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कभी होश में मिलेंगे, तुझे आईना दिखाकर। तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस ग़ज़लें

तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस ग़ज़लें

-एक-

मगरूर ही सही मगर वो आदमी-सा है,

चेहरे का रंग देखिय कुछ चाँदनी-सा है।

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हमको तो हरिक गाम पे आते हैं हिचकियाँ,

पर जीने का हुनर उसका कुछ रागनी-सा है।

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हम है कि हम पनपा किए पतझड़ की छाँ में,

उसका हरिक मौसम मगर कुछ फागुनी-सा है।

​​

बात में दम है न उसकी न हाथ में दम है,

तेवर मगर हमराह का कुछ दामिनी-सा है।

​​

-दो-

आँखों-आँखों में जो उनसे, गुफ्तगू होने लगी,

रफ्ता-रफ्ता बात दिल की, सुर्खरू होने लगी।

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न तो दिन ही फिरे मेरे, ना रात ही रौशन हुई,

बात लेकिन नागहानी, चारसू होने लगी।

​​

ज़िन्दगी गो मौत की मेहमान है लेकिन,

मौत ने जो दी सदा, तो रू-ब-रू होने लगी।

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वक्त ने आवारगी को, कुछ दिया ऐसा सबक,

कि आवारगी आवारगी से, दू-ब-दू होने लगी।

​​

अबकि उनसे मिलने के बहाने ‘तेज’ को,

खुद से मिलने की बराबर, जुस्तजू होने लगी।

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-तीन-

जो फूल थे वो खार हो गए,

जो शेर थे वो सयार हो गए।

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वक्त ने ठगा तो इस कदर,

बसकि हौसले फरार हो गए।

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कि ऊँट की कमर पे मेंमने,

याँ सहज ही सवार हो गए।

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यां कमनजर बढ़े तो यूँ बढें,

कि एक से हजार हो गए।

​​

कितना बाअसर है ‘तेज’ कि,

हम भी वादाख्वार हो गए।

​​

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-चार-

यूँ ही ना धमाल कीजिए,

कुछ बोलिए सवाल कीजिए।

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आ रहें जो दिल के दिल करीब,

कि ऐसा कुछ कमाल कीजिए।

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जो कल तलक हुआ सो हो गया,

कल का अब ख़याल कीजिए।

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लूटके गुलों की रंगो - बू,

खुद को न निहाल कीजिए।

​​

है मौत की बिसात जिन्दगी,

ना खाँमुखू मलाल कीजिए।

​​

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-पांच-

ऐसा एक दिन मुझे नसीब तो हो,

कोई अपना मेरे करीब तो हो।

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पेट की खाई भी उनसे न नपी,

उनके हाथों में तो ज़रीब तो हो।

​​

अभी यीशू तो नहीं है, मानो भी,

सबके कन्धों पे गो सलीब तो हो।

​​

मिरे संग-संग जो जीता-मरता है,

कुछ हो न हो मिरा रकीब तो हो।

​​

ग़ज़ल में वक्त की खामी क्या है,

काफिया हो न हो रदीफ तो हो।

​​

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-छ:-

कि तिरे हिज्र में ऐसे गुजरी,

जब भी गुजरी दिल पे गुजरी।

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आँख में जाने उसकी क्या है,

जब भी लड़ी जिगर से गुजरी।

​​

आशिक नज़र है कितनी काफिर,

हर-एक साँस बदन से गजरी।

​​

कि बंजारा हूँ, मैं बंजारा,

सारी उमर सफर में गुजरी।

​​

‘तेज’ पूछ मत मेरी तबियत,

सारी उमर कुफर में गुजरी।

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-सात-

बहुत पीती है मिलाकर आँसू,

अबकी आँखों से जुदा कर आँसू।

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जो तू चाहे है ग़ज़ल में मानी,

मिसरे-मिसरे में लिखा कर आँसू।

​​

कैसे गुजरी है उम्र मत पूछो,

हाँ! बहुत बेचे हैं सुखाकर आँसू।

​​

कोई अपनी, यूँ उमर से गुजरा,

चश्मे-क़ातिल में सजाकर आँसू।

​​

फिर कभी अड़ जाए जरूरत शायद,

बसकि रखना तो बचाकर आँसू।

​​

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-आठ-

बात बनी पर ज़रा-ज़रा सी,

शमा जली पर ज़रा-ज़रा सी।

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कि सन्नाटों की रजधानी में,

हवा चली पर व ज़रा-ज़रा सी।

​​

स्वप्न-सुन्दरी से सपनों में,

आँख लड़ी पर ज़रा-ज़रा सी।

​​

मजलूमों के चाक जिगर में,

आग पली पर ज़रा-ज़रा सी।

​​

‘तेज’ कलमकारों के दरम्याँ.

साख बनी पर ज़रा-ज़रा सी।

​​

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-नौ-

कोयल है पिंजरे में बन्द,

कि कौवे हुए घने स्वछंद।

​​

संबन्धों कें पेड़ पे आकर,

बैठ गए कोरे अनुबन्ध।

​​

लगा लीलने पावस खुद ही,

आल्हादित फूलों की गन्ध।

​​

शब्दों की सीढ़ी पर चढ़कर,

औंधे गिरे बिचारे छन्द।

​​

नंगी हुई व्यवस्ता बेशक,

फिर कैसे सुधरे परबन्ध।

​​

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-दस-

बैठा हूँ घर लुटाकर,

साकी से दिंल लगाकर।

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पीता हूँ रोज फिर भी,

आँसू मिला-मिलाकर।

​​

कभी होश में मिलेंगे,

तुझे आईना दिखाकर।

​​

साकी ने लाज रखली,

सरे-साँझ ही सुलाकर।

​​

जीना है ‘तेज’ मुश्किल,

यहाँ मौत को भुलाकर।

​​

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(‘गुज़रा हूँ जिधर से’ ग़ज़ल संग्रह से प्रस्तुत)

तेजपाल सिंह ‘तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘दृष्टिकोण ‘ट्रैफिक जाम है’, ‘गुजरा हूँ जिधर से’, ‘तूफाँ की ज़द में’ व ‘हादसों के दौर में’ (गजल संग्रह), ‘बेताल दृष्टि’, ‘पुश्तैनी पीड़ा’ आदि (कविता संग्रह), ‘रुन-झुन’, ‘खेल-खेल में’, ‘धमा चौकड़ी’ आदि ( बालगीत), ‘कहाँ गई वो दिल्ली वाली’ (शब्द चित्र), पाँच निबन्ध संग्रह और अन्य सम्पादकीय।

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तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ‘ग्रीन सत्ता’ के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका ‘अपेक्षा’ के उपसंपादक, ‘आजीवक विजन’ के प्रधान संपादक तथा ‘अधिकार दर्पण’ नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं।

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स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं।

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सामाजिक/नागरिक सम्मान सम्मानों के साथ-साथ आप हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।

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आजकल आप स्वतंत्र लेखन में रत हैं।

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सम्पर्क : फोन—9911414511 : E-mail — tejpaltej@gmail.com

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