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शांति और प्रगति में इस्लाम का योगदान - मनजीत सिंह

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आदम मन और हाव्वा- सप्तसिखा अथवा प्राचीन काल से लेकर आखिरी कल्कि अवतार हजरत मोहम्मद सल्लाहूअसलम तक, धरती के हर कोने मैं करीब एक लाख चौबीस हजा...


आदम मन और हाव्वा- सप्तसिखा अथवा प्राचीन काल से लेकर आखिरी कल्कि अवतार हजरत मोहम्मद सल्लाहूअसलम तक, धरती के हर कोने मैं करीब एक लाख चौबीस हजार अवतार/सन्देशवाहक ईश्वर ने अपने सन्देश इस्लाम को पंहुचाने के लिए भेजा है। अंततः ईश्वर ने सभी संदेशवाहकों के सन्देश को संकलित कर के कुरान के रूप में पेश किया और इसके ऊपर जो अमल करेगा वह कामयाब हो जाएगा। एक शायर ने इन्सानों की पीडा को अपने कविता/गजल के अन्दर कलमबद्ध किया है। मेरी बात भी इन सब बातों तक सीमित रहेगी और उस पीडा को या मर्ज को दूर करने के विधि / निजाते तर्ज को बताया है, जिससे धरती पर शान्ति और प्रगति मिली और अनंत काल तक मिलती रहेगी।

दुनिया का मर्ज , इस्लाम का निजाते तर्ज

मर्ज बीमारी न. 1 ये महलों, ये तख्तों, ताजों की दुनिया, 2. ये इन्सान दुश्मन, समाजों की दुनिया, 3. ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया

1. इंसान इंसान का भाई है क्योंकि सब एक बाप आदम या हाव्वा के औलाद है। धर्म के आधार पर किसी को कत्ल, अन्याय या जुल्म ज्यादती नहीं कर सकता है। हमेशा एक दूसरे के लिए भलाई और विकास के बारे मे सोचना चाहिए जो दूसरों के ऊपर रहम नहीं करता अल्लाह उसके ऊपर रहम नहीं करता इंसान के लिए अल्लाह ने दो हक पूरा करने के लिए हुक्म दिया है। पहला हक अल्लाह का है। जो बन्दा इबादत और उसके द्वारा बताए गए कामों का कर के अल्लाह का हक पूरा करता है। दूसरा हक इंसानों का है। जो इंसानों के हक, उसके जान माल की सुरक्षा, उसके भलाई कि लिए अपने तन मान और धन खर्च करना आदि को पूरा करके अपने जन्नत को पक्का करता है। इस इस्लाम इंसानों को दुश्मनी नहीं बल्कि दोस्ती का पाठ सिखाता है। और ऐसे समाज को मान्यता नहीं देता जो जुल्म, ज्यादती और भ्रष्टाचार पर आधारित हो।

2. इस्लाम मानव को यह पाठ भी पढाता है कि कोई मानव, मानव के ऊपर राजा, बादशाह या सुल्तान बन कर शासन नहीं कर सकता है हां अल्लाह का राजदूत या खलीफा बनकर समाज के भलाई के लिए उसके बताए गई विधि को लागू करना समाज में व्याप्त दुख, अशांति के स्त्रोत जैसे अन्याय भ्रष्टाचार कालाबाजारी चोरी हठकर्मी रिश्वतखोरी इत्यादि का सफाया करे और प्रगति के संसाधन है उसका इस्तेमाल करें वह हठकर्मी से राजदूत के चुनाव में सब अनपढ, जाहिल, गवार बच्चों को चुनने का हक नहीं है जबकि हिन्दुस्तान द्वारा अपनाई गई जनतन्त्र में जाहिल और भ्रष्टाचार में लिप्त जनता, कुछ को छोड़कर बुरे संचालन कर्ता चुन लेती है।

3. इस्लाम में अमीर और गरीब को कम करने के लिए जकात और जजिया सिस्टम दिया है। अगर मुस्लिम है तो समाज के प्रगति जैसे होस्पीटल, सुरक्षा, न्याय, शिक्षा, सड़क आदि के लिए 2.5 प्रतिशत टैक्स के तौर पर जकात माल अपने माल को दें। और गैर मुस्लिम है तो उचित मात्रा में टैक्स के तौर पर जजिया अपने माल में से दें। समाज के अन्दर इस्लामिक सिद्धान्तों पर आधारित एक ऐसा समाज बनाए जिससे वे स्त्री पुरूष बूढे बच्चे को तकलीफ ना हों।

मर्ज बीमारी न. 2 1. हर एक जिस्म घायल हर एक रूह प्यासी, 2. निगाहों में उलझन दिलों में उदासी, 3. ये दुनिया है या आग के बाद हवानी

4.दुनिया अगर आग के तरह जला रही है तो दुनिया में इस्लाम के बातों को लागू करने या सिर्फ दुनिया के आग से बल्कि आखिर के लोग से छुटकारा मिल सकता है मगर हम सोने खाने बैठने पीने और लेन देन करने का तरीका इस्लामी हो जाए तो दुनिया का हर आदमी एक दूसरे के लिए आग का गोला बनकर बदहवास करने के बजाए ठंडक पहुंचायेगा। संयुक्त राष्ट्र मैं सह अस्तित्व और शांति के जो नियम बनाए गए है उसमें 10 से 15 प्रतिशत तक इस्लाम के लिए गए है। और नेक नियति से अगर अब तक लागू किया गया होता तो दुनिया के अन्दर शांति और प्रगति का लाभ मिलता ना सिर्फ बडे देशों को बल्कि छोटे देशों कों भी आज अमीरी और गरीबी का फर्क है जिसके वजह से अमीर अमीर और गरीब गरीब हो जा रहा है , से दुनिया छुटकारा चाहती है। तो इस्लाम के लेन देन के जो सामाजिक नियम है उसको लागू करने होंगे ब्याज रहित और 2.5 प्रतिशत जकात इत्यादि उसी तरह शक्तिशाली हो या मजबूर सबको न्याय हो बिना उसके धर्म और जाति-पांति देखे तो आज का समाज आइना कुछ और होता वरना तो आज पूरी दुनिया में आतंकवाद, जुल्म के दास्तां बढती जा रही है। सिर्फ और सिर्फ इस्लाम के सिद्धांतों पर ना चल के और अपने इच्छा से और मनमानी से जिन्दगी गुजारने के वजह से यह हालात जहां राष्ट्र के लेवल पर या अन्तराष्ट्रीय लेवल पर हर जगह अपने मनमानी नियम बनाकर और अल्लाह द्वारा भेजे गए बातों को छोडने की वजह से यह सब हाल है।

5. जिसको भी सांसारिक सुख के साथ आध्यात्मिक सुख चाहिए तो 24 घन्टे इबादत करनी पडेगी इस्लाम में इबादत सिर्फ नमाज रोजा का नाम नहीं है। वो सारे काम जिससे अल्लाह और उसके बनाए इंसान खुश होते है। इबादत कहलाती है। जब नमाज के वक्त नमाज पढ़ लें और इससे फुरसत मिल गयी तो दाना पानी को ढूंढने धरती पर फेल जाए। जिसका दुकान का काम है वह दुकान पर जाएं। जिसका खेत में काम है वो खेत में जाएं। जिसका कोई ओर कारोबार है वह अपने कारोबार पर जाएं। ताकि अल्लाह का दिया हुआ रिजक अर्थात जिन्दगी जीने के जरूरी सामान हासिल कर सके। दूसरे मजहबों में हर काम इबादत नहीं होती बल्कि इबादत करने के लिए एक विशेष समय व जगह होता है। उसके बाद वह दुनिया के कामों में लग जाता है। जिसको इबादत नहीं माना जाता है। इस्लाम में सोना, जागना, सफाई करना, किसी के काम आना, रास्ते से कांटा निकालना, भूखे को खाना देना इत्यादि सब इबादत है। यहां 24 घन्टा इबादत चलता है। हर इंसान का जिस्म घायल ना होकर खुश होता है तो रूह को सुकून मिलता है।

6 इंसान अपनी निगाहों की रक्षा अजनबी मर्द और औरत या गैर मोहराम से करता है तो इस्लाम में हर अंग से बलत्कार होता है। अगर कोई आंखों से या निगाहों से किसी पराई या अजनबी गैर मोहराम मर्द को या औरत को देखता है या देखती है और इस तरह देख देख कर घूर कर अपने ख्यालों में उस लड़का या लड़की के बलात्कार करने को सोच रहा है तो वह अल्लाह की नजर में गुनाह कर लिया भले ही उसने उस मर्द या औरत के जिस्म पर चढ़कर बलात्कार नहीं किया हो इसी तरह इंसान निगाह से फिर छूकर फिर पकड़कर और आखिर में लेटकर अंततः बलात्कार करता है तो इस तरह किसी जिस्म पर चढ़कर कि बलात्कार करने से पहले उसने आंखों से, हाथों से, दिमाग से, कई बार बलात्कार करने का गुनाह कर लेता है। मर्द और औरत के बीच हिजाब का सिस्टम डाल के यही चाहा जाता है कि बलात्कार यहां जन्म से , निगाह या आंख से मर्द और औरत के बीच के उभार को देख कर, लेता है उससे आरम्भिक स्टैज में रोक दिया जाए।

अल्लाह जब दुख देता है जो उसको यह समझकर बर्दाश्त करना चाहिए कि कोई पाप हो गया होगा और उसका प्रायश्चित है और दूसरा यह है कि दुख काटने से जन्नत मैं दर्जा बुलन्द होगा। साथ में अपनी गलती ओैर कोताहियों पर भी नजर होनी चाहिए कि कही अल्लाह इन सब से नाराज होकर दुख तो नहीं भेज रहा अस तरह जब अल्लाह के तरफ से सुख आए तो उस का शुक्र अदा करना चाहिए ताकि और सुख मैं बढोतरी हो और सुख के दौरान ऐसे कोई गलत काम जैसे शराब पीना, जुल्म करना इत्यादि ना हो जिससे देख के बादल अल्लाह भेज दे। अगर सुख में रखकर अच्छे काम करेगें तो दुख से दूर रहेंगे इस तरह दुख हो या सुख हो दोनों में इंसान सुकून से रहता है। दिलों में मायूसी नहीं आती और यही वजह है दूसरे महजबों में आत्महत्या ज्यादा होती है क्योंकि वहां इस तरह के दिलों को सुकून देने वाले कोई नियम या कानून नहीं है। न ही काई ऐसी बात करता है।

इस्लाम और विज्ञान

विज्ञान पर इस्लाम के सन्दर्भ में मुस्लिम विद्वानों ने दृष्टिकोण की स्पेक्ट्रम या पहुंच का विकास किया है। कुरआन मुसलमानों को प्रकृति के अध्ययन करने और सच्चाई की जांच करने के लिए प्रोत्साहित करता है। कुछ वैज्ञानिक घटनाओं के बारे में जिन की बाद में वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा पुष्टि की गई उदाहरण के लिए भ्रूण की संरचना, हमारे मंडल और ब्रह्मांड के निर्माण का सम्बंध आदि की जानकारी कुरआन में पहले से ही मौजूद है।

मुसलमान अक्सर सूरा अल बकरा से आयात 239 का हवाला देते हैं कि उसने तुम्हें वह सब सिखाया जो तुम नहीं जानते थे। उनके विचारों के समर्थन में उन्हें बताने के लिए कि कुरआन नए ज्ञान को बढावा देता है। कुछ मुस्लिम लेखकों के लिए विज्ञान का अध्ययन तौहिद से उत्पन्न हुआ है। बहुत सी स्थितिओं में, कुरआन ने, विज्ञान का प्रभावशाली रूप में उल्लेख किया और विज्ञान जानने के लिए मुसलमानों के लिए प्रोत्साहित किया चाहे प्रकृति हो या साहित्य हो।

मध्यकालीन मुस्लिम सभ्यता के वैज्ञानिकों का आधुनिक विज्ञान के कई क्षेत्रो में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस तथ्य को आज मुस्लिम दुनिया में गौरव समझा जाता है। उसी समय में जब मुस्लिम देशों के हिस्सों में विज्ञान शिक्षा की कमी के बारे में मामले को खूब उठाया था।

यह व्यापक रूप से मान्य किया गया कि कुरआन में लगभग 750 आयात प्राकृतिक घटनाओं का जिक्र होता है। यह सबसे अहम है।

--

मनजीत सिंह पुत्र श्री भूप सिंह

गांव भावड तह. गोहाना सोनीपत-131302

एम. ए. उर्दू पंजाबी, वश्वविद्यालय पटियाला, ंपजाब

अनुक्रमांक- 18291101

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रचनाकार: शांति और प्रगति में इस्लाम का योगदान - मनजीत सिंह
शांति और प्रगति में इस्लाम का योगदान - मनजीत सिंह
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