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ठलुआ-चिंतन - खिचडी-महात्म्य : देवेंद्र कुमार पाठक


ठलुआ-चिंतन
खिचडी-महात्म्य
देवेंद्र कुमार पाठक
अब जब हम सत्तर के पार हो चुके हैं, तो हाज़मा कुछ ख़राब रहने लगा है. हमारे बड़े-बुज़ुर्गों की नसीहतों और कायदों पर अमल करना हमें वाजिब ही लगा. हमने इस काया को कायम रखने के लिये 'खिचड़ी'  को स्वीकार लिया और हमारा इहलोक चलताऊ तरीके से चल रहा है. 'काया राखे धरम है', सो हम जीवित हैं. खिचड़ी खाकर हाज़मा सही कर लिया है. कुछ कमजोरियां होती हैं, तो हैं. खिच-खिच मची रहती है.

यह तो स्वाभाविक प्रकृति है खिचड़ी की. किसिम-किसिम की दालें, सब्जियां, हल्दी-नमक; दहाई के पार गिनती कर लो चीज़ों की. . . . . . . . . तो खिच-खिच कर या 'खीँच-खाँच' कर ही पकती है खिचड़ी. इसकी कुछ समस्यायें भी हैं. होती ही हैं. हर कहीं, हर इक देह की, आहार-विहार, व्यवहार, आचार-विचार, सोच-संस्कार की अनगिन समस्यायें हैं.

हमारे लोकतंत्र को ही लें. खिचड़ी सरकारों के बूते टिका है. टिकाऊ लोकतंत्र होकर भी विकास कर रहा है. किसी को न नज़र आये, उसकी फूटी हो, तो दोष उसकी आँख का, वो आँख का उपचार कराये, चश्मा-वश्मा ले-लगाये, तब नज़र आएगा विकास. . . . . . .

अभी बात खिचड़ी की करते हैं, उसकी समस्या की. . . . . अब देखिये न कभी ये आलू पकने से रह जाता है, कभी चने की दाल; मूंग जैसी दाल भली होती है. एक ही उबाल में गली. अब लोकतन्त्र में दलों का स्वभाव है न, दालों की तरह खिचखिचाना, खीझना, खिसियाना; कभी कभी तो कुछ दालों की तरह कोई दल हंडी के बाहर कूदने को हो जाता है. नमक-हल्दी जैसी औकात के दल भी सरकार की हांड़ी से बाहर होने को धमकाते हैं. . . . .

खिचड़ी सरकारों को यह सब झेलना पड़ता है. बेस्वाद खिचड़ी सरकार से हमारा जन गण मन ख़राब हो जाता है. पिछली सदी के आखिरी दशकों में कुछ ऐसा ही हुआ था. छोड़िये, भूतकाल के भूत न जगाइए. आज पर आइये. . . . . . . . .

भई, ये चूल्हे की आंच भी तो ठीक-ठाक रखा करिये. आप अपनी चावल की भूमिका मनमाने तरीके से मत निभायें. हमारे हाजमे को ठीक रख के ही आप हमें कायम रख सकते हैं. सत्तर पार हैं तो क्या अपने बाप-दादों और अम्मा-दादी, दीदियों की तरह हमारे प्रति गैरजिम्मेदाराना रवय्या अपनाकर हमें मरने को छोड़ दोगे. . . . . . ?

ओय मुंहझौंसियो! अपना इतिहास बोध सही करियो, ये गलत-सल्त मत झोंका करियो. हम भीष्म पितामह ठहरे. कुछ विवशतायें-नियमों की बाध्यतायें रहीं, सो कई मामलों में हम चुप रहे पर जब तुम बेस्वाद-अधपकी, और जली खिचड़ी खिलाकर ज्यादती पर उतारू हो, तो सुन-समझ लो. हम इच्छा-मृत्यु वाले भीष्म की तरह हैं.

कोई दुर्योधन या अर्जुन ही क्यों न हो, हमें अधमरा भले कर दे ;हम मरेंगे नहीं. तुमसे पहले ये दुष्प्रयास करने वाले मर मिटे. इतिहास के कलंक बन गये. उनकी तानाशाही और महत्वाकांक्षाओं ने हमें कितना रौंदा-कुचला, रक्तपात किया पर हम कायम रहे, कायम हैं, इस भू मण्डल पर हम कायम रहेंगे. इस देश में भी खिचड़ी सरकारों के बनते-बिगड़ते हम अपना हाज़मा बिगड़ने न देंगे. . . . . .

दुनिया के महान लोकतंत्र का ख़िताब हमें एसई हासिल नहीं हो गया. . . . . . . . .

हम पंद्रह बरस के थे तो हमारे पड़ोसी मित्र ने पीठ पर छुरा घोंप दिया. जवान हुये तो पड़ोसी भाई ने घात किया. पर हमने उसे परास्त किया, आगे चलकर उसे हमने दो टुकड़े कर दिया. अधेड़ हुये तो तबियत बिगड़ी, तभी से खिचड़ी खाने का अभ्यास हुआ. प्रौढ़ हुये तो कई बार खिचड़ी सरकारों से काम चलाया. करना पड़ता है जनाब! तुम जैसे तो आते-जाते रहते हैं लेकिन टिकते वही हैं, जो हमारी रक्षा करते हुये हमारे सम्मान, गौरव, कीर्ति को सच्चे अर्थों में कायम रखते हैं और सबसे प्रमुख बात;मेरी काया के बूंद-बूंद खून को बचाये रखते हैं.

हमसे बड़ी कोई पूजा, आस्था;कोई राष्ट्रधर्म हो सकता है क्या? हम जो कायम हैं, जो हमें बचाये और जीवित-सुरक्षित रखोगे, तो ही तुम रहोगे. तुम्हारी सबकी ये सियासतें, अगुआई, ये गठजोड़, ये तोड़-फ़ोड़, तुम्हारी सरकारें, ये ताम-झाम, जो जितना-जैसा चमका के रखा है न, ये सब जो-जितना है हमारे होने से हैं. ये संप्रदाय, जातो-जमात, धर्म-मजहब पूजा-इबादत जो भी हैं. ये तुम्हारी बतलबरियां, आंकड़ेबाजियां, ये शब्दशौर्य, ये वाग्वीरताएं, ये बड़े बड़े सपने, वादे, जोड़-तोड़, दौड़-होड़, चुनाव, हार-जीत पक्ष-विपक्ष, विकास, प्रगति इन सब की मुख्य जड़ कहाँ है?कौन है?. . . . . . . . . . . हम हैं , वह हम ही हैं, इस महादेश के जनमत प्रदत्त, जन- जन मंगलकारक लोकतन्त्र हम हैं!. . . . . जनतन्त्र, प्रजातन्त्र हम हैं, जिसे पिछले कुछ बरसों से खिचड़ी सरकारों के बूते इस देश का जनमत जीवित रखते आया है और रखेगा. हमारी सेहत के लिए खिचड़ी सरकारों की अहमियत है. तो चूल्हे, आग, उसकी आंच, दालों, सब्जियों, मिर्च-मसालों सबका संतुलन बनाये रखकर ही अच्छी खिचड़ी बनाई-खिलाई जा सकती है.

वर्ना याद रखियो!. . . . . "क़द में कमतर है जनमत से; सत्ता-सियासत की ऊँचाई!". . . . . . . . . .
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आत्मपरिचय-देवेन्द्र कुमार पाठक

म. प्र. के कटनी जिले के गांव भुड़सा में 27 अगस्त 1956 को एक किसान परिवार में जन्म. शिक्षा-M. A. B. T. C. हिंदी शिक्षक पद से 2017 में सेवानिवृत्त. नाट्य लेखन को छोड़ कमोबेश सभी विधाओं में लिखा . . . . . . 'महरूम' तखल्लुस से गज़लें भी कहते हैं. . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
. 2 उपन्यास, ( विधर्मी, अदना सा आदमी ) 4 कहानी संग्रह, ( मुहिम, मरी खाल : आखिरी ताल, धरम धरे को दण्ड, चनसुरिया का सुख ) 1-1 व्यंग्य, ग़ज़ल और गीत-नवगीत संग्रह, ( दिल का मामला है, दुनिया नहीं अँधेरी होगी, ओढ़ने को आस्मां है ) एक संग्रह 'केंद्र में नवगीत' का संपादन. . . . . . .   ' वागर्थ', 'नया ज्ञानोदय', 'अक्षरपर्व', ' 'अन्यथा', , 'वीणा', 'कथन', 'नवनीत', 'अवकाश' ', 'शिखर वार्ता', 'हंस', 'भास्कर' आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनायें प्रकाशित. आकाशवाणी, दूरदर्शन से प्रसारित. 'दुष्यंतकुमार पुरस्कार', 'पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी पुरस्कार' आदि कई पुरस्कारों से सम्मानित. . . . . . . कमोबेश समूचा लेखन गांव-कस्बे के मजूर-किसानों के जीवन की विसंगतियों, संघर्षों और सामाजिक, आर्थिक समस्याओं पर केंद्रित. . . . . .

सम्पर्क-1315, साईंपुरम् कॉलोनी, रोशननगर, साइंस कॉलेज डाकघर, कटनी, कटनी, 483501, म. प्र.  ईमेल-devendrakpathak. dp@gmail. com

व्यंग्य 6178042246093241406

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  1. समसामयिक आलेख, माध्यम 'ठलुआ-चिंतन - खिचडी-महात्म्य' मे राजनीति पर करारा व्यंग | जिसे जाती पांति ,धर्म ,पंथ के तराजू से वोट के लिए प्रयोग किया जाता रहा है | निजी स्वार्थ मे जाती की बुलबुले सादृश्य व्यक्ति वाद और परिवार वाद की राजनीति ने पूरे देश मे खिचड़ी की भांति देश की राजनीति को बना दिया है | यदि इस पर गौर किया जाय जो जरूरत भी है देश -समाज हित मे | राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों का मानक तय होना चाहिए जिससे देश और जनता का बरबाद होने वाले धन को बचाया जा सकता है | ठीक यही कार्य विधान सभा के लिए भी हो |
    जिससे अनेक खर्च से बचा जा सकता है वही धन राष्ट्र और जनता के हिट मे होगा |

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