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लघुकथा - रोग के व्यापारी -ज्ञानदेव मुकेश

              

मैं होली के अवसर पर मिठाई लेने एक दुकान पर पहंचा। दुकान पर भीड़ उमड़ी हुई थी। धक्कम-मुक्की करते हुए मैं काउंटर तक पहुंचा और 20 रसगुल्ले पैक करने का निवेदन किया। मैंने देखा, एक बड़े बर्तन में बड़े-बड़े रसगुल्ले रस में सराबोर होकर डुबकी मार रहे थे। मगर मैंने यह भी देखा, उन रसगुल्लों के साथ रस के सागर में कई मधुमक्खियां मरी पड़ी हुई थीं। दुकानदार ने एक बड़ा चम्मच लिया और मधुमक्खियों को आजू-बाजू करके बीच से बीस रसगुल्ले रस सहित प्लाटिक के एक डब्बे में पैक कर दिये।
मैने कहा, ‘‘भई साहब, रस के साथ-साथ काल कवलित मधुमक्खियां भी रसगुल्ले के हिस्से हैं। उन्हें बर्तन में एक किनारे क्यों कर दिया ? रसगुल्लों के साथ इन्हें भी क्यों नहीं पैक कर दिया ?’’
  दुकानदार ने कहा, ‘‘भाई साहब, ये बिचारी बिजली की रोशनी से जलकर बर्तन में आ गिरी तो मैं क्या करूं ?’’
  मैंने पूछा, ‘‘आपने उन्हें बर्तन में ही क्यों रहने दिया ? निकालकर बाहर क्यों नहीं फेंक दिया ? कोई रस में डूबी मरी मधुमक्खियां लेने आनेवाला है क्या ?
  दुकानदार लज्जित होने लगा। मैंने रसगुल्ले के पैसे दिए और साथ ही रसगुल्ले वापस करते हुए कहा, ‘‘यह तोहफा मेरी ओर से लीजिए। होली पर यह बीमारी आपको ही मुबारक हो। और हां, जोर से कहिए, बुरा न मानो होली है !’’
  

                                                     -ज्ञानदेव मुकेश                                               
                                  पता-
                                              फ्लैट संख्या-301, साई हॉरमनी अपार्टमेन्ट,
                                              अल्पना मार्केट के पास,
                                              न्यू पाटलिपुत्र कॉलोनी, 
                                               पटना-800013 (बिहार)

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