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लघुकथा: अरे वाह - डॉ. नन्द लाल भारती

शुभ प्रभात पति पररमेश्वर ।

हमारे तो नसीब खुल गए । शुभप्रभात देवी जी ।भाग्यवान आपके कोकिला स्वर में डर कैसा ?

चाय लीजिए ।

बताएंगी नहीं ।

क्या बताऊँ  ?

वही जो मौन है पर दस्तक दे रहा है।

पतिदेव के साथ डर कैसा ?

भाग्यवान जो डरा रहा है ।

चाय लीजिए ।

बिना शक्कर की चाय में मोती भी ।

कौन सा मोती ?

कमलनयन से जो झरे हैं ।

मत पीजिए दूसरी लाती हूँ ।

नहीं नहीं रहने दो । ये दर्द के मोती हजम कर लूंगा ।

क्या कर रहे हो जी ?

गलत तो नहीं  । हां हंसकर जीना पड़ेगा ।

कैसे ?

चलो  नई शुरुआत करते हैं ।सब भुला देते हैं ।

क्या - क्या ?

सब कुछ....... बेटा-बहू का दिया सुलगता दर्द । बहू के मां-बाप की ठगी भी ।

कैसे भुला देंगे आपकी हाड़फोड़ मेहनत, खुली आंखों के सपने और सब ठगी ।जीवन की ऊंची -नीची राहों के दर्द भी ।

देवीजी जरुरी है अब । और भी तो हैं  खून-पसीने से सींचे अपने लोग,खून के रिश्ते और दोस्त भी हंसकर जीने के लिए ।

अरे वाह कसम से क्या बात है....... हा हा ।


डां नन्द लाल भारती

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