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सरिता मेहता की कविताएँ - देवी नागरानी

मेरा पहला परिचय उस महिला के साथ जो सभी दिशाओं में दक्षता बरपा कर रही है-देवी नागरानी

डॉ. सरिता मेहता विद्याधाम की निर्देशिका है जिनकी बतौर ये बहुभाषी कवि- सम्मेलन आयोजित किया गया. एक तरह से यह सफल कवि सम्मेलन कवियों का सामूहिक गुलशन सिन्दूरी शाम-कविओं के नामएक नया पैग़ाम ले आया क्योंकि इसमें बहु-भाषी पंजाबी, बंगाली, सिन्धी, अवधी और अंग्रेज़ी भाषा के कवियों ने भाग लिया, और इस सामारोह की संचालक रही डॉक्टर सरिता मेहता.

काव्य प्रेम, राष्ट्र प्रेम, देश के प्रति भावनाएं अपने तरीके से छंदों में कुशलता से अभिव्यक्त करने वाली सरिता जी ने अपने संस्कारों के रूप में वसीयत स्वरूप जो हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार new यॉर्क में किया है वह काबिले-तारीफ है, ऊपर उलेख किया कार्यक्रम भी सत्यनारायण मन्दिर में बखूबी सफल रहा.
डॉ.सरिता मेहता किसी पहचान की मोहताज नहीं है, शिक्षा के जगत में उनका हिन्दी के क्षेत्र में जो योगदान रहा है वह वन्दनीय है. अज्ञान का अँधेरा दूर करके ज्ञान की दिशा को उज्गार करने का यह प्रयास उनकी नवनीतम पुस्तक “आओ हिन्दी सीखें” के रूप में एक वरदान बनकर आया है जो हिन्दी को अंगेजी जुबां के आधार पर बचों एवं शिक्षकों को बहुत लाभाविंत कर रहा है. बच्चों के शिक्षण के लिए उनकी यह देन शिक्षा के क्षेत्र में एक अनमोल सौग़ात है. कला की कई दिशाओं में उनकी अभिरुचि रही है-मूलत: चित्रकार है, कई ललित कला प्रदर्शिनियों में भाग लेती रही हैं और अनेक उपाधियों से निवाजी गई हैं.’ वह ख़ुद इस काव्य गोष्टी की सरंक्षक व संचालिका रही. काव्य गोष्टी में उपस्थित कवि गण थे -राम बाबू गौतम, आनंद आहूजा, अशोक व्यास, अनुराधा चंदर, ग़ुरबंस कौर गिल, पूर्णिमा देसाई, बिंदेश्वरी अगरवाल, अनंत कौर, सुषमा मल्होत्रा, वी.के चौधरी, मंजू राय, अनूप भार्गव, सीमा खुराना, मैं और नीना वाही.

डा॰ सरिता मेहता जी की कविता के शब्द अब तक उनके छोड़े हुए नक्श याद दिला रही है, उनका मक्सद जो अनेकता में एकता के रंग भर रहा है…

फैलाया है मैंने अपना आँचल
इस धरती से उस अंबर तक
हम सब मिल एक हो जायें
विश्व में अमन शाँति का ध्वज फहरायें
ये ख्वाब है मेरा, सच हो जाये
ये मुशकिल है, असंभव तो नहीं.. सरिता मेहता
यह उनकी अपनी रचना मनोभावों से लबरेज़ अपने विश्वास के डोर को थामकर आगे और आगे निकल पड़ती है. ये मात्र शब्द नहीं जो उनकी कविता को सम्पूर्ण करते है, ये वो पर है जो उड़ान भरने कि कोशिश तब तक करते हैं जब तक वे अपने मन संजोये हुए ख्वाबों को हक़ीक़त का जामा नहीं पहुंचाती. उनकी इन विचारात्मक शक्ति है जो उन्हें निराशा की परिथियों में भी आशा का दामन पकड़ कर रखने की प्रेरणा देती है. आँधियों में पराजय के द्वद्व में हिम्मत के परचम फहराते हुए वे कहती है, सुनिए उनकी ज़ुबानी-

1. आस का दीप

जिस्म घायल है वक्त के
बेरहम थपेड़ों से,
रुह अपनों के ही दिए
जख्मों से छलनी है।
तमाम उम्र परिंदों की तरह
उड़ने को तड़पते रहे अरमान।
बिना आहट आखों से
पिघलता रहा दर्द का दरिया।
पर दीप आस का अभी भी
दिल के कोने में जल रहा है।

उनके लेखन में हर रंग की रेखाएं हैं जो इन्द्रधनुसी तस्वीर का हिस्सा बनती जाती है . दुनिया के भवसागर में हर रिश्ते को लहरों का मिलना बिछडना मानकर वे इन समुद्री संघर्षमय राहों से अपना रास्ता निकाल लेती है. उनकी मुस्कराती हुई दिलेरी रिश्तों की व्याख्यान करते हुए लिखती है -
कहते हैं रिश्ता
बनाता है भगवान्/ फ़िर क्यों ऐसा होता है
अटूट बंधन प्रेम का/ बंध कर क्यों टूटता है?
यह साथी दुख-सुख के/ सुख कहाँ देते हैं?
दुख से क्यों भर देते हैं?/ दर्द रिसता रहता है
अश्क बन आखों से/ और पीढ़ा बन सीने में
दिन रात सुलगता रहता है।

अपने सीने में दबे दर्द को दवा बनाना सरिता जी को आता है, शब्दों की जुबानी उनका मौन बोलता है कुछ इस तरह इस बानगी में--
मौन तुम्हारा
लफ़्ज़ों का मोहताज/बन गया हमारे रिश्तों में
इतनी बड़ी दीवार/ मेरा करुण क्रदन,
दर्द भरी आहें/ दबी-दबी सिसकियाँ,
लाँघ न पाई यह दीवार/ टूट कर बिखर गई मैं
पर न टूटा तुम्हारा मौन.

पढ़ते पढ़ते अब कुछ समझ आते जा रहा है कि मौन दर्द भरी आहें व् दबी दबी सिसिकियां क्यों भरता है? कारण है अकेलापन, जो जीवन में एक दर्शानिकिता को प्रदर्शित करते हुए सरिता जी के शब्दों में ‘अकेलापन’ को परिभाषित कटे हुए लिखती है-
अच्छी तरह जानती थी
क्या होता है दुख/ कैसे खलता है अपना अकेलापन।
कितना कठिन होता है/ इंतज़ार करना/
पीढ़ा सहना/ टूटे हुए सपनों के कंकरों की।

और उनकी हिम्मत को देखिये किस तरह वे हर बाधा बनी दीवार को तोड़ती हुई अपना सफ़र तय करते हुए कह रही है-

फ़िर भी
लाख तुम्हारे कहने पर
मैं चुपचाप चली आई
अकेली, तन्हा/ अनजान सफ़र पर।
ताकि तुम जी सको सकून से/
उसके साथ/ जिससे तुम प्यार करते हो।
नहीं चाहती थी/ तुम भी घुट- घुट कर जियो
मेरी ही तरह/ क्यों कि मैं तुमसे
बेहद प्यार करती थी.

इतना सब कुछ होने के बावजूद भी नारी मन की अनंत गहराई को नाप पाना असंभव है, वह हर रिश्ते को निभा पाने में पहल करती है पर अपने प्यार की हार को भी अपनी विजय मानती है. बहुत कुछ होने के पश्चात भी माथे पर शिकन नहीं लाती. यहे उनकी कविता का शीर्षक भी है-‘माथे की शिकन’
बरसों साथ-साथ रहते
चलते रहे/ रेल की पटरियों की तरह
अलग-थलग /कटे एक दूसरे से/
जिन्दगी की गाड़ी धड़धड़ाती/ अपनी रफ़्तार से चलती रही
किस-किस बात का/ हिसाब माँगूँ, किससे?
तेरे माथे की शिकन/ तेरी आखों की नफ़रत
और तेरी चुप्पी ने/ मूक कर दिया मुझे भी/
आज बरसों बाद आइने में देखी
अपने माथे पर भी उभरी सैंकड़ों लकीरें/
कुछ तेरी नफ़रत की/ कुछ मेरी टूटी ख्वाहिशों की,
और मेरे असहनीय दर्द की/
वादा था साथ चलने का, वो निभाया
पर न देख पाया कभी कोई
एक भी मेरे माथे पर शिकन.

यही वह सरिता है जो सीने में सौ सौ उलझनें व् बाधाएं लेकर भी उन्मुक्त बहने में विश्वास रखती है. डॉ.सरिता मेहत जो अपने आप में एक सम्पूर्ण पाठशाला है, वे अपनी हदें जाती है, अपनी उड़ान को पहचानती है. इन पदों पर कार्य करते करते, मुस्कराते हुए वे ज़िंदगी के सफ़र में कभी पछाड़ न खाने का वादा खुद से करते हुए आगे और आगे की ओर बढ़ रही है. उनकी कार्य क्षमता उनके पदों का प्रमाण है. लेक्चरार, राइस यूनिवर्सिटी, ह्यूस्टन, टेक्सास, यू.एस.ए/ अध्यक्ष, विद्या धाम, ह्यूस्टन, टेक्सास, यू.एस.ए।

पूछने पर कहती है -
कभी प्यार ने,/कभी अधिकार ने,
कभी कर्तव्य ने/कभी समाज के रीती-रिवाज़ों ने,
पर अक्सर पांव में बेडी से बने संस्कारों ने/
मेरे सपनों को/ मेरी उमंगों को
उम्र भर कैद रखा सीने में/ पर अब यह मूक शब्द,

चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं ज़माने से /
इन्तहा हो चुकी है सब्र की/ अब तो मुझे जीने दो/
मत रोको मेरी राहें /मुक्त गगन में उड़ने दो/
अंकुश ना बांधो ख्यालों पर /शब्दों की धरा बहने दो.

स्वपन नए बुननें दो/ लक्ष्य नए चुनने दो/

गाऊँ सुन्दर नगमे/ गीत नए रचाने दो/ मधुर ताल पर नाचूँ,
संगीत नए बजने दो/ आंसू पिए जीवन भर,
बन झरना हँसी का झरने दो/ मत रोको मेरी राहें,
उन्मुक्त मुझे अब बहने दो/ सागर की अब चाह नहीं,
’सरिता’ ही मुझ को रहने दो. मेरी शुभकामनाएँ है सरिता जी के साथ कि वह इन सपनों के संसार में बेपर परवाज़ करते हुए अपने सपनों को साकार होते हुए देखे. यह उनकी नहीं हर नारी की जीत है जो संघर्ष की राहों पर अपने विकल्प को हासिल करती है. जयहिंद

देवी नागरानी, dnangrani@gmail.com

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