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थक गया हूँ मैं : नेमीचंद मावरी ' निमय' की मुक्त छंद कविताएँ


                                                      नेमीचंद मावरी ' निमय'
                                                         अन्य नाम - काव्य
                                               शोधार्थी, रसायन, MNIT, जयपुर
                                         सदस्य, हिंदी साहित्य समिति, बूंदी राजस्थान
                                                           
                                                     
                                                 निवासी - तालेडा, बूंदी राजस्थान
                                                     पुस्तक - काव्य के फूल
  500 से अधिक काव्यात्मक रचनाएँ यथा ग़ज़ल, मुक्त छंद , छंदबद्ध कविताएँ (श्रृंगार, वीर, वात्सल्य, करुणा, व्यंग्य, छायावाद व समाज से उद्धृत रचनाएँ) 
1000 से अधिक हाइकु लेखन .


1.थक गया हूँ मैं
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बहुत देख लिया माँ
मैंने इस बदलते जमाने के बदलते रंगों को,
झूठ, फरेब, झाँसों का कारोबार है यहाँ,
अपने भी रंग बदलते हैं,
हर अमावस के साथ।
स्वार्थ का बतियाना,
गले लगाना है माँ हर जगह।
पंगु बनाने,
  हाथ काटने और दिमाग चाटने वाले
लोग बैठे हैं माँ मेरे इंतज़ार में।
अब थक गया हूँ मैं माँ,
मुझे वापस से बच्चा बन जाने दो माँ,
मुझे फिर से बाहों में भर लो माँ।

2. अब का सच
क्या कहता तुम गुस्सा बहुत थी उस वक्त,
मैं तो बटोर रहा था तुम्हारी हँसी के मोती,
देख रहा था आँखों में लम्बी राहों तक साथ चलते रहने के सपने। 
और तुम अलबेली सी मस्तियों को छोड़
सिर्फ मेरे उस लड़की के साथ
  बात कर लेने भर से खफा हो गयी थी इतनी। 
होश भी नहीं था तुम्हें शायद,
मगर शायद वो मेरा तुम्हारे लिए थोड़ा प्यार ही था,
जो तुम्हारी शक की दीवारों को भी पार कर
तुम्हारे दिल में घर कर रहा था।
मगर हाँ एक बात छुपाई है तुमसे,
अब तुम्हारी रोज की ये शक भरी बातें मुझे बेचैन कर रही है,
और मैं करीब होता जा रहा हूँ शायद उसके।
हाँ!  शायद अब यही सच है। 


3. प्यार की कहानी
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अब हर ठण्डी रात अच्छी लगने लगी है,
क्योंकि उनकी यादें गर्माहट ला देती है
एक नई सुबह के इंतज़ार के साथ।
हर पल में चाय की सी ताजगी लगती है,
उनके होठों से ली गयी चाय की चुसकियों की सोच,
एक नए नशे के आगमन की तरह। 
बस उन्हें देखते रहने का मन है
जैसे नजरें कभी ना हटाऊँ,
उनकी हर धड़कन में,
श्वास बनके खुद ही बहना चाहूँ।
मेरे प्यार की कहानी है जुदा,
सबसे अलग।

4. वो भी क्या दिन थे
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उनका वो अचानक से मिलना,
साथ साथ चलने की ख्वाहिश जताना
अक्सर मेरी बातों पे खिलखिलाकर हँसना,
छुप- छुप के तस्वीरें लेना,
पानी की धार में हाथ थामना,
  वो बार बार जुल्फों को संभालना,
नटखट अदाओं से यूँ मुड़ना,
धीमे धीमे बतियाना,
हर बात का सटीक जवाब देना,
थोड़ा सा इतराना फिर मुस्कुराना,
सब कुछ भूल ही तो नहीं पाया मैं,
खुद को शायद संभाल नहीं पाया मैं,
उस प्रकृति की गोद में शायद,
दिल कहीं छूट गया था मेरा,
कैसे भुला पाऊँ मैं,
कितने खूबसूरत दिन थे
सोचता ही रहा हूँ हर पल हमेशा,
वो भी क्या दिन थे। 

5. कमरे की शिकायत
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मैं ठहरा अनाड़ी किस्म का प्राणी,
जागता हूँ सवेरे सूरज के पहले पहर के बाद,
सोता हूँ महताब के आने के पहले।
एक कोने में कमरे में कचरे का ढेर रहता है
दूसरे में पड़ी हुई है अखबारों की रद्दी।
बर्तन मंजते नहीं हैं क्यों
कि खाना तो कालू के ढाबे के जिम्मे है।
हाँ !  कभी जो दो पैकेट मैग्गी लाता हूँ
उन्हीं की वजह से एक कढ़ाही और चम्मच पड़ी रहती है
या फिर कभी माँ दलिया बनाने की कह देती है
तो कुछ वही बर्तन। 
बिस्तर बेचारे से मेरी तरफ ताकते रहते हैं
उलट पुलट होने के लिए
और कपड़े बेचारे धोबी की दुकान को ही
अपना घर समझ बैठे हैं
कमरे की दहलीज सात आठ जोड़ी
  जूते चप्पलों से भरी रहती है,
मैं समझता हूँ यारों उसके दर्द को
  कि मेरे कमरे को मुझसे शिकायत रहती है।

6. तुम भी देखोगे
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जब मैं पहुँचूँगा अपनी मंजिल के करीब,
आलोचकों के मुँह बंद होंगे या नहीं,
मगर प्रशंसक मेरे लिए गलहार जरूर सँजो रहे होंगे
इतना विश्वास है मुझे।
फिर क्यों दुनिया मुझे धिक्कारने में कसर नहीं छोड़ती।
शायद इसीलिए ना!  क्योंकि मैं  सहनशील बहुत हूँ,
जो कि गुनाह है इस दुनिया में।
मगर फ़िक्र की कोई बात नहीं,
आओगे एक दिन  तुम भी मदद लेने,
चिंता मत करो, एक दिन तुम भी देखोगे।

7. तुमने तो कह दिया
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तुमने तो बस कह दिया
कि तुम मुझसे प्यार नहीं करते।
नहीं है तुम्हारे दिल में मेरे लिए कोई जगह।
तुम्हे कुछ भी महसूस नहीं होता मेरे लिए।
मगर क्या तुमने एक बार भी ये सोचा
कि तुम्हारा एकदम से यूँ ना कहना
मेरी जिंदगी का सुकुँ छीन लेगा।
प्यार तुम्हें भी था, है, रहेगा
मगर इस ज़माने का डर सिर्फ़ तुम्हें ही सताता है।
वो भी उस ज़माने का जो
मैय्यत पर भी सिर्फ़ घड़ियाली आँसू
रोकर चला जाता है।
हाँ!  तुमने तो बस कह दिया पर
निभाना तो सिर्फ़ मुझे ही पड़ेगा।


8. जिंदगी बोलती है
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जिंदगी इतनी लम्बी भी नहीं
कि आराम ही करते रह जाओ,
और इतनी छोटी भी नहीं कि
आप बेहिसाब जल्दबाजी में लग जाओ।
मौसम की तरह बदलते हैं
जीवन के रंग
मगर रंगीन होना ही तो
जिंदगी का असली मजा है। 
कहते हैं प्यार करने में बहुत
मगज लगाना पड़ता है
लेकिन नफरत करना भी तो एक कला है
दिमाग की कसरत करवा देती है।
बोलते हैं जो, कि घोड़े ही रेस जीत पाते हैं
पूछकर देखिये उन गधों से
जिन्होंने जिन्दगी की असली रेस में
अपने खुर घिस लिए। 
दो रोटी देने वाले अमीरजादों का क्या,
जिंदगी तो उनकी है
जो उन दो रोटियों को पाने के लिए,
जिंदगियों को दाँव लगा देते है।
फूल की महक किसको अच्छी नहीं लगती
महकाने वाले बागबां का दर्द
सिर्फ जिंदगी पूछती है ।
आकाश को ताकना और फतह करना,
बहुत फेर लिए बैठी है ये बातें,
हर ऊँचाई पर हर पसीने की बूँद का
हिसाब बता देती है जिंदगी।
मैखाने में दो बोतल खोलकर
कह देते हैं साहब
"दिल तोड़ दिया किसी ने
गम था पीने चले आए",
महफ़िल में मिले देश पर
लूटने वाले का कोई अपना
पूछकर देखिये जिंदगी के
सारे गम समझा देगा।
शूरमाओं की तरह औकात समझने वाले
अक्सर लाचार पर जुल्म ढाते कई देखे हैं,
किसी असहाय को कंधे बिठाकर
मंजिल पहुँचाना है जिन्दगी । 
भूल जाओ ऐसी मेहबूबा नहीं,
सपनों में भी सपने दिखाए
वो होती है जिंदगी। 
अस्तित्व तीन वर्णों का है
मगर त्रिलोक का सार है
ये मोहतरमा जिंदगी। 
नाद नहीं होता है बस
महसूस करवा देती है,
अच्छे अच्छे पापियों को भी
राम भजवा देती है।
पत्थरों से जो टकराने के लिए
हमेशा तैयार होते हैं,
जिंदगी उन्हीं को साथ खड़ी हो।
फौलाद बना देती है।
इंसान को नहीं जिंदगी
इंसानियत को तौलती है,
बेजुबान नहीं हैं यारों
जिंदगी बहुत कुछ बोलती है।


9. आँखें भी ना पढ. सके तुम।
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पढ़ना ही नहीं चाहा तुमने,
बहुत कुछ लिखा था तुम्हारे लिए।
हर एक दर्द को प्यार की किताब में लिख,
उकेर दिया था दिल की दीवार पर,
मोह था या चतुराई से तुम्हें ठगने की तमन्ना
मगर एक एक अल्फ़ाज
तुम्हारे हर लम्हे को बयां करते थे।
तुम्हारा हँसना, रोना, बतियाना,
रूठना, मनाना, तिरछी नज़र से झाँकना,
सब कुछ एक कारीगर की तरह
क्रमबद्ध, सारगर्भित रूप से लिखा था।
कुछ भी कहो मगर मुझे छल गए तुम,
इतने बेगरज निकले कि
आँखें भी ना पढ. सके तुम।


10. जलती धूप में तन्हा पेड.
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अपनी छाँव में नन्हें पौधों का
  आधार स्तंभ होता है।
बियावान में भी संग खड़ा
  कई आँधियों के थपेड़े सहता हुआ,
गर्म लू के सामने भी सीना तान,
बाढ़ के महाप्रलय से जितना हो सके,
  बचाता ही तो है।
पंछीयों का आश्रयदाता बन,
राहगीर को भी
विश्राम स्थल मुहैय्या करवाता है।
और फिर जब वही पौधे
बड़े हो जाते हैं तो इंसान भी,
पौधों को बना लेता है गृह शोभा
  या पहुँचा देता है कोई नर्सरी।
और फ़िर से ठूँठ बन खड़ा रह जाता है
वो जलती धूप में तन्हा पेड.।

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नेमीचंद मावरी
शोधार्थी ,रसायन शास्त्र
जयपुर

कविता 2542217062341401086

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