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शंकर सिंह की कविताएँ

शंकर सिंह


गंगोलीहाट पिथौरागढ़ उत्तराखण्ड निवासी

वर्तमान में

शोधार्थी शिक्षा विभाग

बिडला परिसर श्रीनगर गढ़वाल

हे.न.ब. गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल

उत्तराखण्ड

Email. Shnakr.pargai@gmail.com


1.लेखक

उठाओ अपनी
सम्पदा
हथियार नहीं
ना ही कोई पूंजी
बल्कि
कोई कलम
पेन
कागज
डायरी
या जो भी चीजें तुम्हें
जरुरी लगती हैँ
सच को लिखने के लिए
लिख दो
ईश्वर कर रहस्य
और पहरेदारो कर डर
थोड़ा बहुत ही सही
पढ़ा जायेगा
समझा जायेगा
विचार किया जायेगा
विश्लेषण किया जायेगा
राजा और प्रजा
नजदीक होंगे तब
संभवतः ईश्वर भी. !

2.चुनाव

सारे मुद्दे
अब
चुनावी शोर के मध्य
कही भटक जायेंगे
या सीमित हो जायेंगे
भाषणों तक
या किसी कागज पर
लिखें जायेंगे
असल में अब
राष्ट्र प्रेम का
ढकोसला
और
चुनावी उन्माद
बिखरा हुआ मिलेगा
चारों ओर
सावधान लोकतंत्र के
वोटरों
चुनावी दौर आ रहा है
सारी पार्टियां
एकजुट होकर
चुनावों में उतरेगी
हम ही होंगे
जो अलग थलग होकर
लड़ते रहेंगे
धर्म जाति
और पार्टियों के झण्डों को
कंधे में उठाये
असल में लोकतंत्र
हमसे ही शुरू होना है
ये समझना जरुरी है

3.युद्ध

युद्ध
विनाश का प्रतीक है
इसका कोई अंत नहीं
युद्ध
उनकी उपज है
जो बचाये
रखना चाहते है
सत्ता
सत्ताओं के
रूप बदले है
अर्थ बदले है
पर चरित्र नहीं बदला
ट्रिगर दबाकर
छिप जाना
यही नियति है सत्ता की
सुरक्षा की कड़ी मे
रहकर युद्ध का बिगुल बजाना
यही दुर्भाग्य है
हमारा
सदियों से
सैनिकों ने लड़ी है
लड़ाई
उनके लहू से
लाल हुई है धरा
और वहां खेती
सफ़ेद पोशाक धारी ने उगायी
हम
युद्ध के उन्माद में
अचेतन स्थिति में
खूब चिल्लाते है
युद्ध -युद्ध
वही तमाचा मारता
विनाश खड़ा है
हमारे सामने
पर हमें देखना ही नहीं है
बल्कि हम
अगली सुबह का
इंतजार करते है
अगले अभियान के लिए
सोचते है अब क्या तैयारी है
बारूद की बू
फैली हुई है
हमारे जहन में
युद्ध का उन्माद
फैला है
इसका कोई अंत नहीं
जैसे युद्ध का
कोई अंत नहीं !

4.युद्ध

युद्ध
मानव के खोपड़ियों में
नाचता है
वैमनस्य
स्पर्धा
शक्ति का प्रदर्शन बनकर
या स्वयं के
वर्चस्व को बनाये रखने के लिए
हर कोई
ज़ब भी चढ़ता है ऊपर
हथियारों के साथ
वही बैठा
युद्ध मुस्कराता है
कि शांति में भी लोग
पूजते है उसे
युद्ध कही और नहीं
समाज के उस हिस्से में है
जिस हिस्से में
हम मानव को ही
मानव का प्रतिद्वन्द्वी समझते हैं !

5.लोकतंत्र का चरित्र

शासक
राजा बने रहता
लोकतंत्र
मात्र
वोटतंत्र हो जाता
यही चक्र
चलते रहता
जनता पीसते रहती
इन दो पाटों के बीच
चक्की से धुआँ निकलता
ताजे गेहूं की
बालियों की खुशबू
दूर दूर तक
फ़ैल जाती है
रोटी की उम्मीद में
एक ओर दौड़ लगाते हैं लोग
वहां राजा
हाथों में हथियार लिए
पहरेदार बैठाये रहता !

६.सर्जन

वृक्ष की पत्तियों ने
गाये वो गान
आकाश ने अपनी
झिलमिल रौशनी में
लिखे जो गीत
नदी की धरा ने
नृत्य किया उन गीतों पर
जमीं ने थिरकने दिया जिसे
अपनी स्वीकार्य से
अपनी गोद में
हरेक क्षण
सर्जन का है
जो बीतता है
कभी आभास किये
कभी बिना जाने भी
क्षण प्रति क्षण
गतिमान है
शब्द कभी मौन रूपक लिए
सगुण निराकार से
चाँद का ओस से
मुँह धोना तक
सबकुछ वेगवान है
सर्जन के गर्भ में!

7. सफेदपोशी

वो जो सत्ता के
भूखे है
सफेद पोशी है
तुम्हारे - हमारे
सच को भी
झूठा
साबित कर देंगे
वो तुम्हारे
जीने के अधिकार को भी
बदल देना चाहेंगे
वो चाहेंगे
तुम ओढ़ लो
उनके ही ढकोसले को
वरना वो
चुपके से तुम पर
हमले करेंगे
तुम्हारी अस्मिता पर
चोट पंहुचायेंगे
वो तुम्हारे पूजा करने के
तरीकों को भी
चाहेंगे बदल दे
और चाहेंगे
उनकी इच्छाओं के बल पर हो
वो समाज के
बहरूपिये हैं
जो खोखला कर देना चाहेंगे
हरेक चीज को
जैसे वो है
उनके पीछे चलने पर तुम्हें
पुरस्कृत करेंगे
न चलने पर पर
पीठ में छुरा
घोंपने हेतु
तुम्हारे ही साथी को
चुनेंगे
जो बहक जाएंगे
उनके अपने मारे जाएंगे
जो नहीं बहकेंगे
उनको बहकाया जायेगा
ये दौर जारी रहेगा
उनकी ओर से
जब तक तुम्हारी
अस्मिता को धूमिल नहीं कर देंगे
मगर तुम
उठ जाओगे एक दिन
क्योंकि
तुम बचे रहोगे
सत्य के साथ !

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