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लघुकथा - विश्वास - कल्पना गोयल

#लघुकथा#

##विश्वास##

(ऊपर का चित्र - सुरेन्द्र वर्मा की कलाकृति)


आज बिरवाराम लौट रहा था अपने गाँव। पूरा गाँव प्रतीक्षारत भी था उसकी एक झलक के लिए ...मगर हर ओर खुशी का माहौल नहीं, अपितु एक मातम छाया हुआ था। ऐसा कोई नहीं था जिसकी आँख नम न हो। सूबेदार था वह.. बड़ा ही रौब था चेहरे पर.. अपनी मूँछों को सदा ताव देता रहता था। जब वह अपना बाना पहनकर आता था तो बस...जवाब नहीं।


       शहीद हो गया था.. सीमा पर। काम बहुत मुस्तैदी से करता था वह। आखिर तक लड़ता रहा था मगर दुश्मनों के वार छेद गए थे उसके सीने को। अचानक मौन-सा छा गया.. मतलब सेना के वाहन आने लगे हैं। सबकी नजरें बस उसे ही देखना चाह रही थीं।


    अंदर तक कलेजे को चीरती चीख सुनते ही समझ गई थी यह सरजू की पुकार होगी। सरजू उसकी पत्नी बहुत चाहती थी उसे। ईश्वर ने सदा इंतजार ही करने को मानो उसकी किस्मत लिखी थी और अब.... अब तो वह बना ही रहेगा कभी पूरा न होने के लिए। बहुत दर्दनाक   वातावरण हो गया था। हर शख्स उसकी अच्छाइयों को ही बता रहा था।


         "सरजू अब क्या करेगी" मुझे भीतर ही भीतर यह चिंता सता रही थी। कई वर्षों से मेरी नौकरी वहां होने से और पास ही के मकान में रहने से मेरी उससे अच्छी मित्रता हो गई थी। साफ मन की सरजू बहुत कम भी बोलती थी। विश्वास था मुझे यह कि वह मेरी बात अवश्य मानेगी। मातमी धुन बजने के बाद सब कुछ संपन्न हुआ और शनैः शनैः कुछ समय बाद वही...एक ढ़र्रे पर जिंदगी जैसा कि प्रकृति का नियम है।


      सरजू मेरे समझाने के बाद पढ़ने लगी थी। परीक्षा भी अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण कर रही थी भूली नहीं थी कुछ भी बीता हुआ.. मगर जीने की लौ... शनैः शनैः प्रज्वलित हो रही थी। आज बिरवाराम को गए ठीक आठ बरस हो गए थे। सरजू आज ही के दिन अपनी नौकरी ज्वाईन करने जा रही थी। उसके चेहरे पर विश्वास था, मगर आँखें नम थीं।


सरजू ने बिरवाराम को मन ही मन क्या कहा होगा उस समय..नहीं जानती मगर हाथ जोड़ते हुए मैंने अवश्य संकल्प लिया था कि मैं सरजू को आत्मनिर्भर बना कर ही चैन की साँस लूँगी।
इसे मेरा विश्वास कहें या कि सरजू की मेहनत, मगर आज इतना अहसास अवश्य हो गया था कि विश्वास की नींव एक आत्मनिर्भर इमारत अवश्य खड़ी कर सकती है।
   कल्पना गोयल

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