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जीवनीपरक उपन्यास ‘खंजन नयन’ का बहुमुखी अध्ययन - डॉ० चंचल बाला

जीवनीपरक उपन्यास ‘खंजन नयन’ का बहुमुखी अध्ययन

डॉ० चंचल बाला

ऐसोसिऐट प्रोफेसर हिन्दी

खालसा कॉलेज फार विमन, अमृतसर

अमृतलाल नागर हिन्दी के ख्याति-प्राप्त बहुमुखी प्रतिभा से युक्त कथाकार हैं। जीवन के असीम अनुभवों को स्वयं जीते हुए ज्यों का त्यों कलम में बांध लेना नागर जी की उल्लेख्य, किन्तु नैसर्गिक विशेषता है। इन्होंने उपन्यास, कहानी, प्रहसन, रेखाचित्र, संस्मरण सर्वेक्षण कार्य, जीवनी और व्यंग्य वार्ताएँ आदि अनेक विधाओं पर लेखनी चलाई है। परन्तु उनका उपन्यासकार स्वरूप सबसे अधिक जीवन्त और प्रभावी है। अमृतलाल नागर ने दो जीवनीपरक उपन्यास यानस का हंस' और खंजन नयन लिखें। हम यहाँ 'खंजन नयन' की जीवनीपरक उपन्यास के तत्वों के आधार पर विश्लेषण करेंगे।

'खंजन नयन' अमृतलाल नागर जी का एक जीवनीपरक उपन्यास है। इसमें उन्होंने सूरदास के जीवन के विभिन्न पक्षों के बारें लिखा है किसी भी उपन्यास को पढ़ने के बाद उसके बारे यह बताना जरुरी होता है कि लेखक के विचार जो उसने प्रस्तुत किये हैं क्या वह सत्य है या नहीं। अब इसमें यह बताना भी जरुरी है कि क्या जीवनीपरक उपन्यास के तत्व खंजन नयन' में भी घटित होते हैं कि नहीं। उनके बारे उपन्यास में इस प्रकार प्रस्तुत किया है।

लेखकीय दृष्टिकोण का प्रश्न : सहृदयता :

जीवनीपरक उपन्यास के सभी तत्वों की सफलता लेखक की सह्‌दयता और अन्तर्दृष्टि पर ही निर्भर करती है। अगर लेखक सहृदय होगा तो वह तभी नायक और नायिका की अभिरुचियों को पहचान सकता है और पाठक तक पहुँचा सकता है। नागर जी के उपन्यास में बराबर सह्‌दयता का पुट भरा हुआ है। कोई भी लेखक तभी सफल हो सकता है अगर वो अपने आप को उपन्यास के नायक की जगह रख कर लिखे और उसके सुख दुःख खुद भी महसूस करे अगर वह दुःखी हो तो लेखक को उसके साथ दुःखी होना चाहिए और अगर सुख में खुश हो तो खुश होना चाहिए। ऐसा लेखक कभी भी असफल नहीं हो सकता। इस उपन्यास में नागर जी ने ऐसा ही किया है। जब सूरदास घर छोड़ कर चले जाते हैं तो बाद में उनकी मुलाकात एक पंडित से होती है जो उनको अपने घर ले आता है और उसकी पूरी सेवा करता है उसे यंत्र तंत्र की विद्या भी देता है। नागर जी के इस प्रसंग को पढ़ने से पता चलता है कि इसमें लेखक की सहृदयता स्पष्ट होती है। जन अन्त में सूरदास बीमार हो जाते हैं। तो सभी उनके पास बैठे होते हैं कोई उनके मुंह में चरणामृत डालता है तो कोई उनके पास पड़ी वस्तुओं को उठाकर दूर रखते हैं। सूर के निधन के बाद सभी लोग शोक में क्यूं जाते हैं कोठरी सूनी लगने लगती है। महाप्रभु के आंगन द्वारा भीड़ भरे होने पर भी सूर बिना सूने-सूने से लग रहे थे। इस प्रसंग को ध्यान से देखे तो इसमें सह्‌दयता बिलकुल दिखाई देती है। आँखों से व्य-धे होने के कारण भी उनका इतना प्यार था कि जब वे सोमेश्वर दास जी से पीछा छुड़ाने की सोचते है पर मन उनकी तरफ इतना आकर्षित हो गया था कि वह उन्हें छोड़ ही नहीं सकते थे इतना हौसला ही नहीं पड़ता था कि वह दोनों एक दूसरे के बिना रह सकेंगे कि नहीं। इसमें भी सहृदयता ही नजर आती है। इस उपन्यास में नागर जी ने प्रसंग ही ऐसे दिये हैं कि चाहे कोई व्यक्ति महान् हो या साधारण एक दूसरे के प्रति सहानुभूति जरुर दिखाता है। कब सूर ने कृष्णा के माखन स्वर सुनाये तो सभी युवक और पंडित तपोधन द्विवेदी जी उनको परासौली से दूसरे जगह जाने ही नहीं देते उनका उनके प्रति इतना पूजावत् आदर भाव है कि शायद ही किसी अन्य के प्रति हो।' इन प्रसंगों में लेखक की सहदयता स्पष्ट झलकती है।

सिलसिलेवार वर्णन :

'खंजन नयन' में सभी प्रसंगों को सिलसिलेवार बताया गया है। पहले सूर के जन्म के बारे बताया है लेखक ने बेशक यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा कि सूर का जन्म इस संवत् को हुआ है पर उसने उनकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से करा दी कि जो उसे व्य-धा देखकर, उसके ज्ञान को देखकर उसकी आयु पूछने लगता है, फिर लेखक ने इसके बाद उसका जन्म स्थान बताया और बाद में उसकी शिक्षा के बारे में बताया है सभी वर्णन क्रमवार बताये हैं इसमें जरा सी भी उलझाव नहीं है। सूर के जीवन के एक वर्णन के बाद दूसरा वर्णन दिया गया है जैसे सूर ने कहाँ से शिक्षा ग्रहण की और क्या-क्या ज्ञान प्राप्त किया। इसमें सभी वर्णन किया गया है। यहाँ तक कि गुरुओं के नाम भी बताये गये हैं। एक प्रसंग दूसरे से जुड़ा हुआ मालूम होता है। इस उपन्यास में लेखक ने शहरों के नाम भी क्रमवार दिये हैं जिन-जिन में सूर ने जाकर अपना ज्ञान फैलाया और कुछ ज्ञान प्राप्त किया।

जब सूर स्वामी नाद ब्रह्मानंद के पास साहित्य ज्ञान प्राप्त करने लग तो सूर को अपने माता-पिता की याद आ गई तब वह स्वामी उसे घर छोड़ने जाता है तब पिता दूसरे पंडित सोमेश्वर पास ज्ञान प्राप्त करने के लिये भेज देते हैं। भाईयों का विरोध करने के बावजूद भी वह वहाँ शिक्षा लेने जरुर जाते हैं। इस प्रकार लेखक ने इसमें क्रमवाद वर्णन किया है इस प्रसंग को पूरा करके ही दूसरा शुरु किया है। इससे पता चलता है कि नागर जी के उपन्यास में सिलसिलेवार वर्णन हुए हैं। इसमें इतिहास के युगों का वर्णन भी क्रमवार हुआ है इसमें यह बिल्कुल साफ बताया गया है कि पहले किस राजा का राज्य था, उसके बाद उस समय किन-किन राजाओं ने राज्य किया इसका बिलकुल साफ और स्पष्ट वर्णन है।

सूरदास के जीवन में घटित, घटनाओं का भी वर्णन सिलसिलेवार हुआ है कि उसके सम्पर्क में कौन कौन से लोग आये और उसे किन-किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा। जब सूर की मुलाकात एक देहाती लड़की कैतों से होती है तो वह तब से सूर का बहुत ध्यान रखती है। वह दोनों एक गांव से दूसरे गांव जाकर भजन गाथा करते और अपनी रोटी कमा लिया करते थे। एक दिन वह दोनों पठानों के गांव में पहुंच गये वहाँ सूरदास को बहुत मारा पिटा और बैल की तरह काम पर लगा दिया जाता है और कैतों को मार डालते हैं। अगर इस प्रसंग को देखे तो पता चलता है कि एक-एक लाईन का वर्णन क्रमवार है इसमें जरा सी भी हेरफेर नहीं हुई। उपन्यास चाहे कोई भी उसमें वर्णित वर्णनों का सिलसिलेवार होना जरुरी है अगर उसमें यह गुण न हो तो उपन्यास कम ही सफल होता है। यह काम तो नागर जी जैसे सफल उपन्यासकार ही कर सकते हैं। और उन्होंने किया भी है। तभी उनको इसे लिखने में सफलता प्राप्त हुई है।

प्रसंग-चयन की समीचीनता :

खंजन नयन' में प्रसग चयन की समीचीनता पर भी प्रकाश डाला गया है। लेखक ने सिर्फ उन्हीं प्रसंगों को लिया है जिनसे सूरदास के जीवन को चित्रित किया जा सके और उन्हीं प्रसंगों को उदारता पूर्वक ग्रहण किया है जिनसे नायक के जीवन की समग्र रूपरेखा चित्रित हो सके। किसी भी घटना को बताने के लिये प्रस्तुत प्रसंग उपयोगी, रोचक होना चाहिए इसमें लेखक ने जिन-जिन प्रसंगों का प्रयोग किया है उनका सूरदास के जीवन से कोई न कोई सम्बन्ध अवश्य है। जब नाव में सिकंदर की मुलाकात, पडित सीताराम से होती तब वह कहते है कि मैं हाथरस का गौड़ ब्राह्मण डूं। परन्तु पहले तुम्हारा परिचय पाना चाहता डूं। तब ऋ कहते हैं कि मेरा जन्म गोवर्द्धन के निकट परासौली ग्राम में हुआ था। किन्तु चार वर्ष की आयु में गुरु ग्राम के पास सीही चला गया। पिता सारसवत् अपने क्षेत्र में भागवत् महाराज के नाम से विख्यात थे।

लेखक के इस प्रसंग को देने का मतलब भी यही है कि इससे सूरदास का जन्म स्थान और परिचय प्राप्त होता है लेखक ने प्रसंग चयन ही इस हिसाब से किया है। इसमें यह बात अपने आप नहीं बताई गई कि सूरदास व्य-धा था। इस बात का पता भी इस प्रसंग से करवाया है पूछते हैं कि तुम शकुन विद्या से परिचित हो तब सूरदास कहता है- मैं तो जन्मार्थ निपट गंवार हूं महाराजा। इसमें सूरदास के मृत्यु के क्षण दो बार आये एक जब नाव उलट गई और नाव वाले कालू ने बचाया और दूसरा क्षण तब आया जन उसे नांव से बचाकर एक कोठरी में बैठाया। वहाँ नागराज का विराजमान होने से लेकिन सूरदास दोनों बार बच गये। इन प्रसंगों में चयन से यह लक्षित होता है कि लेखक ने यह इसलिए दिया है कि पता चल सके कि सूर एक महान आत्मा थी और वह इस भय को मिथ्या मानते थे। सूरज का इस मौत के समय श्याम को याद करना इस बात का प्रतीक है कि सूर कृष्ण के उपातक थे और उसी पर भरोसा रखते थे।

सूरदास के इस यंत्र तंत्र की विधि का बड़ा प्रसार था। एक बार स्त्रियों के पीछे पड़ने से कि स्वामी जी हमें कुछ दिखायें तो सूरदास जी ने एक साड़ी को मशाल से जला कर उसे बिलकुल राख कर दिया फिर किसी से कहा कि इसकी राख पोटली में बांध दो। पोटली फिर हवा में उछालने को कहा और कहा कि अच्छा अब लीला समाप्त अब हम जाएंगे श्री राधे गोपाल। वाह इतनी भारी साड़ी। श कहने लगे मेरी मैना तुम्हारी साड़ी तुम्हारे सन्दूक में है। वो कहने लगी आपने इसे मेरे सामने जलाया है। वो कहने लगा भला मैं अपनी छोटी बहन की साड़ी जला सकता हूँ। जब देखा तो साड़ी बिल्कुल ठीक सन्दूक में थी। नागर जी ने सूर के इस प्रसंग का सम्बंध उनकी महानता के लिये दिया है कि वह कितने बड़े योगी महाराज थे। इस प्रकार कहा जा सकता है कि इस उपन्यास का प्रसंगचयन समीचीन है। लेखक ने अपने मतव्य को इन प्रसगों से बताया है।

शैली की अनेकरूपता :

‘खंजन नयन' में अमृतलाल नागर जी ने शैली का बहुत सरल ढंग से प्रयोग किया है। किसी भी लेखक को सफलता तभी प्राप्त होती है अगर उसकी शैली अच्छी हो और उसे उपन्यास में अच्छे ढंग से प्रयोग किया हो। इसका कथानक वर्णनात्मक शैली में लिखा गया है। शैली की अनेकरूपता में उसकी सबसे अधिक असमर्थ अपरिमार्जित और असंस्कृत भाषा और तदनुरूप अशक्त, शिथिल और व्यक्तित्वहीन शैली के द्वारा उसकी उदासीनता और प्रयत्न की शिथिलता का परिचय मिलता है। इसमें श्रीमद्‌भागवत् के कथा प्रसंग भी वर्णनात्मक शैली में लिखे गये हैं। सुनो भाई, अभी तो चार-पाँच बरस तुम जैसे लक्ष्मी कमा रहे हो वैसे ही कमाते रहोगे तुम किसी अरी जात की लुगाई से ब्याह कर लोगे। जमीन जमा-जैजाद बाल-बच्चे इसी पाप की कमाई से तुम्हारा आगे का पुण्य जागेगा। इस प्रसंग में वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।

‘खंजन नयन' में कथात्मक शैली का भी निरूपण हुआ है। नागर जी ने इसमें मुहावरों का भी प्रयोग किया है। छंदों में बंधी रचना है। इसमें कहीं-कहीं व्यंग्य के प्रसंग भी आये हैं। चन्दन मल व्यंग्य से हँसे कहा, हां तभी तो हमारे बाल बनवाने पर रोक लगा दी है उसने। यह बात कहीं गई जब मौलवी कहता है कि सर मुसलमान को दिन में पाँच बार नमाज पढ़नी चाहिए। सिकन्दर न नमाज पढ़ता था और उसने न दादी रखी थी और न हजामत बनवाता था। चंदनमल उसकी बात पर ऐसा कहते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ‘खंजन नयन' में विविध प्रकार की शैलियों का सुन्दर प्रयोग किया गया है।

भाषा का कुशल प्रयोग :

'खंजन नयन' में भाषा का कुशल ढंग से प्रयोग किया गया है। इसकी भाषा सरल और स्पष्ट है इसको कोई भी साधारण व्यक्ति समझ सकता है। इसमें सबसे अधिक ब्रज भाषा का प्रयोग किया गया है। इसकी ज्यादातर भाषा संस्कृतनिष्ठ हिन्दी है। इसके अलावा कई प्रदेशों के लोग होने के कारण उनकी विविध बोलियों का भी वर्णन देखने को मिलता है। भाषा, शृंखलाबंध, सुबोध और व्यंग्यात्मक है। नागर जी ने भाषा का इस प्रकार प्रयोग किया है कि हर शब्द और प्रसंग उसमें पूरी तरह सजता है। कालू केवट ने पूछा- क्या इन अंधे सामी जी ने पैलेइ बात दीनी थी मारान अन्या सूरज मुंह उठाकर बोला मैं क्या बताऊंगा, यह सब इन्हीं गुरु महाराज थी की ही कृपा है। दो घड़ी राज चढे तक सब ठीक हो जाएगा। इस प्रसंग से पता चलता है कि इसमें ब्रजभाषा का प्रयोग हुआ है और बहुत सरल ढंग से हुआ है। इसमें गीतिकाव्य का भी प्रयोग किया गया है सूरदास के गीतों की तो भरमार ही पड़ी दिखाई देती है-

'बंदो चरन कमल हरि राई। '

जाकी कृपा पंगु गिरि लंघे,

अंधे को सब कुछ दरसाई।

इस उपन्यास में व्यंग्यात्मक भाषा का चित्रण इस प्रकार हुआ है- वाह अच्छी समाप्त की। मेरी इतनी भारी साड़ी- वाह री मैना मोको छो ही दोखलगावे है। तुम्हारी साड़ी तो तुम्हारे सन्दूक में ही धरी है। इस कथन से साफ लगता है कि नागर जी ने 'खंजन नयन' में भाषा का बहुत अच्छे और कुशल ढंग से प्रयोग किया है।

सहायक ग्रंथ-सूची

1. अमृतलाल नागर, खंजन नयन, राजपाल एंड संज, दिल्ली,।981.

2. हरबंश लाल शर्मा, सूर और उनका साहित्य, भारत प्रकाशन, अलीगढ़, 2०15.

3. सुदेश बत्रा, अमृतलाल नागर व्यक्तित्व, कृतित्व एवं सिद्धान्त, पंचशील प्रकाशन, जयपुर, ।979

4. प्रकाश चन्द्र मिश्र, अमृतलाल नागर का उपन्यास साहित्य, साहित्य प्रकाशन।

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