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1.अभिनंदन जिसके नाम में ही विजय परिलक्षित है साहस का जो पर्यायवाची है विश्वास था हमें वह पराक्रमी वीर जीत कर ही लौटेगा दिलेर जांबाज़ के लिए ...

1.अभिनंदन
जिसके नाम में ही
विजय परिलक्षित है
साहस का जो पर्यायवाची है
विश्वास था हमें
वह पराक्रमी वीर
जीत कर ही लौटेगा
दिलेर जांबाज़ के लिए
हर भारतीय के हृदय- यज्ञ में
प्रार्थना -आहुति पड़ रही थी
करोड़ों आंखें रो रही थी
हर ह्रदय से ईश्वर की गुहार थी
कोटि-कोटि हाथ प्रार्थना में उठ रहे थे
हर चेहरे पर गर्व के साथ विषाद था
उसकी वतन वापसी की प्रतीक्षा में
चक्षु क्रन्दन कर रहे थे
तभी रात्रि में
सूर्य नारायण सा
प्रकाश पुंज लेकर
वह वीर प्रकट हुआ
अद्वितीय शार्दूल चाल
मुद्रा पर अनिल कांति
चेहरे पर के निशान
अरि के आसुरी उत्पीडन का दृष्टांत देती
फिर भी विराट वक्ष
अक्षी पर सूजन
क्रूरता का प्रमाण देती
फिर भी अधरों पर विजय मुस्कान
भाल पर गर्व किरीट धारण किए
शत्रु को परास्त कर
समर भूमि से यशस्वी होकर
लौटा बहादुर वसुंधरालाल
हे ! अजातशत्रु ,भारतीनंदन
स्वीकारो हम सबका अभिनंदन।


2. कर्मवीर
हे !पथिक जीवन की क्लिष्ट राह पर निर्भय हो
निरंतर आगे बढ़
सुख की अभिलाषा न कर
कर्तव्यनिष्ठ बन
संकटों की परवाह न कर
विषम परिस्थितियां आएगी
तुझे बेचैन कर जाएगी
खूब आंसू रुलाएगी
अपनों को भी दूर कर जाएगी
समय ही बलवान है
यह एहसास दिलाएगी
तब केवल हिम्मत ही काम आएगी
ऐसे में भी जो मुस्कुराएगा
वही कर्मवीर कहलाएगा ।
संकटों के इस बवंडर में
जो पतवार संभाल पाएगा
तूफानी लहरों के आगे
जो चट्टान बन खड़ा हो जाएगा
सफलता उसके पग पखारेगी
सृष्टि नतमस्तक हो जाएगी
निरभिमान रह जो
जननी की सेवा में कर्मरत रहेगा
वही कर्मवीर कहलाएगा
जो भाग्यवादी बन
कर्महीन हो जाएगा
भाग्य के भरोसे छोड़ सब
धर्म से विरत हो जाएगा
वह समाज के लिए केवल बोझ बन जाएगा
निरर्थक है उसका जीवन
यह समय उसे बतलाएगा
चींटी सा परिश्रम कर
बाज सा हौसला धर
आसमान से ऊपर
जो उड़ान भर पाएगा
वहीं कर्मवीर कहलाएगा
3.पाक को नसीहत
अब तो रुक जा ऐ पाकिस्तान
कब तक इंसानियत को करेगा शर्मसार बेगुनाहों की लाशें बिछा कर
क्या उससे एक नई सरहद बनाएगा?
'पाक' शब्द की तौहीन कर
और कितनी मौत की फैक्ट्रियाँ चलाएगा? हर तरफ बारूद का बिस्तर लगाकर
क्या तू खुद चैन से जी पाएगा ?
मजहब के नाम पर गुमराह कर
और कितने मासूमों को फिदा करवाएगा? आज हर घर में सिसकियाँ और मातम है दस लाशें इधर तो आठ लाशें उधर है लगता है तुझे फकीर बन कर जीना ही मंजूर है
इसीलिए तो आवाम के पैसों से बारूद बनाने में तू मशगूल है
तरक्की से तू कोसों दूर खड़ा है
हर तरफ कंगाली, भुखमरी और जफ़ा है इसीलिए तो तेरे यहाँ जिंदगी बेआबरू हो कौड़ियों के दाम बिक रही है
हर शख्स जिंदगी से बेजार है
इसलिए मौत को गले लगा कर
फिदा होने के लिए तैयार है ।
अब तो इबादत खाने में
बस तू इबादत कर
आतंक के लिए ना उसे
अब तू इस्तेमाल कर
अब तो उसकी कज़ा से डर
हिंदुस्तान की तरह
इंसानियत से प्रेम कर
तभी सच्चे अर्थों में
तू पाक (पवित्र) स्थान कहलाएगा।
की लाशें बिछा कर
क्या उससे एक नई सरहद बनाएगा?
'पाक' शब्द की तौहीन कर
और कितनी मौत की फैक्ट्रियाँ चलाएगा? हर तरफ बारूद का बिस्तर लगाकर
क्या तू खुद चैन से जी पाएगा ?
मजहब के नाम पर गुमराह कर
और कितने मासूमों को फिदा करवाएगा? आज हर घर में सिसकियाँ और मातम है दस लाशें इधर तो आठ लाशें उधर है लगता है तुझे फकीर बन कर जीना ही मंजूर है
इसीलिए तो आवाम के पैसों से बारूद बनाने में तू मशगूल है
तरक्की से तू कोसों दूर खड़ा है
हर तरफ कंगाली, भुखमरी और जफ़ा है इसीलिए तो तेरे यहाँ जिंदगी बेआबरू हो कौड़ियों के दाम बिक रही है
हर शख्स जिंदगी से बेजार है
इसलिए मौत को गले लगा कर
फिदा होने के लिए तैयार है ।
अब तो इबादत खाने में
बस तू इबादत कर
आतंक के लिए ना उसे
अब तू इस्तेमाल कर
अब तो उसकी कज़ा से डर
हिंदुस्तान की तरह
इंसानियत से प्रेम कर
तभी सच्चे अर्थों में
तू पाक (पवित्र) स्थान कहलाएगा।


4.रणवीर
उस वीर सपूत को प्रणाम है
जो दुश्मन के घर में घुस,
उसे धूल चटा दे
अद्भुत बल और साहस से
कंदराओं में छिपे
आतंकियों को
मौत के घाट उतार दे
पर्वत की चोटी पर भी छिपे
कायरो की ईंट से ईंट बजा दे
उस वीर सपूत को प्रणाम है
भारत माँ की रक्षा कर जो
हम सब को सुकून की
नींद और शांति दे
माँ भारती का प्रहरी बन
हर सुख चैन को ठोकर मार दे
अपनी दहाड़ से
जो शत्रु को दहला दे
उस वीर सपूत को प्रणाम है
गोलियों से जिसका
सीना छलनी -छलनी हो जाए
उठ कर फिर भी वह
दसों को मार गिराए
झुके नहीं जो खुद कभी
ना माँ भारती को झुकने दे
उस वीर सपूत को प्रणाम है ।
सुन ले ऐ !कायर ! पाकिस्तान
हर बार हमने बक्शी है तुम्हारी जान
जिस दिन माँ भारती का यह वीर सपूत अपनी पर उतर आएगा
चुल्लू भर पानी देने वाला भी
पाकिस्तान में ना बच पाएगा
.हमारे वीर सपूतों ने ही
कारगिल में तुम्हें धूल चटवाई थी
तुम्हारी आबरू
कौड़ियों के दाम बिकवाई थी
उसका हश्र क्या भूल गया
जो फिर आज
हमसे उलझ गया
फिर से मुँह की खाएगा
अजय , अपराजित
भरतीय रणबांकुरे से
पल में खाक हो जाएगा
सर्वोच्च बलिदान के लिए
है जो हर पल तत्पर
उस सच्चे वीर सपूत को प्रणाम।


5.सूर्य नारायण देवता
हे ! सूर्यनारायण देवता
अब तो बाहर आ जाओ
खूब हो गई लुका- छुपी
अब तो दर्शन दे जाओ
ठंडी ने भी खूब सताया
बच्चा बूढ़ा सब थरथराया
पशु- पक्षियों ने भी प्राण गँवाया
अब तो तरस खा जाओ
खूब हो गई लुका- छुपी
अब तो बाहर आ जाओ।
इस कडकड़ाती सर्दी में
गरीब रात भर सिकुड़ता है
आपके आने से
चैन घड़ी भर उसे मिलता है ।
बिना कोई मोल चुकाए
स्वर्णिम धूप हो पाता है
स्वस्थ वर्धनी किरणों से
तंदुरुस्ती की सौगात वह पाता है
जीवन को गति देने वाले
अब ना हमें यूं तरसाओ
खूब हो गई लुकाछिपी
अब तो बाहर आ जाओ।
ना हो अगर आप तो
जीवन यहीं थम जाएगा
सृष्टि का सर्वनाश होगा
कोई नहीं बच पाएगा,
एक समय ऐसा भी आया
बाल हनुमान ने फल जानकर
आपको मुंह में दबाया
एक ही पल में संसार में
सब तरफ अंधकार छाया
संसार का हाल देखकर
देवलोक भी घबराया
होगा संसार का सर्वनाश
सब ने हनुमान को यह समझाया
किया मुक्त आपको
सरे जगत को बचाया।
आप के बिना जीवन संभव नहीं
यह सबकी समझ में आया।
भूल होगई हमसे तो
अब तो क्षमा दे जाओ
खूब हो गई लुकाछिपी
अब तो बाहर आ जाओ।


6. निठल्लों की वाह वाही
साल भर निठल्ले बैठकर भी ,
वे वाह- वाही पा गए
हम कोल्हु की बैल की तरह
बस काम में जुटे रहे ।
कैसा कलयुग आ गया
यह सोच हम मुस्कुरा गए
हंस चुग रहा है दाना
कौए मोती खा गए
कलयुगी गीता
वे कुछ इस तरह बता गए
अथक परिश्रम नहीं
बस दिखावा कीजिए
क्योंकि जो दिखता है
बस वही चलता है
यही नीति अपना कर ही
वे अधिकारियों को उल्लू बना गए
साल भर निठल्ले बैठ कर भी,
वे वाह -वाही पा गए
काम नहीं, बस बातें बना गए
बातों के पुल बाँधकर
अपना प्रभाव जमा गए
साल भर खाली बैठकर
दूसरों की हँसी उड़ा गए
यही नीति अपना कर ही
अधिकारियों को खुश करा गए
साल भर निठल्ले बैठकर भी
वे वाह -वाही पा गए।
दूसरों की बुराई कर
खुद को महान बता गए
थोड़ी सी चमचागिरी कर
अपना सिक्का जमा गए
परिश्रम करने वाला मूर्ख है
यह हम सबको जता गए
साल भर निठल्ले बैठ कर भी ,
वे वाह -वाही पा गए।


7.बप्पा और टीचर
देखना चाहते थे गणपति बप्पा इस बार बच्चे किन्हें करते हैं ज्यादा प्यार
शिक्षक है महत्वपूर्ण या मेरा त्यौहार
खुश होगये बप्पा देखकर बच्चों का शिक्षकों के प्रति प्यार
बच्चों से जाकर बप्पा ने किया
एक विचित्र सवाल
मुझसे ज्यादा क्यों है तुम्हें
अपने टीचर्स से प्यार
बच्चों ने कहा बप्पा आए हो तो समझो हमारी परेशानी
और कर दो ऐसा चमत्कार
आप की तरह ही हो साल में टीचर का दर्शन एक बार
ना कोई पढ़ाई ना होमवर्क ना हो शिक्षकों का अत्याचार
ऐसा कर सकते हो तो बोलो
हम करेंगे टीचर से ज्यादा आपको प्यार बप्पा ने सोचा यहां से भागने में ही है समझदारी
किसी टीचर ने सुन लिया तो होगी
मुर्गा बनने की अब मेरी बारी।
8.कल्कि अवतार
लौट आओ हे मधुसूदन
अब केवल तुम्हारी आस है
द्वापर युग सुधार दिया था
अब कलयुग का भार है।
कलयुग के दुशासन का
बढ़ रहा अत्याचार है ।
प्रतिदिन अपमानित होती
द्रोपदी का चीर तार-तार है,
फैली है वायुमंडल में सिसकियाँ
हर तरफ हाहाकार है,
उठाओ पंचजन्य ,
करो शंखनाद
करना स्त्री का उद्धार है ।
जागो हे मुरलीधर
बस हुआ अब विश्राम है
लौट आओ हे मधुसूदन
अब केवल तुम्हारी आस है ।
आज भी भरी सभा में
सैरन्द्री की लूट रही आबरू है
कलयुगी कीचक
करे अट्टहास है।
देखो अधर्मियोंओं का
बढ़ रहा , दुस्साहस है ।
उठाओ नारायणस्त्र
करना दुर्जन का सर्वनाश है
लौट आओ हे मधुसूदन
अब केवल तुम्हारी आस है ।
दुराचारी कुकर्म कर रहा है
कंस के कार्यों को भी
शर्मसार कर रहा है
कभी निर्भया
तो कभी आसिफा
का शव जल रहा है,
छोड़ो अपना सुदर्शन
करना पापियों का विनाश है ।
लौट आओ हे मधुसूदन
अब केवल तुम्हारी आस है।
राजनीति के कुरुक्षेत्र में,
ईमानदारी फंसी है
द्रोण की व्यूहरचना में।
राजनीतिज्ञ,
चल रहे शकुनी चाल है
हर तरफ फैला अंधकार है
उठाओ शारंग धनुष,
अब करना दुष्टों का सर्वनाश है
जागो हे देवकीनंदन
बस हुआ अब विश्राम है
लेकर कल्कि अवतार,
आना धरती पर इस बार है।
लौट आओ हे मधुसूदन
अब केवल तुम्हारी आस है ,
अब केवल तुम्हारी आस है ।


9.विश्वास
हर रिश्ते की बुनियाद है विश्वास
तनिक सा संदेह भी ना भटकने पाए आसपास,
मर जाते हैं रिश्ते खत्म हो जाता है उल्लास,
वर्षों लग जाते हैं उनमें भरने श्वास,
हर रिश्ते की बुनियाद है विश्वास।।
अगर ना हो भक्त का भगवान में विश्वास तो हर मूर्ति से होगा केवल पत्थर का आभास,
भक्त के विश्वास से ही तो पाषाण में भी होता है दिव्यता का एहसास,
हर रिश्ते की बुनियाद है विश्वास ।।
पति -पत्नी में हो अगर विरोधाभास
हर पल संदेह, हर पल अविश्वास,
हर पल झगड़ा, हर पल कलह,
हर पल होगा रिश्तों का सर्वनाश,
हर रिश्ते की बुनियाद है विश्वास।।
दिन-ब-दिन हम सबका मानवता पर से उठ रहा है विश्वास,
हैवानियत तांडव करती दिखती है आस- पास
नकारात्मक प्रवृत्तियों का बढ़ रहा अभ्यास,
करना चाहते हो अगर तीव्र गति से विकास
तो छोड़ो यह संदेह, शंका और अविश्वास, बढ़ाओ अपनी आस्था, श्रद्धा और विश्वास,
ऊँचा करो अपना भी आत्मविश्वास
छोटा सा यह जीवन है, जियो इसे बिंदास।।
अनुपमा ठाकुर

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रचनाकार: अनुपमा ठाकुर की कविताएँ
अनुपमा ठाकुर की कविताएँ
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