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लघुकथा - कवरेज - ज्ञानदेव मुकेश

कवरेज

हमारे मुहल्ले में एक सामाजिक संस्था थी। उसका नाम था, मानव सेवा समाज। हम इसके तहत कई तरह के सामाजिक कार्यों का आयोजन करते रहते थे। एक बार हमलोगों ने लोगों में योग के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए एक योग शिविर लगाने का निर्णय लिया। इसके लिए मुंगेर स्थित भारतीय योग विद्यालय से संपर्क किया गया। वहां के दो अनुभवी प्रशिक्षक शिविर में आने के लिए तैयार हो गए। हमने पांच दिनों का शिविर रखा। गर्मी के दिन थे। कई लोगों के ऑफिस को देखते हुए हमने शिविर का समय सुबह पांच से सात बजे का समय मुकर्रर किया। हमने शिविर का अच्छा प्रचार-प्रसार भी किया। शिविर सफल हुआ और पहले ही दिन से काफी संख्या में महिला, पुरुष और बच्चे पधारने लगे और योगासन के गुर सीखने लगे।

मैं रोज सुबह उत्सुकता से अखबार उठाकर देखता। मगर हमारे उस सफल शिविर का कोई भी समाचार छपा हुआ नहीं दिखता। मैं बड़ा हताश होता। मैं दुखी होता कि मीडिया के लोग योग के प्रचार-प्रसार में हमारा सहयोग क्यों नहीं कर रहे ?

हमने शिविर में एक दिन स्वास्थ्य मंत्री को आने का निवेदन किया। वे राजी हो गए। वे शिविर के तीसरे दिन आए। मैंने उस दिन देखा, मीडिया के कुछ लोग शिविर में आए हुए हैं। मुझे बड़ी तसल्ली हुई।

अगले ही दिन मैंने देखा, कई अखबारों में शिविर को लेकर समाचार और चित्र छपे हुए हैं। हमें बड़ी खुशी हुई। लेकिन मैंने गौर किया कि मंत्री जी की तस्वीर कहीं ज्यादा प्रमुखता के साथ छपी हुई थी और उनके द्वारा दिए गए वक्तव्यों को काफी ज्यादा तरजीह दी गई थी। योग शिविर, उसके संचालक और योग प्रशिक्षकों के बारे में बहुत कम लिखा गया था।

मैं विचलित हुआ। मैं गंभीर होकर सोचने लगा कि चौथे स्तंभ के रूप में स्थापित हमारी जिम्मेदार मीडिया ने हमारे शिविर का कवरेज किया था या माननीय मंत्री जी के आगमन का ?

- ज्ञानदेव मुकेश

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