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जीना भी नहीं आसाँ, मरना भी नहीं आसाँ। तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस ग़ज़लें

तेजपाल सिंह ‘तेज’ की दस ग़ज़लें

-एक-

अपना-अपना मिज़ाज़ है साहिब,

किसको किसका लिहाज है साहिब।

​​

वो जो कहता है नास्तिक खुद को,

रोज पढ़्ता नमाज़ है साहिब।

​​

अपने हिस्से में चन्द साँसे हैं,

उम्र उनकी दराज़ है साहिब।

​​

मै तो मर-मर के भी जी लूँगा,

मुझको इसका रियाज़ है साहिब।

​​

चिंता कफ़न की ‘तेज’ को क्यूँ हो,

कि दोस्त उसका बज़ाज है साहिब।

​​

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-दो-

यूँ ही मत बवाल कर,

कि कुछ नए सवाल कर।

​​

रौशनी के वास्ते,

उठ जरा धमाल कर।

​​

थके-थके दिमाग है,

कि ताज़गी बहाल कर।

​​

मिलने को मिलिए रोज पर,

दामन जरा सम्भाल कर।

​​

कि आदमी की जात का,

’तेज’ कुछ ख़याल कर।

​​

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-तीन-

बन्द आँखे खुल गईं तेरी ज़फा के बाद,

जिन्दगी रौशन हुई तेरी ज़फा के बाद।

​​

कल तलक खुश्बू मिरी उलफत में कैद थी,

बसकि हवा में घुल गई तेरी ज़फा के बाद।

​​

कि बातों पे अपनी था तुझे बेहद गुरूर,

पर बात मेरी सिर हुई तेरी ज़फा के बाद।

​​

सादगी को ओढ़ लूँ कि छोड़ दूँ मैं क्या करूँ,

खुद की खुद से ठन गई तेरी ज़फा के बाद।

​​

कल भी थी, है आज भी अपनी हवा ऐ! ‘तेज’,

उलफ़त मगर रुसवा हुई तेरी ज़फा के बाद

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-चार-

गो शहर-भर आवारगी बर्पा हुई,

संसद में लेकिन शून्य-भर चर्चा हुई।

​​

लोग कहते है कि कल निन्दा थी पर,

है आजकल इंसानियत मुर्दा हुई।

​​

शायरी के मायने कुछ हों न हों,

शायरी पर हर समय फ़तवा हुई।

​​

बेईमानी का असर कुछ् यूँ बढ़ा,

ईमानदारी खुद ही बेपर्दा हुई।

​​

मौत बेशक मूल भी है ब्याज भी,

जिन्दगी पर ‘तेज’ बस खर्चा हुई।

​​

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-पांच-

मुद्द्त बाद खुली है आँखें,

सरसे फूल खिली हैं पाँखें।

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अपना कोई आसपास है

फिर काहे को बगले झांके।

​​

बाजार गर्म है अनुबन्धों का.

मत कर संबन्धों की बातें।

​​

जीवन-भर रो-धोके गुज़रा,

दिन सँवरे न सँवरी रातें।

​​

कुर्सी पाने के लालच में,

’तेज’ लगी हैं लंबी पाँरें।

​​

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-छ:-

कि रेत का सागर सही, सागर तो है,

घर मिरा खस्ता सही, पर घर तो है।

​​

वो आँएं याकी न आँएं पर मुझको,

हाँ! उनके आने का तसव्वुर तो है।

​​

खाकसारी को मौज-मस्ती का,

ख़्वाब ही सही, मयस्सर तो है।

​​

होने को तो है, वो आदमी बेघर,

बात में उसकी मगर असर तो है।

​​

‘तेज’ समझे कि न समझे खुद को,

उसमें जीने का कुछ हुनर तो है।

​​

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-सात-

बात में बात मिलाना कैसा,

आँख से आँख मिलाना कैसा।

​​

हर पल रंग बदलते है जो,

उनसे हाथ मिलाना कैसा।

​​

जब माली ही गंध चुराए,

फिर-फिर फूल खिलाना कैसा।

​​

जब मन-आँगन हो अंधियारा,

चौमुख दीप जलाना कैसा।

​​

‘तेज’ हिमालय की चोटी पर’

हरियल दूब उगाना कैसा।

​​

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-आठ-

सपने कब हुए अपने,

सपने बस हुए सपने।

​​

इंसा भी कहाँ बाकी,

इंसा भी हुए फितने।

​​

जीना है अँधेरों में,

खाई है कसम हमने।

​​

पाँवों का सफर छीना,

दी कैसी सजा रब ने।

​​

गैरों से गिला कैसा,

अपने भी कहाँ अपने।

​​

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-नौ-

जीना भी नहीं आसाँ,

मरना भी नहीं आसाँ।

​​

हम हैं कि हुए पाहन,

गलना भी नहीं आसाँ।

​​

चलने की हिदायत है,

रुकना भी नहीं आसाँ।

​​

शोला है बदन अपना,

जलना ही नहीं आसाँ।

​​

हो ‘तेज’ से मुखातिब,

लिखना भी नहीं आसाँ।

​​

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-दस-

पीने का जो असर हुआ है,

निन्दा अपना हुनर हुआ है।

​​

आँखों-आँखों चपल चाँदनी,

पाँवों-पाँवों सफर हुआ है।

​​

बस्ती – बस्ती सन्नाटा है,

बेशक कोई कुफर हुआ है।

​​

बंजर संबन्धों के चलते,

अनुबन्धों का गुजर हुआ है।

​​

खुद अपनी हस्ती पहचानो,

’तेज’ निरा कम-नज़र हुआ है।

​​

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(‘गुज़रा हूँ जिधर से’ ग़ज़ल संग्रह से प्रस्तुत)

तेजपाल सिंह ‘तेज’ (जन्म 1949) की गजल, कविता, और विचार की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- ‘दृष्टिकोण ‘ट्रैफिक जाम है’, ‘गुजरा हूँ जिधर से’, ‘तूफाँ की ज़द में’ व ‘हादसों के दौर में’ (गजल संग्रह), ‘बेताल दृष्टि’, ‘पुश्तैनी पीड़ा’ आदि (कविता संग्रह), ‘रुन-झुन’, ‘खेल-खेल में’, ‘धमा चौकड़ी’ आदि ( बालगीत), ‘कहाँ गई वो दिल्ली वाली’ (शब्द चित्र), पाँच निबन्ध संग्रह और अन्य सम्पादकीय।

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तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ‘ग्रीन सत्ता’ के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका ‘अपेक्षा’ के उपसंपादक, ‘आजीवक विजन’ के प्रधान संपादक तथा ‘अधिकार दर्पण’ नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं।

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स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं।

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सामाजिक/नागरिक सम्मान सम्मानों के साथ-साथ आप हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं।

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आजकल आप स्वतंत्र लेखन में रत हैं।

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सम्पर्क :  E-mail — tejpaltej@gmail.com

ग़ज़लें 2888341090071691336

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