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मैं भी शातिर, तू भी शातिर, ये सारी दुनिया भी शातिर। तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस गजलें ( कुछ अनूठे शाब्दिक प्रयोग)

 

तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस गजलें ( कुछ अनूठे शाब्दिक प्रयोग)
-एक-
मैं भी शातिर, तू भी शातिर,
ये सारी दुनिया भी शातिर।

कैसे हो फिर मेल-मिलापा,
मैं भी शातिर, तू भी शातिर।

सब अपनी खातिर जीते हैं,
ना तेरी, ना मेरी खातिर।

सब कुछ आखिर है यां आखिर,
मैं भी आखिर, तू भी आखिर।

नादिरशाही खत्म हो कैसे,
मैं भी नादिर, तू भी नादिर।
<><><>

-दो-

बेसुध, बेसुध, बेसुध, बेसुध,
कौन नहीं यां बेसुध बेसुध।

हमने दुनिया को देखा है,
खाते- पीते , बेसुध बेसुध।

मानो मत मानो पर सच है,
सब के सब हैं बेसुध बेसुध।

छोटा मुंह और बात बड़ी है,
हम भी बेसुध तुम भी बेसुध।

‘तेज’ जमाना कब सँभलेगा,
सदा रहत है बेसुध बेसुध।

<><><>


-तीन-


ढोली ढोली ढोली,
उमर भौत है ढोली।

चोली चोली चोली,
दूध-मुँहे ने खोली।

पोली पोली पोली,
साँच की धरती पोली।

सोली सोली सोली,
जगते जगते सोली।

खेली खेली खेली,
आँख मिचौनी खेली।

<><><>

-चार-

झेली झेली झेली,
थकी जवानी झेली।

चेली चेली चेली,
कौन है किसकी चेली

तेली तेली तेली,
सागर-सागर तेली।

पेली पेली पेली,
कांच की सरसों पेली।

खेली  खेली  खेली,
आँख मिचौनी खेली।


<><><>


-पाँच-
टूटी  टूटी  टूटी,
नींद अधर में टूटी।

कूटी  कूटी  कूटी,
मां ने खिचड़ी कूटी

लूटी  लूटी  लूटी,
अस्मत अपनी लूटी।

फूटी  फूटी  फूटी,
दही की मटकी फूटी।

झूठी झूठी झूठी,
सारी दुनिया झूठी।

टूंटी टूंटी टूंटी,
सूखी नल की टूंटी।

<><><>

-छ: -
ना धेला ना पैसा हूँ,
मैं भी तेरे जैसा हूँ।

न ठहरा न बहता हूँ
वैसे चलता रहता हूँ।

इसके उसके मैं सबके,
निशदिन ताने सहता  हूँ।

वो बात बनाते रहते हैं,
मैं खाक उड़ाता रहता हूँ।

उनको रस्ता देकर मैं,
खुद पीछे रह जाता हूँ।

<><><>

-सात-

फैली फैली फैली,
छाया दुख की फैली।

मैली मैली मैली,
मन की चादर मैली।

मैली मैली मैली,
मन की चादर मैली।

भूली भूली भूली,
दुनिया खुद को भूली।

गूंगी गूंगी गूंगी,
सारे दुनिया गूंगी।

सूली सूली सूली,
‘तेज’ चढ़ाया सूली।

<><><>

-आठ-

गूंजी गूंजी गूंजी,
चीख गगन में गूंजी।

खूनी खूनी खूनी,
आँखें नम हैं खूनी।

लौटी लौटी लौटी,
आंख में निंदिया लौटी।

रूठी रूठी रूठी,
माँ की ममता रूठी।

मूंजी  मूंजी  मूंजी,
सारी दुनिया   मूंजी।

<><><>

मूंजी = कंजूस


-नौ-

खोली खोली खोली,
किसने सांकल खोली।

खोली खोली खोली,
कहां मिलेगी खोली।

रोली रोली रोली,
ममता माँ की रोली।

ढोली ढोली ढोली,
उमर भौत  है ढोली।

चोली चोली चोली,
दूध-मुहे ने खोली।

पोली पोली पोली,
सच की धरती पोली।

सोली सोली सोली,
जगते जगते सोली।

<><><>

-दस-

आड़ी तिरछी खड़ीं लकीर,
कुछ औंधे मुंह पड़ीं लकीर।

जैसी भी हैं रहने भी दो,
दिलों में खींचो मती लकीर।

सूई धागा मांग रहा है,
भूखा नंगा एक फकीर।

लाल चुनरिया लाल लकीर,
फिर क्यूँ गौरी भई अधीर।

भाल-भाल पर ‘तेज’ खिंची हैं,
गूंगी-बहरी थकी लकीर।

<><><>
‘तूफाँ की ज़द में’ (ग़ज़लें) से प्रस्तुत
 

तेजपाल सिंह ‘तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘दृष्टिकोण  ‘ट्रैफिक जाम है’, ‘गुजरा हूँ जिधर से’, ‘तूफाँ की ज़द में’ व ‘हादसों के दौर में’ (गजल संग्रह), ‘बेताल दृष्टि’, ‘पुश्तैनी पीड़ा’ आदि (कविता संग्रह), ‘रुन-झुन’, ‘खेल-खेल में’, ‘धमा चौकड़ी’ आदि ( बालगीत), ‘कहाँ गई वो दिल्ली वाली’ (शब्द चित्र), पाँच  निबन्ध संग्रह और अन्य सम्पादकीय। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ‘ग्रीन सत्ता’ के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका ‘अपेक्षा’ के उपसंपादक, ‘आजीवक विजन’ के प्रधान संपादक तथा ‘अधिकार दर्पण’ नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं। सामाजिक/नागरिक सम्मान सम्मानों के साथ-साथ आप हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं। आजकल आप स्वतंत्र लेखन में रत हैं।
सम्पर्क  :  E-mail — tejpaltej@gmail.com

ग़ज़लें 22773978338761592

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