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लघुकथा - मसाले -ज्योत्सना सिंह

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   मसाले

सभी उसकी तारीफ़ करते थे अपना घर कुटीर उद्योग की नींव थी वह पहले दिन से ही वह काम पर लग गई थी।

और उसकी दाल कचौरी सा स्वाद आस-पास के इलाक़े में नहीं था।

बस इसी विशेषता ने कुटीर को ऊँचाइयों के सोपान की सैर करवानी शुरू की और उसका नाम और स्वाद लोगों की ज़ुबान की पर चढ़ गया।

वह भी अपने नाम की चमक को महसूस करती और मेहनत के रंग को और पक्का कर ख़ुश होती।

उसकी बढ़ती चमक पहले तो मालिक को अपने प्रकाश से प्रकाशित लगी तो वह भी ख़ुश हो सबके सामने उसका नाम ले तारीफ़ों के पुल बाँधता।

वक़्त ने अपना असर दिखाना शुरू किया और दोनों के मन में पनपने लगी स्वाभाविक भावनायें।

उसमें ग़ुरूर ने जन्म लिया और उसके चेहरे का रंग बदलने लगा।

अब वह जब तब दाल कचौरी की कमी कर ग्राहकों को निराश कर दिया करती और ख़ाली हाथ जाते लोगों के चेहरे को पढ़ वह अपने  महत्व पर नाज़ करती।

अब उसने उसके चेहरे के उतार चढ़ाव को पढ़ना शुरू कर दिया था।

आज उसने फिर एक नई मसाला कचौरी को कुटीर से जोड़ उस नई मेहनत को चमकना शुरू किया।

ग़ुरूर के कसैले स्वाद को मेहनत के मसाले से कैसे स्वादिष्ट बनाना है वह बख़ूबी जानता था।

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ज्योत्सना सिंह

लखनऊ

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