये कि वह बेवकूफी कर रहा है। उसकी योजना में सूरज का किसी तरह से नुकसान शामिल नहीं था। चचेरा ही सही, वह तो उसका भाई है। वह कभी घर से इतनी दूर के लिए नहीं निकला। अब वह भला अकेले केदारधाम कैसे पहुंच सकता है ! मां, काका और काकी का फोन आ गया तो वह क्या जवाब देगा। वह मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगा, ' हे भगवान ! यह आदमी मर जाये और सूरज को सद्बुद्धि आ जाये।’

हड़हड़-हड़हड़, भड़भड़-भड़ास !

गंदे पानी का रेला घुटनों के ऊपर से होकर बहने लगा। मूसलाधार बारिश का पानी सिर पर गिरकर चेहरे से होकर बहने लगा। उसने आंखें मिचमिचाकर सूरज की ओर देखा। सूरज उस आदमी को अपनी दोनों बाहों में भरकर कंधे पर लादने की कोशिश कर रहा था।

नरेश मन ही मन भगवान को पुकारने लगा। अब उसका मन पानी में बह जाने के डर की आहट देने लगा था। यह जगह तो ढलान में है और यहां से आगे तो ढलान और ज्यादा है। लगता है चारों तरफ से पानी बहकर इधर ही आ रहा है और अगर पानी का बहाव और तेज हो गया तो संभलना बहुत मुश्किल हो जायेगा। आसमान की ओर आंखें उठाना संभव नहीं हो पा रहा था लेकिन पानी काफी देर तक होने का संकेत दे रहा था। उसे कीचड़ में बहने से बचने के लिए कुछ करना होगा। उसने सूरज की ओर देखा। सूरज उस आदमी को कंधे पर लादे बहते पानी के बीच चढ़ाई की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहा था।

क्या करुं-क्या करुं ..... सूरज भांड़ में जाये ...... पता नहीं अब क्या होगा .... सोचते हुए नरेश के मन में ख्याल आया, क्यों न दोनों बैगों के साथ किसी ऐसे पेड़ पर चढ़ जाये जहां वह सुरक्षित रह सके। सूरज को भी वहीं उठा लेगा। लेकिन क्या सूरज उस आदमी को छोड़कर उसके साथ आयेगा ? नहीं आयेगा तो नहीं आयेगा। बारिश बंद हो जायेगी और कीचड़ बहकर निकल जायेगा तो वह उतरकर केदारधाम चला जायेगा। पचास लाख रुपए तक का माल तो होगा ही उसके पास। बाद में वह सूरज को उसका हिस्सा दे देगा।

उसे पास ही एक मोटा-घना पेड़ नज़र आया। वह जानता है कि पहाड़ पर बड़े और मोटे पेड़ नहीं के बराबर या कम होते हैं मगर घाटियों में होते हैं। मूसलाधार बारिश के कारण समझ में नहीं आ रहा था कि वह कौन-सा पेड़ है। उसने सूरज की ओर देखा। सूरज उस आदमी को कंधे पर लादे अपने डंडे के सहारे चढ़ाई की ओर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा था। नरेश ने चिल्लाकर कहा, ' सूरज, अरे मौसम खराब हो रहा है। उस आदमी को लेकर यहीं आ जा। पानी थोड़ी देर में बंद हो जायेगा तो देखा जायेगा।’

हड़हड़-खरखर-हड़हड़-खरखर!

पेड़ों के चारों तरफ से होकर बहने वाला पानी और कीचड़ शोर पैदा करने लगा था। नरेश पेड़ तक पहुंचा और दोनों बैगों को पांच-छह फुट की ऊंचाई पर पेड़ की मोटी डालियों पर अटकाकर रख दिया। उसे चिंता भी हो रही थी कि बैग गिर न पड़े। अगर ऐसा होता है और बैग पानी में बह गये तो सारी मेहनत पर पानी फिर जायेगा। उसने पेड़ की डालियों को ठीक तरह से परख लिया कि वहां से बैग नीचे नहीं गिरेंगे तो खुद भी पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करने लगा।

पेड़ थपथप भीगा मगर मजबूत लग रहा था। वह भी घुटनों से ऊपर तक कीचड़ में लिथड़ा हुआ था। पांव बार-बार फिसल रहे थे और पेड़ पर चढ़ने में दिक्कत हो रही थी। आखिर किसी तरह वह पांच-छह फुट की ऊंचाई पर उन डालियों तक जा पहुंचा। पेड़ घना था और उस डाल से निकली हुई कई डालें आसपास इस तरह थीं कि उन पर छोटा-मोटा सामान अच्छी तरह रखा जा सकता था। उसने बैगों के फीतों को आपस में बांधकर उसे इस तरह रख दिया कि अगर बैग फिसलते भी हैं तो फीते आपस में बंधे रहने के कारण पेड़ की डालियों में ही अटककर रह जायेंगे। अब उन्हें गिरने का कोई खतरा नहीं है। आश्वस्त होते ही वह खुद भी इत्मीनान से डालियों पर बैठ गया और नीचे बहते कीचड़ की ओर देखने लगा। बहते पानी की ऊंचाई बढ़ गयी थी। उधर देखते ही उसकी आत्मा तक कांप उठी।

' भैया ..... बचाओ .... ’

वह चौंक पड़ा। अरे तो सूरज की आवाज है। आवाज धीमी मगर घबराहट भरी थी। वह तुरंत आवाज की दिशा की ओर देखने लगा। बारिश की फुहारों के बीच उसने देखा, सूरज बहते पानी में गिर पड़ा था और पानी का तेज बहाव उसे तथा घायल आदमी को एक साथ बहाये लिये जा रहा था। नरेश घबरा उठा। अरे, उस तरफ तो ढलान है। हे भगवान सूरज की रक्षा करना।

सूरज उसकी ओर असहाय-सा निहारता अपने को उठकर बचाने की कोशिश में बहता जा रहा था। नरेश ने तुरंत कदम उठाये कि पह पेड़ से उतरे मगर ठिठक गया। नहीं, वह सूरज को बचाने गया तो खुद भी बह जायेगा। उसने सूरज को लाख समझाया था मगर उसने उसकी एक नहीं सुनी थी। वह घायल आदमी भी बहते कीचड़ में पता नहीं कहां गुम हो गया था। शायद सूरज के कंधे से गिरकर कीचड़ में डूब गया हो। वह भी सूरज की ओर असहाय-सा निहारे जा रहा था। सूरज अपने हाथ-पांव चलाता हुआ कीचड़ में फिसलता बहता जा रहा था। वह समझ गया कि उसे अब सूरज की आस छोड़ देनी चाहिये। जान है तो जहान है।

' भै ....य्या, ’ और उसकी आंखों के सामने सूरज कीचड़ में गुम हो गया।

उसने धीरे से अपनी आंखें बंद कर लीं। पलकों के कोर से आंसू बह निकले जो बरसात के पानी के साथ मिलकर एकाकार होने लगे थे। पलभर में सूरज के साथ घर से निकलने से लेकर अब तक की घटनाएं बंद पलकों के भीतर सजीव होने लगीं। उसने तड़पकर आंखें खोलीं। बैग की ओर निहारा, बैग सुरक्षित थे मगर उनके ऊपर एक काला करैत बैठा उसकी ओर निहारता झूम रहा था।

' अ ..... अ ...... अ ..... अरे यह ....... कहां से आ गया ..... सूरज ..... ’ हकलाहट के साथ उसकी आवाज हलक के भीतर ही घुटकर रह गयी। बदन थरथर कांपने लगा। अपलक करैत की ओर निहारते हुए उसे लगा, करैत अब न तब उसकी ओर लपककर उसे डस लेगा। दोनों बैगों को लपेटकर करैत उन पर बैठा उसकी ओर निहारता झूम रहा था। उसे लगा, करैत उससे कह रहा हो कि बेटा अब बचकर कहां जाओगे।

डंडा ...... उसे तुरंत ख्याल आया कि उसके दाहिने हाथ में मजबूत डंडा है लेकिन शरीर की ताकत करैत को देखकर पैंट के भीतर से बहने लगी थी। डंडा उसके हाथ से फिसलकर नीचे कीचड़ में गिर पड़ा। छपाक !

आवाज के साथ ही करैत उसकी ओर निहारकर फुंफकार उठा। उसकी चिरी जीभ लपलपाने लगी थी। नरेश को लगा कि पेड़ से उसकी पकड़ कमजोर पड़ने लगी है। वह धीरे-धीरे नीचे सरक रहा है। एक तरफ कुआँ तो दूसरी तरफ खाई। उसकी आंखों में आंसू आ गये। उसका पाप अब उसके सामने काल बना उपस्थित है। इसके साथ ही उसके मन में ख्याल आया, उसकी जान बच गयी तो लाशों को लूटने के अपने पापों का प्रायश्चित करेगा। मगर इन दो बैगों में लाखों का माल वह कैसे छोड़ दे। और बैगों के ऊपर उसकी मौत उसकी ओर निहारकर फुंफकार रही है। अब भगवान केदारेश्वर ही उसकी रक्षा कर सकते हैं। वह अपने अंदर के साहस के साथ जोर से पुकार उठा, ' हे भगवान केदारेश्वर ....... हे धारी देवी ....... हे गंगा मइया ....... मेरी रक्षा करो।’

उसकी आवाज पर करैत उसकी ओर लपका। डर से उसके हाथ-पांव सुन्न हो गये और वह फिसलता हुआ तेजी से नीचे कीचड़ में गिर पड़ा। गुडुप .... ! उसने अपने शरीर की पूरी ताकत लगाकर बाहर आना चाहा और कीचड़ से सिर बाहर निकालते ही उसने देखा, कीचड़ के तेज बहाव में वह बहता जा रहा है ...... पेड़ पीछे छूटता जा रहा है .... जान बचाने की कोशिश में उसका शरीर कीचड़ के भीतर पेड़ की टूटी डालियों-पत्थरों से टकारकर चकनाचूर होता जा रहा है ..... उसकी चेतना लुप्त होती जा रही है।

गुडुप .........! ढलान की ओर बहते पानी में नरेश भी गुम हो चुका था।

---------------------------------------------------------------------

विजय शंकर विकुज

द्वारा - देवाशीष चटर्जी

ईस्माइल (पश्चिम), आर. के. राय रोड

बरफकल, कोड़ा पाड़ा हनुमान मंदिर के निकट

आसनसोल - 713301

ई-मेल - bbikuj@gmail.com

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रचनाकार: कहानी - ऑपरेशन प्रलय - विजय शंकर विकुज
कहानी - ऑपरेशन प्रलय - विजय शंकर विकुज
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