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पर्यावरण पर आलेख - जब गौरा देवी ने कहा जंगल हमारे मायका हैं - शशांक मिश्र भारती

जी हां यह चिपको आंदोलन की जननी चिपको वूमन के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखण्ड की नारी गौरा देवी को कौन नहीं जानता। साल 1925 में चमोली जिले के लाता गांव के एक मरछिया परिवार में श्री नारयण सिंह की बेटी के रूप में जन्मी गौरा देवी की प्रारम्भिक शिक्षा गांव में हुई। मात्र ग्यारह साल की आयु में इनका विवाह हो गया और यह अपने पति श्री मेहरबान सिंह के गांव रैंणी भोटिया आवासी गांव आ गई। पति का मुख्य व्यवसाय पशुपालन ऊन का कारोबार और खेती बाड़ी था। पर दुर्भाग्य से इनको पति का साथ अधिक न मिला और केवल बाइस साल की आयु में विधवा होगईं। उस समय इनका एक मात्र पुत्र ढाई साल का था। गौरा देवी ने हिम्मत न हारी। ससुराल में रहकर अपने छोटे बच्चे के पालन पोषण के साथ साथ सास ससुर की सेवा और खेती बाड़ी को भी संभाला। खेती बाड़ी व कारोबार के लिए इनको अनके कष्टों का सामना करना पड़ा। पर यह लगी रहीं। यहीं नहीं इन्होंने अपने इकलौते पुत्र चन्द्र सिंह को भी समय के अनुसार परिवार चलाने लायक बना दिया।

बचपन से ही अदम्य साहसी उच्च विचारों वाली गौरा देवी समय समय पर अनेक लोगों परिवारों का सम्बल बनी थी पुत्र के स्वावलम्बी होने पर इनका दायरा बढ़ गया और यह बढ -चढ़कर लोगों के सुख दुख में भागीदारी करने लगीं। इसी समय 1970 में अलकनन्दा नदी में भयंकर बाढ़ आई। यहां के लोगों में बाढ़ के कारणों व उपायों के प्रति जागरूकता बढ़ी। लोग गम्भीर हुए। पर्यावरणविद चण्डीप्रसाद भट्ट ने जागरूकता के लिए पहल की। गांव गांव में महिला मंगल दल बनाये गये। गौरा देवी को अपने रैणी गांव की अध्यक्षा दी गई। यही वह समय था जब गौरा देवी का पर्यावरणविद चण्डीप्रसाद भट्ट के अलावा गोविन्द सिंह रावत वासवानन्द नौटियाल व हयातसिंह जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं से सम्पर्क हुआ। गौरा देवी का जीवन और लक्ष्य अधिक स्पष्ट हो गए। बचपन से उनके अन्दर भरी समाज देश के लिए कुछ करने की भावनाये अवसर की तलाश करने लगीं।

उत्तराखण्ड जन आन्दोलन की जननी के नाम से भी प्रसिद्ध है। जंगल जमीन और जवानी के अधिकारों की सदा बात हुई है। साल 1921 का कुली बंगार आन्दोलन हो 1930 का तिलाड़ी आन्दोलन 1974 का चिपको 1984 का नशा नहीं रोजगार दो व 1994 का राज्य प्राप्ति के लिए आन्दोलन महिलायें हर जबर बढ़कर चढ़कर हिस्सा लेती दिखीं। मातृशक्ति का योगदान महत्वपूर्ण रहा। 1974 के चिपको आन्दोलन की तो यह जननी ही रहीं।

साल 1962 के चीन युद्ध के बाद भारत सरकार का ध्यान सड़क निर्माण पर गया। सैनिकों के लिए सुगम मार्ग बनाने को पेड़ कटने आरम्भ हुए। इसी क्रम में गौरा देवी के गांव रैणी में 2451 पेड़ों को चिन्हित किया गया। विरोध के लिए 23 मार्च को गोपेश्वर में एक रैली की योजना बनी। 26 मार्च को सभी को मुआवजे के लिए बुलाया गया। प्रशासन ने उसी दिन पेड़ कटवाने की भी योजना चुपके से बना ली। सभी सामाजिक कार्यकर्ता गोपेश्वर में थे। इधर काटने वाले निकल पड़े। यह हलचल गौरादेवी को एक लड़की के द्वारा पता चली। वह तुरन्त गांव में उपस्थिति 21 महिलाओं व कुछ बच्चों को लेकर निकल पड़ीं। इन्होंने खाना बना रहे मजदूरों से कहा यह जंगल हमारा मायका है। इससे हमें जड़ी बूटी सब्जी फल और लकड़ी मिलती है। जंगल काटोगे हमारे बगड़ बह जायेंगे आप लोग खाना खा लो और फिर हमारे साथ चलो। जब हमारे मर्द आ जायेंगे तो फैसला होगा। बात ऐसे न बनी। ठेकेदार व उसके आदमियों ने डराने धमकाने का काम किया जेल जाने का उर दिखाया। बन्दूक तान दी। पर गौरा देवी कहां डरने वाली थी। उसने छाती तान दी और कहा लो मार दो गोली। मारो गोली और काट लो हमारा मायका।

गौरा देवी के इस अदम्य साहस से अन्य महिलाओं व बच्चों में साहस का संचार हुआ और सब पेड़ों से लिपट गये। एक सीमेंट का पुल जो कि ऋषिगंगा पर बना था। तोड़ दिया। अन्ततः गौरा देवी व उनके साथ आयी महिलाओं की जीत हुई। एक जांच कमेटी बनी। उसने भी इन पेड़ों का आवश्यक माना। तो इस तरह आन्दोलन के साथ साथ चिपको वूमैन सफल हुई। इसके बाद वह ऐसे अनेक आन्दोलनों से जुड़ी रहीं। भारत सरकार ने उन्हें वृक्षों की रक्षा के लिए 1986 में प्रथम वृक्षमित्र पुरस्कार प्रदान किया। यह विभूति 04 जुलाई 1991 को परलोक गामी हुईं। पर अपने कार्यों और विचारों की सुदृढ़ता से आज भी जीवित हैं। प्रेरणा दे रही हैं।

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शशांक मिश्र भारती संपादक देवसुधा हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर 242401 उ0प्र0

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