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​​ मेरे मन्दिर के तंग आँगन में, महज़ पत्थर का सनम है प्यारे - तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस ग़ज़लें

-एक-

कहने को इक साल गया है,

वैसे जिन्दा काल गया है

​​

लेकर खाली प्याला-प्याली,

घर अपने कंगाल गया है

​​

सत्ता की मारा-मारी में,

पाक कभी बंगाल गया है

​​

भेद समन्दर की अभिलाषा,

अम्बर तक पाताल गया है

​​

बेपरदा हुई राजनीति कि,

इंसानी सुरा-ताल गया है

​​

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-दो-

चाँद-तारों में गगन में वो है,

परदादारी में मिलन में वो है

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लोग गिर-गिरके संभल जाते हैं,

जामो-मीना में सुखन में वो है

​​

मुझको सोने की सजा दो जीभर,

मेरी नींदों में सपन में वो है

​​

मेरे घावों को जवाँ रहने दो,

मेरे घावों में दुखन में वो है

​​

उसकी मूरत को हटालो बेशक,

मेरी सांसों में नयन में वो है

​​

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-तीन-

कोई अपना है भरम है प्यारे,

बात नफ़रत की गरम है प्यारे

​​

मेरे मन्दिर के तंग आँगन में,

महज़ पत्थर का सनम है प्यारे

​​

मेरे कातिल की सुर्ख़ आँखों में,

लाज बाकी ना शरम है प्यारे

​​

बहुत निर्मम है मुहब्बत अपनी,

मैंने समझा था नरम है प्यारे

​​

‘तेज’ आँधी में मंद पुरवा की,

बात करना भी ज़ुलम है प्यारे

​​

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-चार-

हमने यूँ विस्तार किया है,

इज़्ज़त का व्यापार किया है

​​

मानवता की बलिवेदी पर,

चढ़ने से इंकार किया है

​​

आग लगाकर बुझवाने का,

हमने कारोबार किया है

​​

ख़ाली जेबें भरकर लौटे,

हमने यों बाजार किया है

​​

‘तेज’ क्या जाने हमको हमने,

मुट्ठी में संसार किया है

​​

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-पांच-

कुछ तो आँखों में हया रख छोड़ो,

गोया मुट्ठी में हवा रख छोड़ो

​​

सर्द आहों को दहकना है अभी,

घर का दरवाज़ा खुला रख छोड़ो

​​

हरसू खुश्बू की फ़सल बोनी है,

बसकि धरती पर बफ़ा रख छोड़ो


जाने किस वक़्त उमर हो निकले,

ख़ाली जेबों में पता रख छोड़ो

​​

दीनो-मज़हब की ही ना रहे,

दिल के कोने में खुदा रख छोड़ो

​​

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-छ:-

कोई बरफ सा ऐसा पिघला,

भूल गया सब अगला-पिछला

​​

आग बुझाने को दुनिया की,

तन पर तेल छिड़ककर निकला

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आने वाला आया तो पर,

मुझसे आँख बचाकर निकला

​​

प्रेम-गीत गाने वाले की,

फटी जेब में पत्थर निकला

​​

बांच न पाया वो दुनिया को,

पर पढ़ने में अव्वल निकला

​​

नए दौर की भीड़-भाड़ में,

’तेज’ खड़ा है इकला-इकला

​​

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-सात-

जनता की सुध लेगा कौन,

उसके जख़्म भरेगा कौन?


रोजी-रोटी के मुद्दों की,

सूनी माँग भरेगा कौन?


हिंसा के ख़ूनी पन्नों में,

कुमकुम रंग भरेगा कौन?


मानवता के अन्धे घर में,

चमचम धूप धरेगा कौन?


सत्ता की खूनी बाघिन पर,

आखिर वार करेगा कौन

​​

संघर्षों की ‘तेज’ कहानी,

बिस्तर बीच सुनेगा कौन?

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-आठ-

बात बिगड़ी भी, बात भी ना गई,

तम की चौखट से चाँदनी ना गई

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रोज बदले है वो चेहरा वो लेकिन,

उसके चेहरे से सादगी ना गई

​​

कासे बोलूँ कि उम्र-भर अपनी,

उनके होते भी खामुशी ना गई

​​

ये जो पगली है, मेरी बेटी है,

इसकी बावक्त पालकी ना गई

​​

मेरे आशिक के रुखे-रौशन से,

’तेज’ मरके भी आशिकी ना गई

​​

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-नौ-

ख़त में आना-जाना लिख,

गाना और बजाना लिख

​​

बिना बात मजलूमों को,

बेज़ा रोज सताना लिख

​​

प्रीत-रीत अपनेपन का,

अपने ना ख़जाना लिख

​​

धर्म-कर्म के चक्कर में याँ,

गुजरा एक जमाना लिख

​​

वक़्त के होंठों पर तू ‘तेज’,

हँसना और हँसाना लिख

​​

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-दस-

वासंती रितु आने को है,

कोयलिया कुछ गाने को है

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आँख मूंदकर जल्दी सो जा,

ख़्वाब सुनहरा आने को है

​​

फागुन की बदरंग धरा पे,

रंग कोई बरसाने को है

​​

आज हवा में कुछ नरमी है,

शायद बारिश आने को है

​​

वर्षों बाद खुली है खिड़की,

लगता है कोई आने को है

​​

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( ‘ट्रैफिक जाम है’ (ग़ज़ल संग्रह) से प्रस्तुत)

तेजपाल सिंह ‘तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘दृष्टिकोण ‘ट्रैफिक जाम है’, ‘गुजरा हूँ जिधर से’, ‘तूफाँ की ज़द में’ व ‘हादसों के दौर में’ (गजल संग्रह), ‘बेताल दृष्टि’, ‘पुश्तैनी पीड़ा’ आदि (कविता संग्रह), ‘रुन-झुन’, ‘खेल-खेल में’, ‘धमा चौकड़ी’ आदि ( बालगीत), ‘कहाँ गई वो दिल्ली वाली’ (शब्द चित्र), पाँच निबन्ध संग्रह और अन्य सम्पादकीय

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तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ‘ग्रीन सत्ता’ के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका ‘अपेक्षा’ के उपसंपादक, ‘आजीवक विजन’ के प्रधान संपादक तथा ‘अधिकार दर्पण’ नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं

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स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं

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सामाजिक/नागरिक सम्मान सम्मानों के साथ-साथ आप हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं

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आजकल आप स्वतंत्र लेखन में रत हैं

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सम्पर्क : E-mail — tejpaltej@gmail.com

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