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आलेख - विजय शंकर विकुज - शिल्पांचल के कथा साहित्य का इतिहास

शिल्पांचल के साहित्य और संस्कृति की अपनी एक परंपरा और धारा प्रवाहित होती रही है चाहे वह कहानी के क्षेत्र में हो या कविता के, आलोचना के या अन्य किसी विधा के। हिन्दी कहानी की ही बात की जाये तो इसका फलक ही इतना विशाल है कि उस पर कुछ पन्नों में पूर्ण रूप से कह पाना संभव नहीं है। यहां यह भी कहा जा सकता है कि भारतीय हिन्दी कथा साहित्य भी बंगाल के शिल्पांचल के हिन्दी कथा साहित्य के बगैर अधूरा है और इसे यह गौरव यहां के कथाकारों ने दिलाया है जिनमें सर्वोपरि संजीव का नाम बेहिचक लिया जा सकता है। गर्व की बात यह है कि इस क्षेत्र के जितने भी कथाकार हैं, सभी राष्ट्रीय स्तर के कथाकार हैं और जिनकी कहानियों में वे सारे तत्व उपस्थित हैं जो कहानी विधा के लिए जरूरी हैं।

आज हम शिल्पांचल के जिस समय को जी रहे हैं, जिस जमीन पर खड़े हैं, उसे बौद्धिक रूप से उर्वर यहां के साहित्यकारों ने बनाया है। कुल्टी, आसनसोल, रानीगंज, अंडाल और दुर्गापुर जैसे छोटे-बड़े शहरों तथा निकटतम उपनगरियों व गांवों को मिलाकर ही आम तौर पर शिल्पांचल जाना जाता है। इस क्षेत्र में अन्य साहित्यकारों में गौतम सान्याल, मृत्युंजय तिवारी, महावीर राजी, सृंजय, रवि शंकर सिंह, गोविन्द प्रिय, आनन्द बहादुर, शिव कुमार यादव, विजय शंकर विकुज, सुभाष रंजन, दिनेश कुमार सहित अन्य अनेक नाम हैं। ये लोग विशेष रूप से कथा लेखन के लिए चर्चित रहे हैं। वहीं शिल्पांचल में कवियों, व्यंग्यकारों, हिन्दी के शायरों, आलोचकों की भी एक लंबी फेहरिस्त है लेकिन यह आलेख कथाकारों पर आधारित है इसलिए इसे एक सीमित दायरा देना ही ठीक होगा।

पहली पीढ़ी के कथाकार : शिल्पांचल में हिन्दी के प्रथम कहानीकार के बारे में इतना ही स्पष्ट हो पाया है कि आसनसोल बाजार में कोई बर्णवालजी थे जिनकी कहानियां सारिका तथा तत्कालीन अन्य कई स्तरीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। उस समय उनकी कहानियों की चर्चा काफी हुई है लेकिन बाद में वे कहां चले गये या उनकी रचनाओं का क्या हुआ, इसके बारे काफी खोज करने के बाद भी जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाई है। उसके बाद आते हैं मिलिन्द कश्यप जो बंगाल के सीमांत क्षेत्र झारखंड के चिरकुंडा में रहते थे और एक स्कूल के अध्यापक थे। वे एक अच्छे कहानीकार और कवि थे। उन्होंने कई उपन्यास भी लिखे हैं। संजीवजी के अनुसार भाषा पर उनकी पकड़ काफी अच्छी थी कि और वे रचनाओं में विम्ब-प्रतीक का बड़ा ही सटीक प्रयोग करते थे। हालांकि वे बंगाल की सीमा से संलग्न झारखंड में रहते थे लेकिन शिल्पांचल के साहित्यिक कार्यक्रमों में समर्पित रूप से उपस्थित होते थे। यहां के कहानीकारों व कवियों के साथ उनकी आत्मीयता इतनी अधिक थी उन्हें शिल्पांचल का ही अंग समझा जाता रहा है।

दूसरी पीढ़ी के कथाकार : इस पीढ़ी में डॉ. सुवास कुमार, संजीव और गौतम सान्याल के नाम प्रमुख रूप से आते हैं। डॉ. सुवास कुमार आसनसोल के बीबी कॉलेज के हिन्दी के भूतपूर्व अध्यापक थे। उनका निधन पिछले 5 अप्रैल 2018 को पटना स्थित उनका मकान में 69 वर्ष की उम्र में हो गया। संजीव से पहले 70 के दशक में वे प्रमुख कथाकार के रूप में जाने जाते थे। 80 के दशक में उस जमाने की प्रसिद्ध पत्रिका रविवार में उनकी एक चर्चित कहानी यहां एक नदी थी प्रकाशित हुई थी। वे आसनसोल से बर्दवान विश्वविद्यालय होते हुए लगभग 10-12 वर्ष पूर्व तक हैदराबाद में थे। अच्छा कहानीकार होने के बावजूद वे बाद में आलोचना विधा की ओर मुड़ गये थे। उन्होंने कुछ अनुवाद भी किये। बांग्ला भाषा पर उनका अधिकार बंगालियों की तरह था। उनकी कुछ किताबें मध्यकालीन फैंटसी, सूरदास और चंडीदास का काव्य, हिंदी कविता : आत्मनिर्वासन और अकेलेपन का संदर्भ, आचंलिकता, यथार्थवाद और फणीश्वरनाथ रेणु (समीक्षा), अन्य रस तथा अन्य कहानियां (कहानी संकलन), कविता में आदमी (कविता संकलन), साहित्यिक समझ, विवेक तथा प्रतिबद्धता (आलोचना), हिंदी : विविध व्यवहारों की भाषा, आधुनिक बांग्ला कविता (अनुवाद), फणीश्वरनाथ रेणु संचयिता, वेस्टइंडीज का साहित्य, यहां एक नदी थी उल्लेखनीय हैं।

इनके बाद आता है संजीव का नाम जिनके बारे में कुछ कहना सूरज को दीपक दिखाने के समान है। संजीव ने अब तक लगभग 300 कहानियां लिखी हैं और कई उपन्यास। उनकी हर रचना एक शोध और अभिनव प्रयोग है। उनकी चर्चित कहानियों में किनका नाम छोड़ दिया जाये, यह बहुत ही कठिन है। दुनिया की सबसे हसीन औरत, मकतल, चिरबेनी का तड़बन्ना, ऑपरेशन जोनाकी, घर चलो दुलारी बाई, अपराध, सागर सीमांत, लिटरेचर, कन्फेशन, खोज उनकी कुछ कहनियां हैं तो सावधान नीचे आग, धार, सर्कस लोकप्रिय उपन्यास हैं। संजीव ने विभिन्न विषयों पर आलेख भी लिखे हैं तो कविताओं से भी उनका अगाध लगाव रहा है। संजीव की कहानियों के विभिन्न देशी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उनकी कई कहानियों का नाट्य रूपांतरण भी हुआ है। हम जिस शिल्पांचल के हिन्दी कथा साहित्य की बात करते हैं, उस जमीन को उर्वर बनाने और नये लेखकों का मार्गदर्शन करने में संजीव की बहुत बड़ी भूमिका रही है। बहरहाल संजीव कुछ सालों पहले कुल्टी के इस्को कारखाने से अवकाश ग्रहण करने के बाद दिल्ली चले गये तो अब दिल्लीवासी ही बन कर रह गये हैं लेकिन वहां भी उनकी लेखनी की धार उसी पहले वाली रफ्तार से प्रवाहित हो रही है। वे एक ऐसे रचनाकार हैं जिनकी कोई रचना कहीं प्रकाशित होती है तो लोगों को यह आस रहती है कि उन्होंने क्या नया शोध किया है। उनकी हर रचना एक शोध है।

गौतम सान्याल एक अच्छे कहानीकार, व्यंग्यकार और आलोचक हैं। सारिका में प्रकाशित उनकी कहानी 'तुम्हारे बाद सौमित्र दा' काफी चर्चित हुई थी। इसके अलावा उन्होंने और भी कई कहानियां लिखी, व्यंग्य व कविताएं लिखी और बाद में आलोचना की ओर मुड़ गये। उनका एक आलेख 'हिन्दी साहित्य में अनुपस्थित' की भी काफी चर्चा हुई है। उन्होंने वर्ष 2017 में हंस के अपराध, रहस्य वार्ता अंक का अतिथि संपादन किया है। इसके अलावा वे और भी कई पत्रिकाओं के साथ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े रहे हैं। कहानियों की बारीकियों को पकड़ने में वे काफी माहिर हैं।

तीसरी पीढ़ी के कथाकार : इस पीढ़ी में शिल्पांचल के बहुत सारी कहानीकार आते हैं जिन्होंने हिन्दी कथा साहित्य में शिल्पांचल की एक अलग ही पहचान बनाई है। मृत्युंजय तिवारी तीसरी पीढ़ी के महत्वपूर्ण कथाकार हैं। उनकी कहानियों में 'एक टुकड़ा अरमान' से लेकर 'गांव अभी तक मरा नहीं है' समाज के एक संदेश देती कहानियां हैं। वर्ष 1984 में उनकी कहानी 'विकलांग' को सारिका द्वारा पुरस्कृत किया गया था। अभी हाल-फिलहाल हंस में उनकी कहानी 'दोराहा-चौराहा' की खासी चर्चा हुई है। जीवन की विडम्बनाओं के कारण उन्हें रानीगंज से असम तक भटकना पड़ा जिस दौरान उनका लेखन स्थगित रहा। वहीं दुर्गापुर वापस लौटने पर वे लेखन के क्षेत्र में फिर से सक्रिय हुए और पिछले 7-8 सालों में उन्होंने कई अच्छी कहानियां हिन्दी कहानी के पाठकों को दी। वहीं इन दिनों में दुर्गापुर छोड़कर बिहार के बक्सर जिला के अपने गांव में इन दिनों लेखन में सक्रिय हैं।

ऐसे कथाकारों में महावीर राजी एक ऐसे कथाकार हैं जिन्होंने 90 के दशक में लेखन आरंभ किया। उनकी पहली कहानी मुक्ता में छपी थी। 'वर्तमान साहित्य' में पुरस्कृत 'सूखा' कहानी को वे अपनी पहली साहित्यिक कहानी मानते हैं। उनकी कहानियां हंस, कथादेश, पाखी, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, शुक्रवार सहित देश की विभिन्न स्तरीय पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। उनकी 'उल्टी' कहानी काफी पहले हंस में छपी थी जिसकी खासी चर्चा हुई थी। मावनीय जीवन के कड़वे यथार्थ को संवेदनशील रूप से उन्होंने अपनी कहानियों में शामिल किया है। उनकी कोशिश हमेशा यही रही है कि किसानों, मजदूरों, दलितों पर अपनी कलम उठायें।

सृंजय शिल्पांचल में कथाकारों में अपनी एक अलग ही पहचान रखते हैं। सृंजय की पहली कहानी 'बैल बधिया' काफी पहले 'जन संस्कृति' नामक पत्रिका में आई थी। हंस में छपी उनकी कहानी 'कामरेड का कोट' काफी चर्चित रही है। इस कहानी ने देश भर में कहानी को लेकर एक नई चर्चा छेड़ी थी। उनकी पहली रचना एक लघुकथा थी जो 1982 में छपी थी। इसके बाद उन्होंने कहानियों का लेखन शुरू किया। भगदत्त का हाथी, बुद्धिभोजी, खल्ली छुलाई सहित और भी कई कहानियां लिखीं जो काफी चर्चित रही हैं। वहीं पिछले लगभग 20 सालों से उनका लेखन ठहर गया है लेकिन उनकी एक खास विशेषता यह है कि साहित्यिक गोष्ठियों में जाते हैं और कथा विधा पर चर्चा भी करते हैं। इसके अलावा उन्होंने विभिन्न विषयों पर आलेख भी लिखे हैं।

रविशंकर सिंह एक अच्छे लघुकथा लेखक और कहानीकार हैं। हंस में आई उनकी कहानी अखाड़ा की काफी चर्चा रही है। उनकी कहानियां हंस, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, जनसत्ता, अक्षर पर्व, संवेद, अलाव, प्रगतिशील वसुधा, कथाविंब, अंग चम्पा जैसी स्तरीय पत्रिकाओं में आ चुकी हैं। इसके अलावा उन्होंने कविताएं एवं कई शोधपरक आलेख भी लिखे हैं। उनकी कहानियां मुंबई से प्रकाशित कथाबिंब पत्रिका सहित अन्य कई पत्रिकाओं द्वारा पुरस्कृत भी हुई हैं। उन्होंने संजीव की कहानियों पर शोध भी किया है। वे समानान्तर रूप से कहानी व लघुकथा लेखन में सक्रिय हैं। वे भागलपुर ने निकलने वाली अंग चम्पा के संपादन से भी जुड़े हुए हैं।

शिल्पांचल के कथाकारों में गोविन्द प्रिय अपनी एक विशेष पहचान रखते हैं। उनकी कहानी 'रूमाल का सच' वर्तमान साहित्य में वर्ष 1991 में पुरस्कृत हुई थी। उनकी दो कहानियों का नाट्य रूपांतरण हुआ है तो कई कहानियों का पंजाबी, उर्दू व बांग्ला भाषा में अनुवाद भी हुआ है। उनका एक कहानी संग्रह भी 'लुप्त होती हुई प्रजाति' प्रकाशित हो चुका है। हालांकि वे व्यवसाय से जुड़े हुए हैं लेकिन कहानी लेखन क्षेत्र में समानान्तर रूप से सक्रिय हैं। उनकी कहानियों के बारे में संजीव का कहना है कि गोविन्द प्रिय की कहानियां सामाजिक विमर्श की कहानियां हैं जिनसे गुजरना एक रोचक अनुभव है।

शिव कुमार यादव की कहानियां अपनी अलग ही पहचान रखती हैं। वे भी लगभग 30 सालों से निरंतर कथा लेखन से जुड़े हुए हैं। उनकी अनेक कहानियां देश की विभिन्न पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। उनकी हवा, जायें तो जायें कहां हम, राम अवतार की भैंस काफी चर्चित कहानियां हैं। उनकी कहानियों का बांग्ला, मराठी, कन्नड़ तथा पंजाबी भाषा में अनुवाद हो चुका है। इस दौरान उनके तीन कहानी संग्रह हवा, काले फूल का प्रेम और राम अवतार की भैंस प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा वे साहित्यिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहते हैं।

दिनेश कुमार एक अच्छे कथाकार और कवि हैं। उनकी एक प्रकाशित कहानी 'जहाज गिरेगा' काफी अच्छी कहानी है जो आज के दौर में लोगों की अवसरवादी मानसिकता को लेकर भविष्य की तस्वीर पेश करती है। इसके अलावा उन्होंने और कई कहानियां लिखी हैं। फिलहाल वे कविता के क्षेत्र में मुड़ गये हैं और उनके दो कविता संग्रह 'जिज्ञासावाद के दौरान' और 'पानी का पेड़' प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी रचनाएं हंस, वागर्थ, वसुधा, आधारशिला, वर्तमान साहित्य, अंगचम्पा, लहक, कथाक्रम, युद्धरत आम आदमी जैसी स्तरीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी 'अवसर' कविता को 'उत्तम कविता' सम्मान मिल चुका है। वे कविता और कहानी के क्षेत्र में समानान्तर रूप से सक्रिय हैं। कथा गोष्ठियों में उनकी हिस्सेदारी सक्रिय रूप से रहती है।

सुभाष रंजन इन दिनों शिल्पांचल के उभरते हुए कथाकार हैं। हालांकि वे काफी दिनों से कहानी लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनकी कहानियां कथाबिंब, परिकथा, अक्षर पर्व, जनपथ, सर्वनाम, समय के साखी सहित अन्य कई पत्रिकाओं में आ चुकी हैं। उनकी कहानी अच्छे दिन, आपद धर्म, विरवे का काफी चर्चा हुई है। कहानी के अलावा उन्होंने आलेख तथा अन्य कई विधाओं पर भी कलम उठाया है। कहा जाये तो सुभाष रंजन शिल्पांचल की तीसरी पीढ़ी के एक महत्वपूर्ण कथाकार हैं जिनकी कहानियों में संवेदना और यथार्थ की गहराई है।

कथाकार विजय शंकर विकुज की पहली कहानी सवालिया सपने धनबाद से प्रकाशित कतार में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद दूसरी कहानी नक्शा को वर्तमान साहित्य द्वारा आयोजित कहानी एक प्रतियोगिता में सांत्वना पुरस्कार मिला। इसके बाद वे निरंतर रूप से कहानी लेखन में सक्रिय हो गये। दूसरी ओर जीवन संघर्ष के लिए उन्हें रानीगंज से कोलकाता और फिर आसनसोल तक भटकना पड़ा। उनकी एक और कहानी 'ऑपरेशन प्रलय' भी वर्ष 2013 में वर्तमान साहित्य द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में पुरस्कृत हुई है। पेश से पत्रकार लेकिन स्वभाव से साहित्यकार का कहानी लेखन जीवन की विडम्बनाओं के कारण इन दिनों धीमा पड़ गया है इसलिए अपने आपको संतोष प्रदान करने के लिए वे लघु आलेख या लघुकथाएं भी लिख लेते हैं। कुछ कविताएं भी उन्होंने लिखी हैं। उनकी लगभग चालीस कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं लेकिन अभी तक कोई कहानी संग्रह नहीं आया है।

इनके अलावा शिल्पांचल में और भी कई कहानीकार हुए हैं जिनमें डॉ. डीपी बर्णवाल, आनन्द बहादुर, सुरेश अंतर, कमलेन्दू मिश्रा, संजय भालोटिया का नाम भी लिया जा सकता है। रानीगंज टीडीबी कॉलेज के पूर्व अध्यापक डॉ. डीपी बर्णवाल की कई कहानियां धनबाद से प्रकाशित होने वाले हिन्दी दैनिक आवाज सहित अन्य कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। आनन्द बहादुर एक अच्छे कहानीकार हैं और वे भी पहले रानीगंज टीडीबी कॉलेज के अंग्रेजी के अध्यापक रहे हैं। उनकी कहानियां हंस सहित अन्य कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। सुरेश अंतर भी रानीगंज टीडीबी कॉलेज के हिन्दी के अध्यापक रह चुके हैं और उन्होंने भी कई कहानियां लिखी हैं। कमलेन्दू मिश्रा की कहानियां जनसत्ता के सबरंग पत्रिका में प्रकाशित हुई हैं। संजय भालोटिया ने भी कहानियां लिखी हैं लेकिन उनकी कोई कहानी कहीं प्रकाशित हुई है या नहीं इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाई हैं। ये सारे लोग शिल्पांचल के तीसरी पीढ़ी के कहानीकार हैं।

अब बात आती है चौथी पीढ़ी की तो पता चला है कि शिल्पांचल के कुछ युवा इन दिन कहानी लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हुए हैं जिनमें विक्रम सिंह, रामबली कहार का नाम उभर कर सामने आया है। कथाकार रविशंकर सिंह के अनुसार विक्रम सिंह की कई कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं तो संग्रह भी आ चुका है। उनकी किसी कहानी पर कोई फिल्म भी बन रही है। रामबली कहार भी इन दिनों कहानी लेखन में सक्रिय हुए हैं।

इस दौरान आसनसोल में शिल्पांचल के हिन्दी कथा साहित्य को लेकर हुए एक परिसंवाद में कहानी लेखन, रचना प्रक्रिया, लेखन के क्षेत्र में आज तकनीकी सुविधाओं को लेकर बात सामने आई है तो इस संक्रमणकाल में कई तरह की समस्याओं की बात भी सामने आई है। फिलहाल यह भी देखा जा रहा है कि भले ही दुनिया के स्वभाव, पसंद और कार्य क्षेत्र में एक बदलाव आ रहा है तो साहित्य को लेकर अभी भी लोगों में वही पहले की तरह रुची और ऊर्जा वर्तमान है। इससे एक बात तो स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि शिल्पांचल का कथा साहित्य अपने प्रगति के सोपान पर चढ़ रहा है जहां यह विश्वास जगता है कि साहित्य का जीवन काफी लंबा है।

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विजय शंकर विकुज

द्वारा - देवाशीष चटर्जी

ईस्माइल (पश्चिम), आर. के. राय रोड

बरफकल, कोड़ा पाड़ा हनुमान मंदिर के निकट

आसनसोल - 713301

ई-मेल - bbikuj@gmail.com

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