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कहानी - गिरगिट - अविनाश कुमार झा

"हें.. हें.. मलिकार! आप तो हमेशा मजाक करते हैं। भला हम गिरगिट के जैसे रंग कईसे बदल सकते हैं... हें.. हें"।  बिरजू लगातार बिना बात के हिंहियाये जा रहा था जबकि उसे भी पता था कि सूरजभान सिंह ऊर्फ बाबा ठाकुर मजाक नहीं कर रहे थे, एकदम सीरियस थे। लेकिन अपनी बेचारगी पर वो रो भी नहीं सकता था, आखिर अगला पांच साल उसे इसी मुखिया के साथ नौकरी करनी थी।

" नहीं! ये बताओ बिरजू! कि मेरे ही सिफारिश पर तुम्हें यह नौकरी मिली। हम नहीं चाहते तो क्या बाहर से आकर तुम्हें इस गांव कोई बसने देता, कोई गांव के स्कूल में पढाने देता! बताओ?"

बाबा ठाकुर फुल फ्लैज आगबबूला थे।

" और तुम इतना बड़ा नमक हराम कि जहाँ गांव की प्रधानी हमरे हाथों से गई तुम इधर का रास्ता भूल गये! इतना भी आंख मे पानी नही बचा कि चलो कभी हाल चाल भी ले लें।"

बिरजू ऊर्फ बृजमोहन सहनी, जो जाति से मल्लाह था। छोटी बड़ी मछलियों को अपने जाल मे फंसाना उसका पुश्तैनी धंधा था। वो तो भला हो जोंगिदर मास्टर का कि उसकी पढाई में रुचि जग गई और वह मैट्रिक पास कर गया। बाप ने देखा कि परिवार का पहली बार कोई आदमी मैट्रिक पास किया है तो कालेज में एडमिशन करवा दिया। बाबा ठाकुर के गांव से तीन कोस की दूरी पर उसका गांव था, पंद्रहवें दिन जाल लेकर बाबा ठाकुर के तालाब में मछली मारने आता था। एक दो बार बिरजू के बारे में जिक्र किया था कि" मलिकार कहीं सरकारी नौकरी लगवा दीजिए तो जन्म सोगारथ हो जाएगा।"

इंटर करने के बाद बाबा ठाकुर ने गांव के स्कूल में शिक्षामित्र के रुप में भर्ती कर दिया। गांव वाले कंप्लेंट न करें इसके उसे गांव में ही बसा दिया। कुछ समय तक तो सब ठीक ठाक था परंतु धीरे धीरे बाबा ठाकुर के घर से बिरजू के लिए संदेशा आने लगा । कभी ये कर दो तो कभी वो काम कर दो। गांव के मुखिया थे, प्रतिष्ठित आदमी थे, मन मसोसकर बिरजू हुक्म मानता रहा। बाद में तो उसे लगा जैसे वो बाबा ठाकुर का घरेलू नौकर हो गया हो। गांव वाले भी टीका टिप्पणी करते पर किसी में खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं थी। लगभग तीसरी पुश्त गांव में मुखिया के रुप में शासन कर रही थी। जब भी कभी बिरजू अपने गांव जाने की बात करता, मुखिया जी उखड़ जाते।

लेकिन वक्त बदलते देर नहीं लगती। गांव में परिवर्तन की आंधी चली और इसबार गांव में प्रधानी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई। हालांकि बाबा ठाकुर ने अपने पुराने नौकर गगन दुसाध को खड़ा किया था पर दलितों के नये उभरते नेता बालकिशन पासवान के सामने किसी की कुछ न चली और वो भारी बहुमत से जीत गये। सत्ता परिवर्तन के साथ ही सबसे बड़ी समस्या बिरजू जैसों के लिए आई जिसकी नौकरी ही प्रधानों की कृपा पर बचनेवाली थी। बिरजू वैसे भी बाबा ठाकुर से खुश तो था नहीं! उपर से नौकरी जाने का भय! उसने तुरंत पाला बदला और पहुंच गया बालकिशन जी की शरण में। शुरू में तो काफी मेहनत मशक्कत करनी पड़ी विश्वास हासिल करने पर जाल में फंसाना तो पुश्तैनी धंधा था। बालकिशन जी ने बाद में जातीय समीकरण को देखते हुए उन्हें परमानेंट भी करवा दिया। फिर भी प्राइमरी स्कूल के मास्टरों की चाबी  मुखिया के ही हाथ में तो है। बालकिशन जी बिरजू महाराज को दौड़ाते गये और वे दौड़ते गये। हालांकि इसमें आनंद आ रहा था क्योंकि पहले जैसी बंदिशें नहीं थी, ना किसी की हरकारी थी, ना किसी का रौब था। ऐसे में कभी बड़ी हवेली तरफ मुंह उठाकर देखने की जरूरत भी महसूस हुई और इच्छा भी नहीं हुई।

समय ने फिर से करवट बदली, पांच बरस बीत गये और इस बार जातीय जोड़ तोड़ और पैसे के बहाव ने जनता का रुख मोड़ दिया और प्रधानी फिर से हवेली के कब्जे में आ गई। गांव के साथ साथ बिरजू फिर से अधर में था।

" तुम इधर आते तो क्या बालकिशन मा तुमको गोली मार देता? नमकहराम हो तुम। गलती हुई तुम्हारे की भोली सूरत को देखकर।" सूरजभान सिंह गुस्से से आग बबूला थे। यह पिछले पांच साल के उस अपमान का गुबार था जो पहली बार उनके खानदान ने झेला था। एक गरीब दुसाध से हार जाने का मलाल था। अहंकार को पहुंची चोट अब तक दबाकर रखे थे, ज्वालामुखी बनकर बह निकली थी। बिरजू हाथ जोड़े नीचे सिर झुकाये बस चुप हो गया था।

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