नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

नचाए सबको पैसा (लघुकथा) -सुरेश सौरभ

नचाए सबको पैसा (लघुकथा)

     "भाई साहब कल आप बीजेपी की रैली में थे परसो सपा की रैली में थे। आज बसपा के जुलूस में जा रहे हैं.  क्या बात है, आप रहते  कहॉ हैं?
  'अरे यार हम लोग धंधे वाले लोग हैं, इसलिए एक ठिकाना कहॉ-जहॉ पैसा  मिलता है, उसकी टोपी लगा लेते हैं. उसका बैनर लगा लेतें हैं, पैसा बोलता है भाई । नचाता है। इसलिए मैं नाच रहा हूं । मेरे साथ तमाम नाच रहे हैं । तुम्हें नाचना हो तो तुम भी आ जाओ।" यह कहते- कहते वह आगे बढ़ गया। मैं ठगा सा उसे ताकता रह गया।
   

लेखक-सुरेश सौरभ
निर्मल नगर लखीमपुर खीरी पिन-२६२७०१
कापीराइट -लेखक

0 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.