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तीन मिसरी शायरी तिरोहे - डॉ सत्येन्द्र गुप्ता

सत्येन्द्र गुप्ता नजीबाबाद जिला बिजनौर उत्तर प्रदेश का रहनेवाले हैं. आपने छंद रूबाई मुक्तक को चार लाइनों में कहने की अपेक्षा तीन मिसरों में पूरा किया है जिससे कहने और सुनने वाले को अतिरिक्त आनंद की प्राप्ति होती है इस विधा को  नाम दिया है तिरोहे.  इसमें पहला मिसरा स्वतंत्र है दूसरा और तीसरा मिसरा रदीफ और काफिए में है जैसे -
पांव डूबोए बैठे थे पानी में झील के
चांद ने देखा तो हद से गुजर गया
आसमां से उतरा पांव में गिर गया

उसकी शान में कुछ  तो अता कर
सब कुछ मिल जाता है दुआ से
मांग कर तो देख ले तू खुदा से

बहुत तकलीफें सहकर पाला मां ने
मां की झुर्रियां बेटे की जवानी हो गई
वक्त बीतते-बीतते मां कहानी हो

शान  से ले जाती है जिसे भी चाहे
दर पर खडी मौत फकीर नहीं होती
उसके पास कोई तहरीर नहीं होती

     इस विधा पर   इअंडियन यूनिवर्सिटी फार पीस एंड एजुकेशन बंगलौर ने डा सत्येन्द्र गुप्ता  को डाक्टर आफ  हिंदी   साहित्य की मानद उपाधि से सम्मानित किया है

         ------ डा सत्येन्द्र गुप्ता
        
तीन मिसरी शायरी -तिरोहे

हुस्न ढ़ल गया मगर  गुरूर अभी बाकी है
नशा  उतर गया पर सुरूर अभी बाकी है
जवानी चली गई पर फ़ितूर अभी बाकी है

उम्र तमाम गुज़र गई बड़े सख्त इम्तिहां में
दिल टूटने का मन्ज़र ज़रूर अभी बाकी है
वक़्त गर्दिश का भी भरपूर अभी बाकी है

कभी तो बरसेंगी रहमतें उसकी मुझ पर
दुआ में आरज़ू यही ज़रुर अभी बाकी है
दिल में हसरतों का सिन्दूर अभी बाक़ी है

सिमेट लो अपनी उंगलियों की पोरों में मुझे
आरती में जलाने को कपूर अभी बाकी है
हद से गुजरने का दस्तूर अभी बाकी है

         ------ डा सत्येन्द्र गुप्ता

तीन मिसरी शायरी- तिरोहे

क्या खूब तूने  मेरे दिल को महका रखा है
मुझे अपनी खुशबू का टुकड़ा बना रखा है
तेरी खुशबू से मैंने भी तो गौना करा रखा है

मदमस्त किए रहती है मुझे तेरी ही खुशबू
क्या खूब इसने दिल में  उधम मचा रखा है
दिल को मेरे अपना महबूब बना रखा है

मेरी तन्हाई मुझसे बातें करती है अक्सर
क्या खूब तूने महल इश्क़ का सजा रखा  है
इश्क़ ने तुझे कितना बावला बना रखा है

लब खामोश हैं हो रही हैं नजर से बातें
यह हुनर तूने मुझको भी सिखा रखा है
हमने हर गम तेरा दिल में सजा रखा है

नशा गजब का है नशीली आंखों में तेरी
तूने आंखों में कोई मैखाना छिपा रखा है
हमने भी खुद को पैमाना बना  रखा है
       ---- डा सत्येन्द्र गुप्ता

कविता 8655019213809255703

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