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औषधिपरक आलेख - रुदन्ती अनेक तरह से लाभकारी औषधि है - शशांक मिश्र भारती

मैसूर के जंगलों एवं पश्चिम भारत के समुद्र तटवर्ती प्रदेशों में उत्पन्न होने वाला यह जंगली फल अनेक रोगों में लाभकारी है। क्षयरोगों को दूर करने के लिए तो संसार में ख्याति प्राप्त कर चुका है। यह फल स्वंय उगने वाली बेल है और इसमें एक अनार की भांति फल लगता है। आदिवासी लोग इसका प्रयोग बहुत पहले से चूर्ण बनाकर मरहम के रूप में पुरानों घावों फोड़ों के लिए करते थे। कुछ ही समय में फोड़ों की मवाद सूखने लगती थी और पीड़ित पूरी तरह स्वस्थ हो जाता था।

प्राचीन भारतीय चिकित्सा शास्त्री इससे परिचित थे और रसायन के रूप में प्रयोग करते थे। उनके अनुसार यह बुढ़ापा तथा व्याधि को नष्ट करने में सक्षम है यथा रसायनं च तज्ज्ञेयं जरा व्याधि विनाशम्। यथाऽमृता रुदन्ती च गुग्गुलश्च हरीतिकी। आज यह फल किसी परिचय का मोहताज नहीं है लगभग हर आयुर्ववेद शास्त्री से परिचिति होने के साथ विविध क्षेत्रों में इसके उपयोग से अनेक व्याधियों से रोगियों को मुक्ति प्रदान कर रहा है। अनेक वैद्य हकीम डाक्टर इसका सेवन करा रहे हैं और क्षय रोग कण्ठमाला बच्चों का क्षय श्वास पुरानी खांसी आंतों की टी0बी0 ईसिनोफीलिया दुग्रन्धित फोड़ों एवं घावों में अनुमान के अनुसार सफल चिकित्सा कर रहे हैं। शोधार्थियों के सम्मेलन में चिकित्सकों ने रुदन्ती का चूर्ण बड़ों को 4.4 या 5.5 ग्राम दिन में चार बार एक चम्मच दूध के सेवन करायें। बच्चों को 2.2 या 3.3 ग्राम दिन 3.4 बार सेवन कराये। ऐसा बताया था।

1952 के बाद तो इस फल के औषधि के रूप में प्रयोग तेजी से बढ़ा है और इसने चिकित्सा जगत में घूम मचा दी है। मुम्बई के एक डाक्टर ने तो अंग्रेजी दवाओं से हार मानकर इसके चूर्ण को लगा लगाकर अपने मवादयुक्त मुहांसे ठीक कर लिये थे। मुम्बई के नानावती अस्पताल से कौन परिचित न होगा वहां के एक डाक्टर कृष्णामूर्ति जी ने रुदन्ती पर लम्बा अनुसंधान कियाऔर 28 सितम्बर 1952 की मीटिंग में अपनी विस्तृत रिपोर्ट पेश की। जिससे रुदन्ती के प्रयोग उसके लाभकारी परिणामों के बारे में भारत ही नहीं भारत के बाहर के लोग भी परिचित होगये इसके बाद रुदन्ती केवल जंगली फल न रह गया अपितु उसकी ख्याति और उपयोग चारों ओर फैल गया। आज रुदन्ती क्षय रोग फेकड़ों के घाव भरने में रोगियों के वजन को बढ़ानें में क्षयजन्य मस्तिष्कावरण शोथ में आंत की टी0बी0 में कण्ठमाला में बच्चों के सूखा रोग पुरानी से पुरानी खांसी में रीढ़ की हड्उी के तरल पर और ईसिनोफीलिया में प्रभावी व स्थायी लाभ देने वाली औषधि बन चुका है। उचित मात्रा में सेवन से रोगी कुछ ही दिनों में रोग से हमेशा के लिए मुक्त हो जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसके सेवन से रोगी पर किसी प्रकार का विपरीत प्रभाव नहीं पड़ रहा है। इस बात को भारत के अलावा अमेरिका के कई चिकित्सकों ने अधिक लाभकारी माना है। वर्तमान में चिकित्सक रोगी के लक्षणों के अनुसार रुदन्ती का प्रयोग अकेले चूर्ण या कैपसूल के रूप में करने लगे हैं। दूध या शहद के साथ सेवन कराते हैं। कम से कम तीन बार इसका प्रयोग कराते हैं। इसकी चिकित्सा रोग के अनुसार पन्द्रह दिन से लेकर डेढ़ साल तक भी चल सकती है। रोग और रोगी की आवश्यकतानुसार चिकित्सक रुदन्ती चूर्ण के साथ साथ मल्लसिन्दूर अभ्रक भस्म प्रवाल भस्म गोमूत्र क्षार वटी टंकण भस्म कांचनार गुगुल स्वर्णवासन्ती श्रृंगभस्म सितोपलादि चूर्ण और स्वर्णभस्म आदि मिलाकर अपना औषधि सूत्र बनाकर उपयोग कराते हैं आज विभिन्न सूत्रों के कैपसूल भी बाजार में उपलब्ध हैं। कैपसूलों का उपयोग मैंने स्वंय अपने बेटे के लिए श्वांस सम्बन्धी समस्या में किया है। तब से अभी तक कोई समस्या नहीं है।

आज रुदन्ती ने आयुर्वेद का नाम चिकित्सा जगत में ऊंचा कर दिया है। भारतीय प्राचीन चिकित्सा विज्ञान एक बार फिर गौरवान्वित हो रहा है। यह प्रसन्नता का विषय है । विश्वास है कि इसका अधिकाधिक लाभ रोगियों को मिलेगा। अन्त में इस लेख को पढ़ने वालों से आग्रह है कि सीधे सीधे रुदन्ती के प्रयोग न करें इसके लिए उचित चिकित्सक का परामर्श अवश्य लें।

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शशांक मिश्र भारती

संपादक देवसुधा

हिन्दी सदन

बड़ागांव शाहजहांपुर 242401 उ0प्र0

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